Qurbani Ka Tarika (2022)

Qurbani Ka Tarika

Eid-ul-Adha यानी कि बकराईद के मैके पर हम लोग अल्लाह तबारको ताला के हुक्म पर क़ुरबानी तो करवाते है लेकिन साल में एक बार क़ुरबानी करने से हम Qurbani Ka Tarika और दुआ भूल जाते है। इस वजह से हम परेशानी में पड़ जाते है।

इस आर्टिकल में हम कुर्बानी क्या है? कुर्बानी कैसे करे? और इसके अहम मसाइल के बारे में तफसील से बात करेंगे।

क़ुर्बानी क्या है?

जकात सदका और फितरा ही की तरह कुर्बानी भी एक माली इबादत है जोकि मालदार पर वाजिब है।
इसके अलावा कुरनी इबराहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत भी है। जो इस उम्मत के लिए (हमेशा) बाकी रखी गई है।

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क़ुर्बानी किसे कहते हैं?

जैसा कि नाम से जाहिर है कि अल्लाह की राह में अपनी किसी प्यारी चीज को कुर्बान करना यानी कि दे देना कुर्बानी कहलाता है। कुर्बानी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बताए हुए तरीके से जो जानवर हैं उस हलाल जानवर को सवाब की नियत से अल्लाह के वास्ते जिबह करने को कुर्बानी कहते हैंं।

कुरबानी किसके लिए होनी चाहिए?

बेशक हमारी तमाम इबादत सिर्फ अल्लाह ही के लिए होती है तो कुर्बानी भी सिर्फ अल्लाह के लिए होती है। कुर्बानी के बारे में कुरान शरीफ में अल्लाह ताला फरमाते हैं।
“आप कह दीजिए बेशक मेरी नमाज़ और मेंरी कुरबानी और मेरी जिन्दगी और मेरी मौत सिर्फ अल्लाह तआला के लिए ही है ! और जो तमाम जहानो का परवरदिगार है। (सूरए अनआम)

इस आयते मुबारका ने वाज़ेह तौर पर बता दिया कि एक मुसलमान की पूरी ”जिन्दगी सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला के लिए ही होती है। मुसलमानो की हर इबादत सिर्फ उसी जात के लिए होती है जो उसका ख़ालिक़ व मालिक है।

कुरबानी भी जो एक अहम तरीन इबादत हैं। और जिसके ज़रिए इंसान अपने रब का तक़र्रूब हासिल करता है। वह भी महज़ रजाए इलाही के लिए करनी चाहिए।

इसके अलावा न तो यह कुरबानी किसी बुत या बुजुर्ग के नाम पर हो न ही इसका मकसद लोगों को दिखलाना या शौहरत हो वर्ना कुरबानी का सवाब और मकसद दोनो बर्बाद हो जाएंगे।

आज कल रिवाज़ है कि बाज़ मालदार लोग कीमती जानवर ख़रीदते हैं। और फिर अखबारात व्हाट्सएप्प फेसबुक और सोशल मिडिया पर एहतिमाम से यह खबर और तस्वीर शेयर करते है। इस दिखावे से हमें बचने की कोशिश करनी चाहिए। हमें डरना चाहिए कि कहीं हमारी क़ुरबानी बर्बाद न हो जाय।

क़ुरबानी अल्लाह सुब्हानहु व ताअला का फरमान

अल्लाह तआला को तुम्हारें दिल का तक़वा चाहिए, अल्लाह तआला को उऩ ( कूरबानियाे ) का गाेश्त और खून नही पहुँचता लेकिन उसको तुम्हारे दिल का तक़वा पहूँचता है। ( सूरए हज )

इस आयत में कुरबानी का अस्ल फलसफा बयान फरमाया यानी जानवर को ज़िबह कर के महज़ गोश्त खाने खिलाने या उसका खुन गिराने से तुम अल्लाह की रजा कभी हासिल नही कर सकते न यह गाेश्त और खून उठकर उसकी बारगाह तक पहुंचता है।

