Nabi Ki Sunnat in Hindi - सुन्नत क्या है और इसकी अहमियत
Nabi Ki Sunnat (नबी की सुन्नत): जानिए सुन्नत किसे कहते हैं? सुन्नत की किस्में (कौली, फेली, तकरीरी) और इस्लाम में सुन्नत पर अमल करने की अहमियत और फजीलत।

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नबी की सुन्नत (Nabi Ki Sunnat) इस्लाम का दूसरा सबसे अहम सुतून (Pillar) है। कुरान मजीद के बाद जिस चीज़ पर अमल करना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है, वो प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (ﷺ) की सुन्नत है।
अक्सर हम सुनते हैं कि “यह सुन्नत है”, लेकिन क्या हम वाकई जानते हैं कि Sunnat Kya Hai और इसकी कितनी किस्में हैं?
इस आर्टिकल में हम सुन्नत का मतलब, इसकी किस्में और हमारी ज़िन्दगी में इसकी अहमियत को तफसील से जानेंगे।
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सुन्नत किसे कहते हैं? (What is Sunnah?)
लफ्ज़ ‘सुन्नत’ का मतलब है ‘रास्ता’ या ‘तरीका’। शरीयत में सुन्नत से मुराद वो तमाम काम, बातें और तरीके हैं जो नबी करीम (ﷺ) से साबित हैं।
सुन्नत की बुनियादी तौर पर तीन किस्में हैं:
- कौली सुन्नत (Qawli Sunnah): वो बातें जो आप (ﷺ) ने अपनी जुबान-ए-मुबारक से इरशाद फरमाईं (यानी हदीसें)।
- फेली सुन्नत (Fi’li Sunnah): वो काम जो आप (ﷺ) ने खुद करके दिखाए (जैसे नमाज़ पढ़ने का तरीका, हज करना वगैरह)।
- तकरीरी सुन्नत (Taqreeri Sunnah): वो काम जो किसी सहाबी ने आप (ﷺ) के सामने किया और आपने उस पर खामोशी इख्तियार की (यानी मना नहीं किया), तो वो भी सुन्नत बन गया।
सुन्नत की अहमियत (Importance of Sunnah)
कुरान मजीद में अल्लाह तआला ने बार-बार अपनी इताअत के साथ रसूल (ﷺ) की इताअत का हुक्म दिया है।
“जिसने रसूल (ﷺ) की इताअत की, उसने दरअसल अल्लाह की इताअत की।” (सूरह निसा: 80)
“तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल (ﷺ) की ज़िन्दगी में बेहतरीन नमूना है।” (सूरह अहज़ाब: 21)
सुन्नत के बिना हम कुरान को नहीं समझ सकते। कुरान में नमाज़ का हुक्म है, लेकिन नमाज़ कैसे पढ़नी है, यह सुन्नत ने सिखाया।
सुन्नत पर अमल के फायदे
- अल्लाह की मोहब्बत: जो सुन्नत पर चलता है, अल्लाह उससे मोहब्बत करता है।
- कामिल ईमान: नबी (ﷺ) के तरीके को अपनाए बिना ईमान मुकम्मल नहीं होता।
- शफाअत: कयामत के दिन नबी (ﷺ) की शफाअत उन लोगों को मिलेगी जो आपकी सुन्नत पर कायम रहे।
- बरकत: सुन्नत के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारने में सुकून और बरकत है।
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सुन्नत और बिदअत में फर्क
सुन्नत: वो काम जो नबी (ﷺ) या सहाबा ने किया हो। बिदअत: दीन में कोई ऐसा नया काम निकालना जो नबी (ﷺ) और सहाबा के दौर में नहीं था और उसे सवाब समझ कर करना।
हदीस में है: “हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही आग (जहन्नम) में ले जाने वाली है।”
इसलिए हमें चाहिए कि हम सिर्फ साबित शुदा सुन्नतों पर अमल करें और बिदअतों से बचें।
रोज़मर्रा की कुछ आसान सुन्नतें
- मुस्कुरा कर मिलना।
- सलाम में पहल करना।
- दाहिने (Right) हाथ से खाना-पीना।
- पानी बैठकर पीना।
- सोने से पहले बिस्तर झाड़ना।
- मस्जिद में दाहिना पैर रखकर दाखिल होना।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. सुन्नत-ए-मुअक्कदा और गैर-मुअक्कदा में क्या फर्क है?
सुन्नत-ए-मुअक्कदा: वो सुन्नतें जो नबी (ﷺ) ने पाबंदी से कीं और बिना उज़्र के छोड़ने पर गुनाह है (जैसे फजर की सुन्नतें)।
सुन्नत-ए-गैर-मुअक्कदा: वो सुन्नतें जो आपने कभी कीं और कभी छोड़ दीं। इन्हें करने पर सवाब है और छोड़ने पर गुनाह नहीं (जैसे असर की सुन्नतें)।
Q. क्या सुन्नत छोड़ने से इंसान काफिर हो जाता है?
नहीं, सुन्नत छोड़ने से इंसान काफिर नहीं होता, लेकिन वह बहुत बड़े सवाब और बरकत से महरूम हो जाता है। जानबूझकर सुन्नत का मज़ाक उड़ाना कुफ्र हो सकता है।
Q. हदीस और सुन्नत में क्या फर्क है?
हदीस नबी (ﷺ) की कही हुई बात या वाकये की रिवायत (Report) है, जबकि सुन्नत वो तरीका-ए-कार (Practice) है जो उस हदीस से साबित होता है।
अल्लाह हमें नबी (ﷺ) की सुन्नतों को पहचानने और उन पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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