सदका खैरात करने की फ़ज़ीलत

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 क्या आप जानते हैं इस्लाम में सदका खैरात करने की फ़ज़ीलत क्या होती है जब कोई मुसलमान भाई अल्लाह की राह में मांगने वाले गरीबों और फकीरो पर अपने माल और दौलत को खर्च करता हैं। तो उसको सदक़ा खैरात कहते हैं। इस बारे में बहुत सी हदीसें सामने आई हैं। उन सब के बारे में जननेगे। तो आज की आर्टिकल में हम लोग जानने की कोशिश करेंगे आखिर इस्लाम में सदका खैरात करने की फ़ज़ीलत क्या-क्या है।

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सदका किसको कहते हैं ?

सदका ऐसी चीज है जिसकी वजह से आदमी की परेशानी दूर होती है मुसीबत खत्म होती है। सबसे बेहतर सदका माल का होता है। अल्लाह की खुशी और अल्लाह से करीब होने के लिए, नेक और अच्छा काम करने का नाम सदका है लेकिन सदका का मतलब आमतौर पर यह है अल्लाह की राह में मांगने वालों गरीबों और फकीरो पर अपने माल और दौलत को खर्च करने का नाम सदका है।

सदका किसको देना चाहिए

वैसे तो हर मांगने वाले को सदका खैरात दे देना चाहिए या जिसके बारे में हमारे दिल में ख़याल आये की आदमी गरीब है उससे सदका अदा हो जाता है। लेकिन सदका खासतौर पर ऐसे लोगों को देना में ज्यादा सवाब है जो गरीब होने बावजूद अपनी जरूरत दूसरों से बयां नहीं करते। भूखे सो जाते हैं, लेकिन दूसरों से कुछ नहीं मांगते, क़ुरान में ऐसे लोगों पर सदका करने की बहुत तहकीद की है, सदक़ा ऐसे लोगो को देना चाहिए।

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सदका करने का तरीका

सदका का सही तरीका यह है कि जिसको सदका दिया जा रहा है उसको बिना बताए हुए चुपके से उसके हाथ में थमा दिया जाए। या उसको जिस चीज की जरूरत हो उसको उसे वहां सामान खरीद के दे दिया जाए। सदका देने वाले को यहां बात अपनी दिमाग में बैठा लेनी चाहिए।

सदका देकर यह ना समझे कि सामने वाले पर कोई एहसान कर रहा है, और ना ही वह एहसान चुकाने की उम्मीद रखे। सदका करके एहसान जताने से सदका का फायदा खत्म हो जाता है और सदके का सवाब नहीं मिलता, उस पर से यह बहुत बड़ा गुनाह भी है।

क़ुरान में सदके की फ़ज़ीलत

{ مَثَلُ الَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنْبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنْبُلَةٍ مِائَةُ حَبَّةٍ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (261) الَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَا أَنْفَقُوا مَنًّا وَلَا أَذًى لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ} [البقرة: 261، 262

तर्जुमा : जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपनी माल खर्च करते हैं उसकी मिसाल उस दाने या बीज़ की तरह है जिसमें 7 बलिया हो, और हर बलि में 100 दाने हो, इससे अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं कि थोड़े से खर्च से कितना फायद, लेकिन यह फायदा दुनिया में कम और कयामत में ज्यादा मिलेगा इसलिए हमको इसका एहसास नहीं होता।

आयत नंबर 262 में अल्लाह ताला कहते हैं कि जो लोग अपने माल और दौलत को अल्लाह के रास्ते में खर्च करने के एहसान नहीं बताते हैं। उनके लिए अल्लाह ताला के नजदीक बहुत बड़ा हज रहो सवाब है और कल कयामत के दिन उन लोगों पर कोई खौफ नहीं होगा और ना ही वह लोग परेशान होंगे।

अल्लाह की राह में खर्च करना बड़े सवाब का काम हैं। जो लोग अल्लाह की राह में अपनी दौलत खर्च करते हैं अल्लाह ऐसे लोगों को बहुत पसंद करता हैं। अगर अल्लाह ने आप को दौलत से नवाज़ा हैं और आप उस दौलत को अपने ऐशो आराम और दुनियावी रंगो रौनक में खर्च कर रहे हो तो ऐसी दौलत का भी कोई फ़ायदा नहीं हैं।

उल्टा आप अपनी आख़िरत को ख़राब कर रहे हैं। अपनी आख़िरत सुधारने के लिए हम सब को चाहिए की हम अपनी दौलत अल्लाह की राह में खर्च करे यानि की ज़कात खैरात या सदके में खर्च करे अपनी दौलत का कुछ हिस्सा गरीब लोगों की मदद करने में लगाए।