उसके यहां तो तुम्हारे दिल का तक़वा और अदब पहूंचता है। कि किस खुश दिली और जोशे मुहब्बत के साथ एक कीमती और नफीस चीज़ उसके कुक्म से उसके नाम पर कुरबान कर दी। कहने का मतलब ये कि इस कुरबानी से जाहिर कर दिया कि हम खुद भी तेरी राह मे इसी तरह कुरबान होने के लिए तय्यार है।

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नमाज़ और कुरबानी एक साथ

कुरान शरीफ में अल्लाह ताला ने कुर्बानी और नमाज का एक साथ जिक्र किया है।

बेशक हमने आपको कौसर अता की, बस आप अपने रब के सामने नमाज़ पढ़े। और कुरबानी करें। बिला-शुबहा आपका दुश्मन ही बेनिशान होने वाला है। ( सूरए कौसर)

दीने इस्लाम में नमाज़ का जाे कुछ मकाम व मरतबा है उससे हर मुसलमान बखूबी वाकिफ़ है। यही दीन का सुतून और मोमिन की मेराज है। यही काफिर और मोमिन के दर्मियान फ़र्क़ करने वाली चीज है।

माली इबादत में ज़कात साहिबे निसाब के लिए फ़र्ज़ है। इसी तरह माली इबादात में कुरबानी का एक खास मकाम है। क्यों कि अस्ल तो यह था कि अपने जान और माल की कुरबानी दी जाती और बवक़्ते जरुरत हर मुसलमान दीने इस्लाम के लिए यह सब कूछ कुरबान कर देता।

लेकिन आम हालात मे जिलहिज्जह की दसवीं तारीख़ को हज़रत इब्राहीम व इस्माईल अलेहिस्सलाम की याद में जानवर जिबह करने को ही काफी करार दे दिया। इस पर हमें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए की हम अपनी तरफ से जानवर की क़ुरबानी करते है और अल्लाह ताला उसको कुबूल करते है। जिसेसे कुरबानी की अज़मत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

क़ुर्बानी किस पर वाजिब हैं ?

कुर्बानी हर बालिक मुसलमान मर्द और औरत पर वाजिब है जिनके पास साहिबे निसाब से जयादा माल है। साहिबे निसाब की पूरी तफसील हमने जकात क्या है? और कैसे अदा करें आर्टिकल में दी हुई है।

मालिके निसाब से मुराद इतना माल होना है। जितना माल होने से सदकए फित्र वाजिब होता है।

इसके आलावा जो लोग साहिबे निसाब तो नहीं हो लेकिन इतना पैसा हो की क़ुरबानी में हिस्सा ले सकते हो तो उनको भी क़ुरबानी जरूर करना चाहिए।

कुर्बानी जिस तरह मर्द पर वाजिब है इसी तरह औरत पर भी वाजिब है। इस शर्त के साथ कि कुर्बानी वाजिब होने के शराइत पाए जाएं।

कुर्बानी वाजिब होने के लिए माल पर साल गुजरना ज़रुरी नहीँ है। अगर कुर्बानी के दिनो में ही किसी का माल निसाब को पहुंच जाये तो उस पर भी कुर्बानी वाजिब है।

घर परिवार में कुर्बानी उस शख्स पर वाजिब है जो माले निसाब का मालिक हो। अगर किसी ने अपने नाम से कुर्बानी करने के बजाए घर के उन अफ़राद के नाम से क़ुरबानी की जो माले निसाब के मालिक नहीं है जैसे बच्चे, या फौत शुदा लोग तो उनकी तरफ से कुर्बानी नफ़्ल अदा होगी।

और वो शख्स जो साहिबे निसाब था और अपने नाम से क़ुरबानी नही की तो गुनाहगार होगा।

हां अपने नाम से क़ुर्बानी करने के साथ बाद या पहले घर के दूसरे लोगों के नाम से भी दूसरी अलग कुर्बानी का इंतेजाम करना बहुत ही उम्दा और अच्छा काम है।

याद रहे कि साहिबे निसाब पर हर साल कुर्बानी वाजिब है। कुछ लोगों का यह खयाल है कि अपनी तरफ से जिन्दगी में सिर्फ एक बार कुर्बानी वाजिब है। शरअन गलत और बे बुनियाद है (अनवारूल हदीस)

