·
Iffat Zia
· Akhlaq · 5 min read

Walidain ke Huqooq: इस्लाम में माँ-बाप का मक़ाम और उनके हुकूक

Walidain ke Huqooq: इस्लाम में माँ-बाप का क्या मक़ाम है? जानिए वालिदैन की खिदमत के फायदे, उनके हुकूक और नाफरमानी का अंजाम।

Walidain ke Huqooq: इस्लाम में माँ-बाप का मक़ाम और उनके हुकूक

Table of Contents

वालिदैन (Walidain) यानी माँ-बाप का दर्जा इस्लाम में अल्लाह की तौहीद (इबादत) के बाद सबसे ऊपर रखा गया है। दुनिया के तमाम रिश्तों में सबसे अज़ीम और मोहतरम रिश्ता वालिदैन का है।

अक्सर हम अपनी मसरूफियत में Walidain ke Huqooq भूल जाते हैं, जबकि उनकी खिदमत जन्नत की कुंजी है।

इस आर्टिकल में हम कुरान और हदीस की रौशनी में जानेंगे कि वालिदैन के क्या हुकूक हैं और उनकी नाफरमानी का क्या अंजाम है।

ये भी पढ़े: Bachon Ki Tarbiyat Kaise Kare | औलाद की परवरिश के उसूल

इस्लाम में माँ-बाप का मक़ाम

कुरान मजीद में अल्लाह तआला फरमाता है:

“और तेरे रब ने फैसला कर दिया है कि तुम उसके सिवा किसी की इबादत न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक (एहसान) करो।” (सूरह बनी इसराईल: 23)

यह आयत बताती है कि अल्लाह की इबादत के फौरन बाद माँ-बाप की खिदमत का दर्जा है।

माँ का दर्जा (Status of Mother)

इस्लाम में माँ का मक़ाम बहुत ऊँचा है। एक बार एक सहाबी ने नबी (ﷺ) से पूछा: “मेरे अच्छे सुलूक (Husn-e-Sulook) का सबसे ज्यादा हकदार कौन है?”

आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” उन्होंने पूछा: “फिर कौन?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” उन्होंने फिर पूछा: “फिर कौन?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” चौथी बार पूछने पर आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारे वालिद (बाप)।” (बुखारी और मुस्लिम)

माँ-बाप के हुकूक

औलाद पर माँ-बाप के बहुत से हुकूक हैं, जिनमें से कुछ अहम ये हैं:

  1. अदब और एहतराम: उनसे ऊँची आवाज़ में बात न करें। कुरान कहता है कि उन्हें “उफ़” तक न कहो।
  2. खिदमत: बुढ़ापे में उनका सहारा बनें। उनकी जिस्मानी और माली खिदमत करें।
  3. फरमाबरदारी: जब तक वो शरीयत के खिलाफ हुक्म न दें, उनकी हर बात मानना फ़र्ज़ है।
  4. मोहब्बत: उनसे मोहब्बत और नरमी से पेश आएं। उनकी तरफ प्यार से देखना भी इबादत है।
  5. खर्च करना: अपनी कमाई में से उन पर दिल खोलकर खर्च करें।

माँ-बाप की खिदमत के फायदे

माँ-बाप की खिदमत करने से दुनिया और आख़िरत दोनों संवर जाती है:

  1. रिज़्क में बरकत: माँ-बाप की दुआ से रोजी में बरकत होती है।
  2. उम्र में इज़ाफ़ा: हदीस में है कि जो चाहता है उसकी उम्र लम्बी हो, वो माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करे।
  3. परेशानियों से नजात: उनकी दुआओं से बड़ी से बड़ी मुसीबत टल जाती है।
  4. जन्नत का रास्ता: उनकी रज़ा में अल्लाह की रज़ा है।

हदीस की रौशनी में फजीलत

  • जन्नत माँ के कदमों तले: नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जन्नत माँ के कदमों के नीचे है।”
  • बाप जन्नत का दरवाज़ा: आप (ﷺ) ने फरमाया: “बाप जन्नत का बीच वाला दरवाज़ा है, चाहो तो इसे ज़ाया कर दो या इसकी हिफाज़त करो।” (तिर्मिज़ी)
  • अल्लाह की रज़ा: “अल्लाह की रज़ा वालिद की रज़ा में है और अल्लाह की नाराज़गी वालिद की नाराज़गी में है।“

वालिदैन की खिदमत की एक मिसाल (Story)

हदीस में तीन आदमियों का एक मशहूर वाकया है जो एक गुफा में फंस गए थे और एक चट्टान ने रास्ता बंद कर दिया था। उनमें से एक ने अपने नेक अमल का वास्ता देकर दुआ की:

