Islam Mein Damaad Par Sasural Ke Huqooq

इस्लाम में दामाद पर ससुराल के हुकूक

“इस्लाम के माशरती (दैनिक जीवन) निजाम में खानदान को बहुत ही खुसूसी हैसियत हासिल है खानदान की मजबूती ही माशरे की मजबूती की अलामत है।”

शादी एक बहुत ही इज्जतदार समारोह होता है, जिससे खानदान के इज्जतदार मर्द और औरत के ससुराल का रिश्ता वजूद में आता है। आज हम आपको Islam Mein Damaad Par Sasural Ke Huqooq क्या है बताने जा रहे है 

“इस्लाम इंसानी रिश्तो में एक दूसरे के साथ मोहब्बत, एहतराम, वफा, खुलूस, हमदर्दी, अदलों इंसाफ, एहसान और एक दूसरे के साथ मदद करने का पैग़ाम देता है।”

मायके हो या ससुराल दोनों अपनी जगह मोहतरम है दोनों इंसान की बुनियादी जरूरत निकाह के इजहार का नाम है दोनों हर घर की इमारत का बुनियादी सुतुन है।

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मर्द पर ससुराल के कुछ हुकूक

मेहरबानी करके नीचे लिखी बातों को एक बेटी के बाप की हैसियत से या एक बहन के भाई की हैसियत से पढ़ें-

“नबी सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने फरमाया”-

कोई बंदा उस वक्त तक सच्चा मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही पसंद ना करें जो अपने लिए पसंद करता है

यकीनन आप चाहते होंगे कि आपका दामाद आप के हवाले से नीचे लिखी बातों का ख्याल रखें लेकिन क्या आप खुद भी ब हैसियत दमाद इन बातों का ख्याल रखेंगे?

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दामाद पर ससुराल के हुकूक क्यों?

“रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम का फरमान है”-

तुम में से हर शख्स जिम्मेदार है और अपनी रैयत का जवाब देह है सरकार अपनी जनता की जवाब देह है और आदमी अपने परिवार के मुतालिक जवाब देह है

मर्द के परिवार में उसके बीवी बच्चों के अलावा उसके मोतहत लोग भी शामिल हैं, मर्द की जिम्मेदारियों में से एक अहम जिम्मेदारी यह भी है कि वह अपनी बीवी के करीबी रिश्तेदारों के हुकूक अदा करें जो उसके ससुराल वाले हैं इस जिम्मेदारी की तीन बुनियादी वजह हैं-

  1. अल्लाह ताला ने अहले कराबत के हुकूक अदा करने का कुरान ए मजीद में तकरीबन 10 जगह हुकुम दिया है।
  2. मर्द के ससुराल मर्द की बीवी के अहले कराबत हैं क्योंकि औरत मर्द के मोतहत है औरत के तमाम मामलात का अख़्तियार उसी के हाथ में है इसलिए शौहर का यह फर्ज है कि वह बीवी को उसके अपने मां बाप और करीबी रिश्तेदार के हुकूक अदा करने की इजाजत दें।
  3. ससुराल मर्द के बच्चों का ननिहाल हैं क्योंकि बच्चों के मामलात का अख्तियार भी बाप के हाथ में है इसलिए उसका फर्ज है कि अपने बच्चों को उनसे मिलने जुलने की छूट दे।

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक दामाद के रूप में-

क्योंकि खानदानी निजाम की इमारत और उसका कंट्रोल मर्द के हाथ में है, औरत को अल्लाह ताला ने उसके मोतहत बनाया है इसलिए औरत की निस्बत मर्द को औरत से हुस्ने सलूक करने और उसके हुकूक अदा करने की ज्यादा ताकीद की गई है।

“आप सल्लल्लाहो वाले वसल्लम ने फरमाया”-

“कामिल ईमान वाले वह लोग हैं जो अपने अखलाक में सबसे अच्छे हो और तुम में सबसे अच्छे वह है जो अपनी बीवियों के हक में सबसे अच्छे हो”।

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बीवी के साथ बेहतरीन सुलूक

इसका एक पहलू उसके वालेदैन और करीबी रिश्तेदार से अच्छा सलूक करना उनका एहतराम करना और उनके हुकूक अदा करने की बीवी को इजाजत देना है

कुछ घरों में बात -बात पर बीवी को मां-बाप के ताने दिए जाते हैं उनमें कई प्रकार की खामियां तलाश की जाती हैं हालांकि सास और ससुर दामाद के लिए मां और बाप के जैसे हैं जिस तरह वह अपने मां बाप की खामियां नजर अंदाज करता है। उनकी भी खामियां नजर अंदाज करनी चाहिए अगर बीवी का खानदान नापसंद था तो उसमें से बीवी ही क्यों चुनी, उनमें से बीवी चुनने के बाद उस खानदान की इज्जत करना जरूरी है।

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ससुराल के यहां तोहफा भेजना

यूं तो सब मुसलमानों के लिए हुकुम है लेकिन करा बत की सूरत में और भी ज्यादा जरूरी है “रसूल ल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम “-इसका इतना ख्याल रखते की बीवियों की सहेलियों के यहां भी तोहफा भिजवाते।

“अगर जरूरत पड़े तो बेसहारा ससुराली अफ़राद की देख भाल करना चाहिए

ससुराल से किसी के आने पर खुशी का इजहार करना चाहिए।

माज़ुर और ज्यादा उम्र के रिश्तेदार से खुद जाकर मिलना चाहिए।

बीवी अपने रिश्तेदार को अगर कुछ तोहफा देना चाहे तो उसे ऐसा करने की इजाजत दें बशर्ते की बीवी उसमें फिजूलखर्ची से काम ना ले।

अपने बच्चों में उनके ननिहाल की मोहब्बत और इज्जत पैदा करें।”

https://www.youtube.com/watch?v=w9SgfRO4o64&t=2s

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