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कुर्बानी के दिन

कुर्बानी के तीन दिन हैं 10 वीं जिल्हिज्जह की सुबह सादिक से 12 वीं जिल्हिज्जह के गुरुबे आफ़ताब तक यानी तीन दिन और दो रातें मगर शहर में नमाजे ईद से पहले कुर्बानी नही कर सकते।

आप जहा रहते है उस इलाके में कही पर भी ईद की नमाज़ हो जाये तो उसके बाद आप क़ुरबानी कर सकते है। लेकिन बेहतर ये है की खुद ईद की नमाज़ पढ़ने के बाद ही क़ुरबानी करे।

ईद की दसवीं तारिख की सुबह सादिक से लेकर बारहवी तारिख के, गुरुब आफ़ताब तक क़ुरबानी करने का वक़्त है, इन तीन दिनों में जिस दिन आप चाहो क़ुरबानी कर सकते हो, और सब से बेहतर दिन 10 तारिख बक़रीद का दिन है। 

शहर और कसबे वाले अपनी क़ुरबानी किसी दिहात या गाओं में भेज कर ईद की नमाज़ से पहले अगर करना चाहें तो दुरुस्त है।  

शहर और कस्बो में जहाँ ईद कि नमाज़ होती है, ईद की नमाज़ से पहले क़ुरबानी दुरुस्त नहीं है, जिन दिहात और गाओ में नमाज़ नहीं होती वहाँ नमाज़ से पहले सुबह सादिक के तुरंत बाद क़ुरबानी कर सकते हैं।

हां देहात में सुबह सादिक ही से हो सकती है। लेकिन मुस्तहब ये है कि सूरज निकलने के बाद करे। कुर्बानी के लिए सबसे अफजल पहला दिन है फिर दूसरा, फिर तीसरा।

कुर्बानी तीन दिन करना, यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा एकिराम रदियल्लाहु अन्हुम की सुन्नते मुबारका है।

हज़रत उमर, हज़रत अली, हज़रत अब्बास रदियल्लाहु अन्हुम फ़रमाते हैं “अय्यामुन्नहरे सलासतुन” कुर्बानी के तीन दिन हैं। लिहाजा साबित हुआ कि कुर्बानी तीन दिन करना नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबए किराम रदियल्लाहु अन्हुम की मुक़द्दस सुन्नत है।

नोट : कुर्बानी के तीन दिनों के वक्त में कुर्बानी ही करनी वाजिब है। इतनी कीमत या इतनी कीमत का जानवर सदका करने से वाजिब अदा नही होगा। और कुर्बानी का वक़्त गुज़र जाने के बाद कुर्बानी बंद हो जाती है यानि उसके बाद अब नही हो सकती।

अगर कुर्बानी के लिए कोई जानवर ख़रीद रखा है तो उसको सदका करदे वरना एक बकरी की कीमत सदका करे। और कुर्बानी के लिए जानवर ख़रीदने के बाद कुर्बानी करने से पहले जानवर ने बच्चा दे दिया तो कुर्बानी के ही दिनो में उसे भी ज़ब्ह कर दें।

बेच दिया तो उसकी कीमत सदका करें और ना ज़ब्ह किया ना बेचा और अय्यामे नहर गुज़र गए तो सदका करे ( बहारे शरीअत )

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कुर्बानी का जानवर

क़ुरबानी के लिए जानवर में ऊंट 5 साल, भैस 2 साल, भेड़-बकरी 1 साल की इससे उम्र कम हो तो कुर्बानी जाइज़ नहीं। हां अगर दुम्बा या भेड का 6 माह का बच्चा इतना बडा हो कि दूर से देखने में साल भर का मालूम होता हो तो उसकी भी कुर्बानी जाइज़ है।

ये बात याद रखिए सिर्फ 6 माह के दुम्बे की कुर्बानी जाइज़ नहीं बल्कि उसका इतना तंदुरुस्त होना ज़रुरी है कि दूर से देखने में साल भर का लगे तभी उसकी क़ुर्बानीं हो पायेगी। कुर्बानी का जानवर मोटा ताजा और बिना ऐब का होना चाहिए।

अगऱ थोडा सा ऐब हो तो कुर्बानी मकरूह होगी और ज्यादा ऐब हो तो कुर्बानी होगी ही नही।