“ऐ अल्लाह! मेरे बूढ़े माँ-बाप थे। मैं उनसे पहले अपने बच्चों और घर वालों को दूध नहीं पिलाता था। एक दिन मैं देर से आया तो वो सो चुके थे। मैं दूध का प्याला लेकर पूरी रात उनके सिरहाने खड़ा रहा कि कहीं उनके जागने पर उन्हें इंतज़ार न करना पड़े, जबकि मेरे बच्चे भूख से मेरे पैरों में रो रहे थे। मैंने उन्हें जगाना मुनासिब नहीं समझा। सुबह जब वो जागे तब मैंने उन्हें दूध पिलाया। ऐ अल्लाह! अगर मैंने ये काम तेरी रज़ा के लिए किया था, तो इस चट्टान को हटा दे।”

अल्लाह ने उसकी दुआ कबूल की और चट्टान खिसक गई। इससे पता चलता है कि माँ-बाप की खिदमत से मुसीबतें टल जाती हैं।

आज के दौर में खिदमत कैसे करें? (Practical Tips)

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर वालिदैन को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यहाँ कुछ आसान तरीके हैं:

  1. वक़्त दें: उनके पास बैठें और उनकी बातें सुनें, चाहे वो बातें आपने पहले भी सुनी हों।
  2. मोबाइल से दूरी: जब उनके पास हों तो स्मार्टफोन का इस्तेमाल न करें।
  3. मशवरा लें: अपने छोटे-बड़े फैसलों में उनसे राय लें, इससे उन्हें अपनी अहमियत का अहसास होता है।
  4. मुस्कुरा कर मिलें: घर में दाखिल होते ही सबसे पहले उन्हें सलाम करें और मुस्कुरा कर देखें।

इंतकाल के बाद माँ-बाप के हुकूक

अगर माँ-बाप दुनिया से चले जाएं, तो भी उनके हुकूक बाकी रहते हैं:

  1. दुआ-ए-मगफिरत: उनके लिए बख्शिश की दुआ करते रहें।
    • दुआ: رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا
      रब्बिर-हमहुमा कमा रब्बयानी सगीरा
      (ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फरमा जैसा उन्होंने बचपन में मुझे पाला)।
    • कुरानी दुआ: रब्बनग-फिर ली व लि-वालिदय्या व लिल-मुअ्मिनीना यौमा यक़ूमुल-हिसाब (ऐ हमारे रब! मुझे बख्श दे और मेरे माँ-बाप को और सब मोमिनों को, जिस दिन हिसाब कायम होगा)।
  2. वादे पूरे करना: अगर उन्होंने कोई जायज़ वादा या मन्नत मानी थी, तो उसे पूरा करें।
  3. रिश्तेदारों से सुलूक: उनके दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ अच्छा बर्ताव करें।
  4. सदका-ए-जारिया: उनके नाम पर सदका और खैरात करें।

माँ-बाप की नाफरमानी का अंजाम

माँ-बाप का दिल दुखाना या उनकी नाफरमानी करना गुनाह-ए-कबीरा (बड़ा गुनाह) है। हदीस में आता है कि अल्लाह तआला तमाम गुनाहों की सज़ा कयामत तक टाल सकता है, लेकिन माँ-बाप की नाफरमानी की सज़ा दुनिया में भी देता है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. अगर माँ-बाप गलत बात का हुक्म दें तो क्या करें?
A.

अगर वो शरीयत के खिलाफ (जैसे शिर्क या गुनाह) हुक्म दें, तो उनकी बात नहीं मानी जाएगी। लेकिन फिर भी उनके साथ बदतमीज़ी नहीं करनी चाहिए, बल्कि नरमी से मना करना चाहिए।

Q. क्या बीवी आने के बाद माँ-बाप का हक़ कम हो जाता है?
A.

नहीं, बीवी के अपने हुकूक हैं और माँ-बाप के अपने। एक का हक़ अदा करने के लिए दूसरे का हक़ मारना जायज़ नहीं है। दोनों में बराबरी (Balance) रखना ज़रूरी है।

Q. अगर माँ-बाप नाराज़ हों तो क्या दुआ कबूल होगी?
A.

माँ-बाप की नाराज़गी अल्लाह की नाराज़गी का सबब है। अगर वो जायज़ वजह से नाराज़ हैं, तो औलाद की इबादतें और दुआएं कबूल होने में रुकावट आ सकती है।


अल्लाह हमें अपने वालिदैन की खिदमत करने और उन्हें राज़ी रखने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ शेयर करें।

    Share:
    Back to Blog