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Iffat Zia
· Masail · 4 min read

Islam Me Mannat Kya Hai - मन्नत का सही तरीका और शर्तें

Islam Me Mannat Kya Hai: जानिए इस्लाम में मन्नत (नज़र) मानना कैसा है? मन्नत पूरी करने के मसाइल, शर्तें और गलत मन्नतों का हुक्म।

Islam Me Mannat Kya Hai - मन्नत का सही तरीका और शर्तें

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मन्नत (Mannat) या नज़र (Nazar) का मतलब है कि इंसान अल्लाह से वादा करे कि अगर मेरा फलां काम हो गया, तो मैं अल्लाह के लिए फलां नेकी (जैसे रोज़ा, सदका, नमाज़) करूँगा।

अक्सर लोग जानकारी न होने की वजह से गलत तरीके से मन्नतें मानते हैं, जो कभी-कभी शिर्क (Shirk) तक पहुँचा देती हैं।

इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि Islam Me Mannat Kya Hai, मन्नत मानने का सही तरीका क्या है और कौन सी मन्नतें पूरी करना ज़रूरी है।

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मन्नत क्या है? (What is Mannat?)

इस्लाम में मन्नत का मतलब है किसी ऐसी इबादत को अपने ऊपर लाज़िम (ज़रूरी) कर लेना जो पहले से फ़र्ज़ या वाजिब न हो।

मिसाल के तौर पर: “ऐ अल्लाह! अगर मेरा बीमार बेटा ठीक हो गया, तो मैं 3 दिन के रोज़े रखूँगा।”

अगर बेटा ठीक हो जाए, तो अब उस शख्स पर 3 रोज़े रखना वाजिब हो जाता है।

मन्नत की शर्तें (Conditions of Mannat)

शरीयत में मन्नत मानने की कुछ शर्तें हैं:

  1. सिर्फ अल्लाह के लिए: मन्नत सिर्फ अल्लाह के नाम की होनी चाहिए। मज़ार, पीर या किसी बाबा के नाम की मन्नत मानना शिर्क है और हराम है।
  2. इबादत का काम: मन्नत किसी इबादत (जैसे नमाज़, रोज़ा, सदका, कुर्बानी) की होनी चाहिए। गुनाह के काम की मन्नत नहीं मानी जा सकती।
  3. हैसियत: ऐसी चीज़ की मन्नत न मानें जो आपकी ताकत से बाहर हो।
  4. जुबान से कहना: सिर्फ दिल में सोचने से मन्नत नहीं होती, जुबान से कहना ज़रूरी है।

गलत मन्नतें और शिर्क

अफ़सोस की बात है कि आज कल बहुत से लोग गैर-उल्लाह (अल्लाह के सिवा दूसरों) के नाम की मन्नतें मानते हैं।

जैसे: “ऐ फलां बाबा! अगर मेरा काम हो गया तो मैं आपकी दरगाह पर चादर चढ़ाऊंगा।” यह शिर्क है। अल्लाह के सिवा कोई नफा या नुकसान का मालिक नहीं। नबी (ﷺ) ने फरमाया: “मन्नत तकदीर को नहीं बदल सकती।”

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क्या मन्नत मानना अच्छा है?

हालांकि जायज़ मन्नत पूरी करना वाजिब है, लेकिन इस्लाम में मन्नत मानने को बहुत पसंद नहीं किया गया। नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “मन्नत मत माना करो, क्योंकि मन्नत तकदीर को नहीं बदलती, इसके ज़रिए तो बस कंजूस का माल निकाला जाता है।” (बुखारी, मुस्लिम)

बेहतर यह है कि आप बिना शर्त के सदका (Sadaqah) करें। अल्लाह से दुआ करें और अपनी हैसियत के मुताबिक सदका दें, यह मुसीबतों को टालता है।

मन्नत और सदका में फर्क

  • मन्नत: यह शर्त पर होती है (काम होगा तो दूंगा)। यह कंजूस का तरीका है।
  • सदका: यह बिना शर्त अल्लाह की रज़ा के लिए होता है। यह अफ़ज़ल (बेहतर) है।

काम होने से पहले मन्नत पूरी करना

अगर किसी ने कहा “मेरा काम हो गया तो सदका करूँगा”, तो काम होने के बाद ही सदका करना ज़रूरी है। लेकिन अगर काम होने से पहले ही कर दिया, तो भी अदा हो जाएगा, मगर बेहतर है कि बाद में करे जैसा कहा था।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क्या मज़ार पर चादर चढ़ाने की मन्नत मानना जायज़ है?
A.

नहीं, यह बिदअत और शिर्क के करीब है। मन्नत सिर्फ अल्लाह के लिए होती है। मज़ार पर जाकर दुआ करना अलग बात है, लेकिन मज़ार वाले से मांगना या उनके नाम की मन्नत मानना हराम है।

Q. अगर मन्नत पूरी न कर सकें तो क्या करें?
A.

अगर किसी ने ऐसी मन्नत मानी जिसे पूरा करने की ताकत नहीं (जैसे पूरी ज़िंदगी रोज़ा रखना), तो उसे कसम का कफ्फारा (10 गरीबों को खाना खिलाना) देना होगा।

Q. क्या गुनाह की मन्नत पूरी करनी चाहिए?
A.

नहीं, हदीस में है: “जिसने अल्लाह की नाफरमानी की मन्नत मानी, वो उसकी नाफरमानी न करे।” यानी गुनाह वाली मन्नत पूरी न करे, बल्कि तौबा करे और कफ्फारा दे।


अल्लाह हमें सही समझ अता फरमाए और शिर्क व बिदअत से बचाए। आमीन।

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