नोट – शरीअते इस्लामिया में जानवर की उम्र का लिहाज़ किया गया है. दांतो का नहीं बहुत से लोग दांतो पर ध्यान देते है ये उनकी भूल है लिहाजा उम्र का ख़याल रखा जाए। जिस जानवर की शरअन जो उम्र तय है वही होनी चाहिए। दांत अगरचे कमोबेश हो।

Qurbani Ka Tarika

कुर्बानी का तरीका

कुर्बानी के जानवर को बाएं पहलू पर इस तरह लिटाएं कि किब्ले की तरफ उसका मुंह हो और ज़ब्ह करने वाला अपना दाहिना पांव उसके पहलू पर रख कर तेज छूरी से जल्द ज़ब्ह कर दे।

Qurbani Ki Dua

जानवार को ज़बह करने से पहले यह दुआ पढ़े:

इन्नी वज्जहतु वजहिय लिल्लज़ी फ़तरस्समावाति वल्अरज़ा हनीफ़ंव व मा अना मिनल्मुशरिकीन, इन्ना सलाती व नुसुकी व महयाया व ममाती लिल्लाहि रब्बिल अ़ालमीन, ला शरीक लहु व बिज़ालिक उमिरतु व अना मिनल्मुस्लिमीन, अल्लाहुम्म मिन्क व लक, बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर

 पढ़कर ज़बह करे।

क़ुर्बानी अगर अपनी तरफ़ से है, तो ज़बह करने के बाद यह पढ़े

 अल्लाहुम्म तक़ब्बल मिन्नी कमा तक़ब्बल्त मिन् ख़लीलिक इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम व हबीबिक मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम

 और अगर दुसरी की जानिब से ज़बह किया जाए, तो ‘मिन्नी’ की जगह ‘मिन फलां’ कहा जाए 

Qurbani Ki Dua Hindi

Qurbani Ki dua in Hindi

अन के बाद अपना या फिर जिस की तरफ से ज़बह कर रहे हो उस का नाम लें उसके बाद बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर कह के जबाह करें। 

Qurbani Ki Dua Arabic

Qurbani Ki dua in Arabic

तर्जमा मैने अपना मुंह उसकी तरफ़ किया जिसने आसमान और ज़मीन बनाए और मैं मुश्रिक़ीन में नहीँ । (सूरह अनआम )

अल्लाहुम्म लका वमिन का बिस्मिल्लाहीँ अल्लाहु अकबर दुआ ख़त्म होते ही छुरी चला दें।

कुर्बानी अपनी तरफ से हो तो ज़ब्ह के बाद ये दुआ पढे ।

अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी कमा तकब्बलता मिन ख़लीलिक इबराहीमा अलैहिस्सलामु व हबीबिक मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !

अगर दूसरे की तरफ से ज़ब्ह किया हो तो मिन्नी कीं जगह मिन फला कहें। यानी उसका नाम ले। मतलब अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन ( यहाँ जिसकी तरफ से क़ुरबानी हो उसका नाम ले जैसे- मिन आदिल, मिन उमर वगैरह ) कमा तकब्बलता मिन ख़लीलिक इबराहीमा अलैहिस्सलामु व हबीबिक मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।

और अगर जानवर मुश्तरक ( शिरकत की कुर्बानी ) हो। मतलब कुछ लोग मिलकर क़ुर्बानी कर रहे हो तो – ऊंट, भैंस वगेरह, तो फला ( मिन ) की जगह सब शरीको के नाम ले।

ज़बाह की कुछ हिदायत 

  • ज़बाह से पहले चारा खिलाना, पानी पिलाना और छुरी पहले ही खूब तेज़ करके रख लें। 
  • जिबह करते वक्त अगर जिबह करने वाले से छुरी न चल रही हो और कोई दूसरा शख्स मदद के लिए साथ में छुरी पकड़ कर जिबह करवाता है तो दोनों लोग को बिस्मिल्लाहीँ अल्लाहु अकबर पढ़ना जरुरी होगा सिर्फ एक के पढ़ने से क़ुरबानी सही नहीं होगी।
  • एक जानवर को दूसरे जानवर के सामने ज़बाह करना या जानवर के सामने छुरी तेज़ करना मकरू है। 
  • गर्दन के ऊपर से छुरी चलाना और जानवर को ठंडा होने से पहले खाल उतारना मकरू हे । 
  • ज़बाह की जगह ले जाते वक़्त घसीट के ले जाना और बहुत सख्ती से गिराना भी मकरू है ।  