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिस ने हालाल कमाई से एक खजूर के बराबर सदक़ा किया तो अल्लाह त’अला इसको अपने दहिने हाथ में ले लेता है और अल्लाह सिर्फ पाक कमाई को क़ुबूल करता हैं।

फिर इसको ख़ैरात करने वालों के लिए पलता रहता है.जिस तरह तुम में से कोई शख़्स बछड़े को पालते हो .यहाँ तक के वो ख़ैरात पहाड़ के बराबर हो जाती हैं.सदक़ा इस तरह दो के एक हाथ से दो तो दूसरे हाथ को खबर भी न हो।

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रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सदक़ा हर मुस्लमान आदमी पर हर रोज़ करना ज़रूरी हैं.लोगों ने कहा है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे पास इतना माल कहाँ हैं के रोज़ सदक़ा करें। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया के सदक़ा करने और सवाब हासिल करने के ज़रिए बहुत हैं.सिर्फ माल ही नहीं पढना भी सदक़ा है।

दूसरों को नेकी की तरफ दवात देना और गुनाहों से रोकना भी सदक़ा है रास्ते से पत्थर या कांटे हटाना भी सदक़ा है सदक़ा वो चीज़ है जिस का सवाब मौत के बाद भी मिलता रहता है।

जब इंसान अपने हाथ से सदक़ा देता है तो उस वक़्त सदक़ा 5 बातें कहता है।

  1. में फ़ानी माल था तुम ने मुझे बक़ा दे दी।
  2. में तेरा दुश्मन था लेकिन तुम ने मुझे दोस्त बना लिया।
  3. आज से पहले तू मेरी हिफाज़त करता था आज से में तेरी हिफ़ाज़त करूगा।
  4. में हक़ीर था तुम ने मुझे अज़ीम बना दिया।
  5. पहले में तेरे हाथ में था अब में अल्लाह ताला के हाथ में हूँ।

सदक़ा देने से माल में कोई कमी नहीं होती बल्कि अगर आप 1 रुपया सदक़ा देते हो तो वो अल्लाह तआला की तरफ से 10 गुनाह बढ़ कर आपको वापिस मिलता हैं।

अल्लाह की राह में खर्च करने के क्या – क्या फायदे हैं

अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करने की बड़ी फ़ज़ीलत हैं। जो आदमी सवाब की नियत से अपना माल खर्च करता हैं। वह शख्स अल्लाह के बहुत करीब हो जाता हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को हर मुसीबत और परेशानी से बचाता हैं। अपनी ज़रूरत होते हुए भी अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करना बेहतरीन सदक़ा कहलाता हैं।

 हदीस शरीफ में हैं जिस शख्स ने किसी शख्स को जिसके पास पहनने के लिए कपड़ा नहीं था उसे कपड़ा पहनाया और उसकी इज़्ज़त बढ़ाई अल्लाह करीम ऐसा करने वाले शख्स को जन्नत का जोड़ा पहनायेगा।

जिसने किसी भूके को खाना खिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलायेगा जिसने किसी प्यासे को पानी पिलाया और उसकी प्यास बुझाई अल्लाह करीम उसे जन्नती शरबत पिलायेगा। 

अल्लाह के रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं की सदक़ा और खैरात आपको बलाओं से महफूज़ रखता हैं सदक़ा खैरात करने से आप बड़ी से बड़ी मुसीबतों से बच सकते हो सदक़ा बलाओं को टाल देता हैं।

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सदक़ा किस किस तरह का होता हैं?

माल पैसा खर्च करना ही सदक़ा नहीं बल्कि सवाब का छोटे से छोटा काम भी सदक़ा कहलाता हैं। अल्लाह के रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं।

  1. इन्साफ करना भी सदक़ा हैं।
  2. किसी को सवारी पर सवार करने में मदद देना भी सदक़ा हैं।
  3. रास्ते में पड़ी तकलीफ देने वाली चीज़ को हटा देना भी सदक़ा हैं।
  4. जो आदमी खेती करता हैं और हज़ारों लोगों को अपनी मेहनत से उगाया अनाज देता हैं वह भी सदक़ा हैं।
  5. किसी ने छांव के लिए पेड़ लगा दिया ये भी एक तरह का सदक़ा हैं।
  6. परिंदो को खाना देना भी सदक़ा हैं।
  7. अपने भाई से मुस्कुरा कर बात करना भी सदक़ा हैं।
  8. किसी को अच्छी या नेक सलाह देना और किसी को गलत काम से रोकना भी सदक़ा हैं।

