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Islam Me Rasmo Rivaj: इस्लाम में रस्मों-रिवाज़ और बिदअत की हकीकत
Islam Me Rasmo Rivaj: क्या इस्लाम में शादी, गमी और खुशी के मौकों पर की जाने वाली रस्में जायज़ हैं? जानिए उन रस्मों के बारे में जो बिदअत हैं और जिनसे बचना ज़रूरी है।

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इस्लाम (Islam) एक मुकम्मल दीन है जिसने हमें जीने का सही तरीका सिखाया है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज हमारे समाज में बहुत सी ऐसी रस्में (Customs) और रिवाज़ (Traditions) शामिल हो गए हैं जिनका कुरान और हदीस से कोई ताल्लुक नहीं है।
ये रस्में अक्सर गैर-मुस्लिमों की देखा-देखी या जहालत की वजह से अपना ली गई हैं। इस्लाम में हर वो नया काम जिसे दीन समझकर किया जाए और जिसका सबूत शरीयत में न हो, उसे “बिदअत” (Innovation) कहते हैं, और हर बिदअत गुमराही है।
इस आर्टिकल में हम Islam Me Rasmo Rivaj की हकीकत और उन गलतियों के बारे में जानेंगे जो हम अनजाने में कर रहे हैं।
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शादी-ब्याह की गलत रस्में (Marriage Rituals)
शादी को इस्लाम ने बहुत आसान बनाया था, लेकिन हमने रस्मों के ज़रिए इसे मुश्किल बना दिया है।
- सेहरा और बाजा: दूल्हे को सेहरा बांधना या बारात में बाजा बजाना और नाचना-गाना इस्लाम में जायज़ नहीं है।
- चावल फेंकना: विदाई के वक़्त दुल्हन के पीछे चावल या पैसे फेंकना एक अंधविश्वास (Superstition) है, इसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं।
- मांग में सिंदूर: कुछ इलाकों में मुस्लिम औरतें भी मांग में सिंदूर भरती हैं, जो कि सरासर हिंदुओं की रस्म है और शिर्क के करीब है।
- तारीखें और मुहूर्त: यह मानना कि फलां तारीख (जैसे 3, 13, 23) मनहूस है, गलत अकीदा है। इस्लाम में कोई दिन या तारीख मनहूस नहीं होती।
- जहेज़ (Dowry): लड़के वालों का लड़की वालों से जहेज़ मांगना हराम है। इस्लाम में मेहर (Mahr) फ़र्ज़ है जो लड़का लड़की को देता है, न कि उल्टा।
पैदाइश और खुशी के मौकों की रस्में
- सालगिरह (Birthday): जन्मदिन मनाना, केक काटना और मोमबत्तियां बुझाना ईसाइयों (Christians) का तरीका है। इस्लाम में इसकी कोई असल नहीं है।
- खतना (Circumcision) का जश्न: खतना सुन्नत है, लेकिन इस मौके पर बड़े-बड़े फंक्शन करना, दावतें करना और इसे शादी जैसा बना देना फिजूलखर्ची है। इसे सादगी से करना चाहिए।
- पहला रोज़ा: जब बच्चा पहला रोज़ा रखता है तो उसे हार पहनाना और बड़ा जश्न मनाना। यह हौसला-अफ़ज़ाई के लिए ठीक हो सकता है, लेकिन इसे दीन का हिस्सा या लाज़िम रस्म समझना गलत है।
मौत और गमी की रस्में (Death Rituals)
इस्लाम ने मौत के वक्त भी सादगी का हुक्म दिया है, लेकिन हमने इसमें भी कई रस्में जोड़ दी हैं:
- तीजा और चालीसवां: मरने के तीसरे दिन (तीजा) या 40वें दिन (चालीसवां) खाना पकाना और दावत करना। यह सब बिदअत है। ईसाल-ए-सवाब (Eisal-e-Sawab) के लिए कोई दिन मुकर्रर नहीं है, आप कभी भी सदका या दुआ कर सकते हैं।
- बरसी (Death Anniversary): हर साल मरने वाले की बरसी मनाना। इस्लाम में सिर्फ 3 दिन का सोग (शोक) है (बीवी के लिए 4 महीने 10 दिन), उसके बाद ज़िन्दगी मामूल पर आ जानी चाहिए।
- कब्रों पर चादर चढ़ाना: मज़ारों या कब्रों पर चादरें चढ़ाना, दिए जलाना और उनसे मांगना शिर्क और बिदअत के दायरे में आता है।
सफर और मुहर्रम की गलतफहमियां