नोट : कुर्बानी का जानवर अगर खुद ज़ब्ह ना कर सके तो किसी सहीहुल अकीदा ही से ज़ब्ह कराएं। अगर किसी बद अकीदा और बेदीन से क़ुर्बानी का जानवर ज़ब्ह कराया तो कुर्बानी नही होगी।

आप कसाई से पहले ही कह दे की जिबह कर के जानवर को ठंडा होने दे। खाल उतारने में जल्दी बाजी ना करने दे

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क़ुरबानी की कुछ हिदायत 

  • कुरबानी के दिन कुरबानी होने तक रोज़ा रखना चाहिए जो एक असल से, लेकिन क़ुरबानी से पहले खाना मुस्तहिब हे यानि की अगर कुरबानी के गोश्त से पहले कुछ खा लिया तो कोई गुनाह नहीं।
  • कुछ लोग कहते हे की जितने लोगो ने जानवर में हिस्सा लिया हे सब को ज़बह करने से पहले बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर केहना ज़रूरी हे, यह बिलकुल गलत है। 
  • क़ुरबानी करने वाले को ही ( जबाह करने वाले को ) ही बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर केहना ज़रूरी है। 
  • अक्सर लोग गोश्त को बिना तोले बाटते हैं यह बिलकुल भी जाएज़ नहीं गोश्त को तोल के बराबर बराबर बाटना चाहिए। 
  • कुछ लोग ज़बाह से पहले ही खाल फरोख्त कर देते हैं तो याद रहे ज़बाह से पहले खाल की फरोख्त करना हराम है। 
  • क़ुरबानी का जानवर खूब मोटा, ताज़ा खूबसूरत होना चाहिए। 

कुरबानी का गोश्त

बस जब वह जानवर अपने पहलू पर गिर जाए ( यानी जिबह मुकम्मल हो जाए ) तो उससे खुद भी खाओ और खिलाओ उनको जो सब्र किए बैठे है। और उनको भी जो बेकरारी जाहिर करते हैं। ( यानी सवाल करते है ) इसी तरह हम ने उन जानवरो को तुम्हारें काबू में दे दिया है ताकि तुम शुक्र अदा करो। ( सूरए हज )

इस आयत से मालूम हुआ कि जानवरों से खुद खाना जाइज़ और दुरुस्त है। बल्कि अगर सारा गोश्त खुद ही रख ले तो यह भी जाइज़ है। लेकिन पसंदीदा नहीं।

  • अच्छा यह है कि क़ुरबानी के गोश्त के तीन हिस्से करें, एक हिस्सा आम मसाकीन के लिए, दूसरा हिस्सा अपने करीबियों के लिए, और तीसरा हिस्सा अपने लिए। अगर सारा गोश्त खुद रखना चाहो तो भी जाएज़ है
  • क़ुरबानी का गोश्त आप काफिर को भी दे सकते हो
  • अपनी क़ुरबानी का गोश्त बेचना जाएज़ नहीं और अगर बेच दिया तो सारी रकम हराम है, सारी रकम किसी मिस्कीन को देना ज़रूरी है।
  • अगर किसी ने किसी को गोश्त दिया और उसने बेच दिया उसके लिए रकम का इस्तेमाल करना जाएज़ है।
  • मय्यित की वसीयत पर तिहाई माल से क़ुरबानी करी तो पूरा गोश्त मसाकीन को सदका करना वाजिब है।
  • अगर नौकर या मुलाज़िम का खाना उसकी तनख्वाह का हिस्सा हो यानी उसका खाना भी तनख्वाह में शुमार किया जाता हो तो ऐसे मुलाजिम या नौकर को क़ुरबानी का गोश्त खाने में देना जायज नहीं होगा अगर यह सूरत इख्तयार की जाए कि उसको उन दिनों के खाने की कीमत दे दे फिर खिलाना जाएज़ होगा अलबत्ता जिनका खाना नहीं उसको खिलाना जायज है।