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सदका खैरात करने की फ़ज़ीलत पर हदीसें

( 1 ). नबीये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः जब आदमी मर जाता है तो उस के सारे आमाल खत्म हो जाते हैं मगर तीन चीजें बाक़ी पहली सदकए जारिया , दूसरी नेक औलाद जो वालिदैन के लिये दुआ करता रहे और तीसरी इल्म जो उस के बाद लोगों को फायदा पहुंचाए । ( तम्बीहुल गाफिलीन ) 

( 2 ). हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : सरकार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि इन्सान का अपनी ज़िन्दगी के अय्याम में एक दिरहम सदका करना मरने के वक़्त सौ दिरहम सदका करने से बेहतर है । ( तर्मिज़ी ) 

( 3 ). हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा से मरवी है कि एक शख़्स रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया और बोलाः या रसूलल्लाह ! मेरी माँ का अचानक इन्तिकाल हो गया । मेरा ख्याल है कि अगर वह कुछ बोल सकतीं तो ज़रूर मुझे सदका खैरात करने का हुक्म देतीं । आप फरमाएं अब अगर मैं उन की तरफ़ से कुछ सदका खैरात करूं तो क्या इस का सवाब उनको मिलेगा ? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः उसे इस का सवाब ज़रूर मिलेगा । ( बुख़ारी शरीफ़ , मुस्लिम ) 

( 4 ). हज़रत उकबा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः तुम्हारे मरहूमीन सदका और खैरात के सबब कब्र की तपिश से मेहफूज़ रहते हैं । ( तबरानी ) 

( 5 ). हज़रत सुफ़ियान सूरी रहमतुल्लाहि अलैहि फरमाते हैं कि जो शख्स हराम माल से सदक़ा देता है वह उस शख़्स जैसा है जो नापाक कपड़े को पेशाब से धोता है जिस से और भी नापाक हो जाता है । ( कीमियाए सआदत )

 ( 6 ). रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः सदका अदा करना हर मुसलमान  पर ज़रूरी है । सहाबा ने पूछाः अगर वह इस काबिल न हो ? फरमायाः अपने हाथों से कोई काम करे और उस कमाई से अपने आप को नफा पहुंचाए और कुछ सदका करे । अर्ज़ कियाः अगरं इस का मक़दूर न हो ? फरमायाः किसी हाजतमन्द की मदद करे । पूछाः अगर इस की भी ( क्या आप जानते हैं । इस्तिताअत न रखता हो ? फरमायाः अग्र बिल मअरुफ करे । सवाल कियाः अगर यह भी न कर सके ? फरमायाः अपने आप को शर पहुंचाने से बाज़ रखे , यही उस का सदका है । ( शैलेन ) 

( 7 ). हकीम बिन हिज़ाम रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ कियाः मैं जाहिलियत के दिनों में कई एक नेक काम करता था जैसे कि नमाज़ , गुलामों की रिहाई और सदका वगैरा । अब इस्लाम लाने के बाद क्या मुझे उन नेकियों का सवाब मिलेगा । रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः जो नेकियाँ तुम कर चुके हो उन्ही की बरकत से तुम मुसलमान हुए हो । ( शैखैन ) 

( 8 ). रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः मिस्कीन को सदक़ा देना तो एक सदके का सवाब है लेकिन किसी जी रहम ( रिश्तेदार ) को देना दोहरा सवाब है , एक तो सदके का दूसरा सिलए रहमी का । ( निसाई ) 

( 9 ). हज़रत अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अन्हु अपने कबीलए तय का सदका लेकर हाज़िर हुए तो चूंकि इस्लाम में यह पहला सदका था इस लिये इसे देख कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा के चेहरे खुशी से चमक उठे । ( नुज्हतुल कारी )

 ( 10 ). हज़रत अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अन्हु अपने कबीलए तय का सदका लेकर हाज़िर हुए तो चूंकि इस्लाम में यह पहला सदका था इस लिये इसे देख कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा के चेहरे खुशी से चमक उठे । ( नुज्हतुल कारी ) 

( 11 ). हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि नबीये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने जब कभी खाना लाया जाता तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पूछ लेते कि यह सदका है या तोहफ़ा । अगर कोई कह देता कि यह सदका है तो सहाबा से फरमाते तुम लोग खाओ । और अगर वह कह देता कि पेशकश है तो अपना दस्ते मुबारक बढ़ा कर नोश फरमाना शुरू कर देते । ( नुन्हतुल कारी ) 