- सफर का महीना: कुछ लोग सफर के महीने को “तेरा तेज़ी” कहते हैं और इसे मनहूस समझते हैं। हदीस में साफ़ है कि “सफर का महीना मनहूस नहीं है”।
- मुहर्रम और ताजिया: मुहर्रम में ताजिया (मकबरे की नक़ल) बनाना, ढोल बजाना या मातम करना इस्लाम में हराम है। यह गम का नहीं, बल्कि शहादत से सबक लेने का महीना है।
786 और बिस्मिल्लाह की हकीकत
अक्सर लोग “बिस्मिल्लाह” की जगह “786” लिखते हैं।
- 786 सिर्फ “बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम” के हुरूफ के नंबरों (Abjad) का जोड़ है।
- कुरान में या हदीस में कहीं भी 786 लिखने का हुक्म नहीं है।
- 786 लिखने से बिस्मिल्लाह पढ़ने का सवाब नहीं मिलता। इसलिए पूरा “बिस्मिल्लाह” लिखना और पढ़ना चाहिए।
अंधविश्वास और दूसरी रस्में
- दरिया में सिक्के डालना: सफर करते वक़्त दरिया में पैसे फेंकना यह सोचकर कि इससे बला टल जाएगी, यह माल की बर्बादी है और अंधविश्वास है। बेहतर है कि वो पैसे किसी गरीब को दे दें।
- पूजा के लिए चंदा: अगर कोई गैर-मुस्लिम पूजा के लिए चंदा मांगे, तो उसे पूजा के लिए पैसा देना जायज़ नहीं क्योंकि यह शिर्क में मदद करना है। आप उसे वैसे ही मदद के तौर पर पैसे दे सकते हैं (बिना पूजा की नीयत के)।
- नए घर/दुकान की रस्में: नया घर या दुकान लेते वक़्त नींबू-मिर्ची लटकाना या दूध उबालना। इस्लाम में बरकत के लिए कुरान की तिलावत और सदका करना चाहिए, न कि टोटके।
- तावीज़ पहनना और दबाना: गले में तावीज़ (Amulets) पहनना या घर की नींव में तावीज़ दबाना इस्लाम में मना है। हदीस में आता है कि “जिसने तावीज़ लटकाया उसने शिर्क किया”। हिफाज़त के लिए कुरान पढ़ना चाहिए, उसे लटकाना या गाड़ना नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या इस्लाम में जन्मदिन (Birthday) मनाना हराम है?
इस्लाम में किसी की पैदाइश पर खुशी ज़ाहिर करना मना नहीं है, लेकिन इसे “त्यौहार” की तरह मनाना, केक काटना और मोमबत्तियां बुझाना गैर-मुस्लिमों का तरीका है, जिससे बचने का हुक्म है।
Q. क्या 786 लिखना गुनाह है?
गुनाह नहीं कह सकते, लेकिन यह सुन्नत के खिलाफ है। इससे बिस्मिल्लाह का मकसद पूरा नहीं होता। इसलिए बिस्मिल्लाह पूरी लिखनी चाहिए या ज़बानी पढ़नी चाहिए।
Q. अगर कोई रस्म समाज में आम हो जाए तो क्या उसे कर सकते हैं?
नहीं, अगर कोई रस्म शरीयत से टकराती है (जैसे जहेज़, नाच-गाना), तो चाहे वो कितनी ही आम क्यों न हो जाए, उसे करना जायज़ नहीं होगा। “सब करते हैं” यह कोई दलील नहीं है।
Q. क्या मरने के बाद तीजा और चालीसवां करना ज़रूरी है?
नहीं, इस्लाम में तीजा और चालीसवां का कोई सबूत नहीं है। यह बिदअत है। ईसाल-ए-सवाब आप कभी भी कर सकते हैं, इसके लिए दिन मुकर्रर करना सही नहीं है।
Q. क्या लड़के वालों का जहेज़ मांगना जायज़ है?
इस्लाम में जहेज़ (Dowry) मांगना सख्त मना और हराम है। निकाह में लड़के को मेहर देना होता है, न कि लड़की वालों से पैसे या सामान मांगना।
Q. क्या तावीज़ पहनना शिर्क है?
हदीस में आता है कि “जिसने तावीज़ लटकाया उसने शिर्क किया”। इसलिए तावीज़ पहनने या लटकाने से बचना चाहिए और हिफाज़त के लिए कुरान की आयतें (जैसे आयतुल कुर्सी, चार कुल) पढ़नी चाहिए।
नतीजा (Conclusion)
इस्लाम एक सादा और फितरती दीन है। रस्मों-रिवाज़ ने हमारी ज़िंदगियों को मुश्किल और खर्चीला बना दिया है। हमें चाहिए कि हम इन रस्मों को छोड़कर सुन्नत के मुताबिक सादगी से ज़िन्दगी गुज़ारें।
अल्लाह हमें दीन की सही समझ अता फरमाए और बिदअत से बचाए। आमीन।
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