आखिर में फ़रमाया कि गोश्त ज़रूर खाओ। मगर साथ अपने रब का शुक्र अदा करो। ताकि नेमतों में मजीद इजाफा हो। फिर यह भी देखो कि कितने ताक़तवर जानवरों को तुम कितनी आसानी से ज़िबह कर लेते हो यकीनन यह अल्लाह करीम ही की जात है जिसने तुम्हें उन पर क़ाबू दे दिया है। इस लिए उसका दिल से खूब शुक्र अदा करो।

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कुरबानी के बाल सींग और खुर

कुरबानी के बाल सींग और खुर भी नामए आमाल मे लिखे जाते है। हज़रत आएशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी करीम सल्लललाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

कुरबानी के दिन ( दस जिलहिज्जह. को ) कोई नेक अमल अल्लाह तआला के नज़दीक कुरबानी का खून बहाने से बढ़ कर महबूब और पसंदीदा नहीं और कयामत के दिन कुरबानी करने वाला अपने जानवर के बालों, सींगों और खूरो को ले आएगा और यह चीजे सवाबे अजीम मिलने का ज़रिया बनेंगी।

फ़रमाया कि कुरबानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले अल्लाह तआला के नज़दीक शरफ़े कूबूलियत हासिल कर लेता है लिहाजा तुम खुशदिली के साथ कुरबानी किया करो। ( तिरमिजी शरीफ )

हज़रत इब्ने अब्बास रजियल्लाहू तआलाअन्हुमा फरमाते है : कि रसूलअल्लाह सल्लललाहो अलैहि वसल्लम ने बकरईद के दिन फरमाया कि आज के दिन कोई शख्स कुरबानी से बेहतर अमल नहीं कर सकता। सिवाए यह कि सिला रहमी करे

याद रहै कि सिला रहमी नफ़्ली कुरबानी का बदल तो हो सकती है वाजिब कुरबानी का नहीं (तबरानी)

खाल का बयान 

  • जानवर की खाल उतरने में बे एहतयाती की वजह से खाल में सुराख़ करके उसे बेकार और कम कीमत बनाना जाएज़ नहीं।
  • खाल उतारने से पहले उसे बेचना जाएज़ नहीं ।
  • जानवर की खाल की कीमत मस्जिद, मदरसे  किसी भी तरह के शफाखाना बनाने के लिए देना जाएज़ नहीं, कियोंकि खाल की कीमत को फ़कीर को देना चाहिए लेकिन जहा फ़कीर नहीं पाए जाते वहा मदरसे में पढ़ने वाले बच्चो के ऊपर खर्च कर सकते हैं।

क़ुरबानी के मकरूहात

वो काम जिससे क़ुरबानी का सवाब काम हो सकता है। यह काम भूल कर भी ना करें।

  • लोहे के बिना किसी दूसरी चीज़ के ज़रिये या गन्दी छुरी से क़ुरबानी करना
  • जानवर को लेटने के बाद छुरी तेज़ करना या फिर उसके सामने तेज़ करना 
  • ठंडा होने से पहले सर काटना या खाल उतारना 
  • क़िबला रुख किये बिना ज़ाबाह करना या फिर छुरी हराम मगज़ तक पोहचाना, या गर्दन काट कर अलग करना। क़ुरबानी से पहले जानवर के बाल काटना, उस पर सवार होना, बोझ लादना,उसे किराय पर चढ़ाना। 
  • उस का दूध निकालना, और गोबर का इस्तेमाल करना अगर जानवर को घर में बांड करके चारा खिलाया जाय तो उसके दूध और गोबर उसी की मलकियत है, सदका करने के बजाये इस्तेमाल में ला सकते हैं 
  • जानवर के रस्से को भी इस्तेमाल में नहीं लाना चाहोये उसके सरे सामान को सदक़ा कर देना चाहिए 
  • क़ुरबानी रात में नहीं करनी चाहिए। 

Source : Sunnah.com

व अखिरू दावाना अलाह्म्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीन

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