( 12 ). हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि नबीये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने जब कभी खाना लाया जाता तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पूछ लेते कि यह सदका है या तोहफ़ा । अगर कोई कह देता कि यह सदका है तो सहाबा से फरमाते तुम लोग खाओ । और अगर वह कह देता कि पेशकश है तो अपना दस्ते मुबारक बढ़ा कर नोश फरमाना शुरू कर देते । ( नुन्हतुल कारी ) 

( 13 ). हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः न गनी के वास्ते सदका लेना जाइज़ है और न तन्दुरुस्त के वास्ते जो मेहनत कर सकता हो । ( तफसीरे नईमी ) ( 14 ).

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  फरमाते हैं : सदका सत्तर बलाओं को टालता है इन में सब से कम दर्जे की बला जुज़ाम और बर्स है । ( जामए सगीर ) 

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( 15 ). हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः जब कोई शख़्स अपने किसी नेक काम का सवाब किसी गुज़रे हुए शख्स को पेश करता है तो उस सवाब . को हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम एक नूरानी रकाबी में रख कर उस शख्स की कब्र पर ले जाते हैं और उसे ख़बर करते हैं कि तुम्हारे फुलाँ फुलाँ रिश्तेदार ने यह तोहफा तुम्हें भेजा है इसे कुबूल करो । यह सुन कर वह मुर्दा बहुत खुश होता है और उस के पड़ोसी जो ऐसे तोहफे से मेहरूम रहे बहुत गमगीन होते हैं । ( तबरानी ) 

( 16 ). हदीस में है कि पाकीज़ा बात और नर्मी का जवाब साइल का सदक़ा Sadaqah है । अगर जेब ख़ाली हो तो मीठी बात खैरात का नेअमुल बदल होती है । ( तोहफतुल वाइज़ीन ) 

( 17 ). हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  फरमाते हैं : सदका सत्तर बलाओं को दफा कर देता है , उन में सब से हल्की बला कोढ़ की बीमारी है । ( बुख़ारी शरीफ )

 ( 18 ). रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः सदक़ए फित्र देने वाले को हर दाने के बदले में सत्तर हज़ार महल मिलेंगे जिन की लम्बाई मश्रिक से मगरिब तक होगी । ( तोहफतुल वाइज़ीन ) 

( 19 ). हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः सदकए फित्र इस लिये वाजिब किया गया है कि जो कुछ रोजे की हालत में लग्व और बेहूदगी की जाती है उस के बदले मसाकीन को खाना खिलाना चाहिये । ( तफसीरे नईमी ) 

( 20 ). सखावत के लिये सब से ज़्यादा नुक्सान देने वाली चीज़ है सखावत करने के बाद एहसान जताना । उलमा ने कहा है एहसान जताना सखावत का सूद है जो हराम है । ( तोहफतुल वाइज़ीन ) ४८ ) मालो ज़र रखने वाला गनी नहीं होता बल्कि गनी वह है जो दिल का गनी हो यानी तवन्गरी दिल से होती है न कि मालो ज़र से । ( तोहफ़तुल वाइज़ीन ) 

( 21 ). हज़रत अब्दुल मुत्तलिब इब्ने रबीआ रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः सदके के अमवाल लोगों के मैल होते हैं यह मुहम्मद और आले मुहम्मद के लिये जाइज़ नहीं हैं । ( तफ़सीरे नईमी ) 

( 22 ). हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि नबीये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  हदिया कुबूल फरमाते थे और इस का इवज़ भी पूरा अता फरमाया करते थे । ( तफसीरे नईमी )

 ( 23 ). मोमिन के लिये इस में इस्लामी खू का शाइबा भी न होगा कि वह पेट भर खाए और उस का पड़ोसी भूखा हो गोया हमसाए की ख़बरगीरी मोमिन पर वाजिब और लाज़िम है । ( तोहफतुल वाइज़ीन )

 ( 24 ). रसूले मुअज्जम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः तुम में सब से अच्छा शख़्स वही है जो सब से अच्छे अख़लाक वाला हो । ( बुख़ारी शरीफ )

 ( 25 ). दिरहम और दीनार यानी मालो ज़र में गिरफ्तार जिस क़दर इन्सान हैं जिन के दिलों पर दुनियवी माल की हविस कब्जा कर चुकी है , उन के लिये अल्लाह तआला की लअनत और फिटकार है । ( तोहफतुल वाइज़ीन ) 

( 26 ). वफ़ात से एक रोज़ पहले हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा से दरियाफ्त फरमायाः ऐ आयशा , वह दीनार कहाँ हैं ? हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फौरन उठी और आठ दीनार जो रखे हुए थे ले आई और आका की बारगाह में पेश कर दिये । सरकार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दीनारों को कुछ देर तक उलटते पलट रहे । फिर फरमायाः ऐ आयशा , अगर मैं यह दीनार अपने घर में छोड़ कर अपने रब से मुलाकात करूं तो मेरा रब क्या फरमाएगा कि मेरे बन्दे को मुझ पर भरोसा नहीं था । आयशा , इन को फौरन मिस्कीनों में बाँट दो । चुनान्वे आप ने अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घर में जो आख़िरी पूंजी थी उसे निकाल कर मोहताजों में तकसीम कर दिया । ( ज़ियाउत्रबी , जिः ४ ) 

( 27 ). हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा रिवायत करती हैं कि रसवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः सखावत के दरख़्त की जड़ जन्नत में और इस की टहनियाँ दुनिया में झुकी हुई हैं,जो इस की एक टहनी को पकड़ लेगा वह टहनियों टहनियों जन्नत में पहुंच जाएगा और कंजूसी के क्या आप जानत दरख्त की जड़ बीच दोज़ख़ में और इस की शाखें दुनिया में फैली हुई हैं एक ही टहनी सीधी दोज़ख़ में पहुंचा देगी । ( तोहफतुल वाइज़ीन )

अपने माल में से एक रूपए खर्च करके किसी गरीब को देना मौत के वक़्त के सौ रूपए खर्च करने से बेहतर हैं। आजकल की दुनिया में अक्सर देखने में आता हैं की अच्छे दिनों में लोग सदक़ा खैरात की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग ये सोचते हैं की मैं कमा रहा हूँ तो अपने ऊपर ही खर्च करूँ या अपने परिवार के लिए खर्च करूँ। लेकिन ऐसे लोगों की जब मौत करीब आती हैं या वह किसी बीमारी से परेशान हो जाते हैं तब वह सदक़ा खैरात की तरफ ध्यान देते हैं। ऐसे लोग अल्लाह को बिलकुल पसंद नहीं।

आजकल देखा जाता हैं की लोग जब किसी बीमारी से परेशान हो जाते हैं या कोई मुसीबत में फंस जाते हैं तब वह अपना माल सदक़ा खैरात में लगाते हैं। लेकिन जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता हैं तो वह ऐसा कुछ नहीं करते। सदक़ा किन मुसीबतों से बचाता हैं?आजकल लोग बड़ी बड़ी बीमारियों जैसे कैंसर, हार्ट से जुडी बीमारी या डिप्रेशन से परेशान हैं या जो लोग अचानक से कंगाल हो जाते हैं उसकी पीछे सबसे बड़ी वजह यही हैं की वह अपना माल अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते।

ऐसे लोग जब ऐसी मुसीबत में फंस जाते हैं या किसी बीमारी के शिकार हो जाते हैं तब लाखो रूपए हॉस्पिटल में लगाकर अपना इलाज करवाते हैं फिर भी बिलकुल सही नहीं होते। अगर हम अपना माल का कुछ हिस्सा सदक़ा खैरात में लगा दे तो बेशक इन सारी मुसीबतों से बच सकते हैं। 

लाखो रूपए अपने इलाज में लगाने से बेहतर हैं अपने माल का कुछ हिस्सा सदक़ा खैरात ज़कात या फ़ितरा में लगाए। अगर आप दिन के 100 रूपए भी कमाते हैं तो उसमे से एक रूपया या 5 रुपये रोज़ किसी गरीब को दे दें तो वह गरीब जो आपको दुआ देगा उस दुआ से आप हज़ारों मुसीबतों से बच सकते हैं।

सदक़ा की बरकत से अल्लाह का अज़ाब ठंडा हो जाता हैं। अगर अल्लाह को राज़ी रखना चाहते हो तो सदक़ा खैरात करते रहो ताकि उसकी बदौलत आपको दुनिया और आख़िरत में खुशहाली मिल सके और ज़िंदा रहते आपको किसी मुसीबत का सामना न करना पड़े। 

अल्लाह हमें अपने माल का कुछ हिस्सा सदक़ा और खैरात में लगाने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 


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