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Islam Mein Damaad Aur Sasural Ke Huqooq | दामाद और ससुराल के हुकूक
Islam Mein Damaad Aur Sasural Ke Huqooq: जानिए इस्लाम में दामाद के ससुराल पर और ससुराल वालों के दामाद पर क्या हक़ हैं? खुशगवार रिश्तों के लिए ज़रूरी बातें।

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इस्लाम (Islam) में रिश्तों को बहुत अहमियत दी गई है। शादी सिर्फ दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन है। जैसे दामाद (Son-in-law) के कुछ हुकूक हैं, वैसे ही ससुराल (In-laws) के भी दामाद पर कुछ हुकूक हैं।
अक्सर जानकारी न होने की वजह से सास-ससुर और दामाद के बीच गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं।
इस आर्टिकल में हम कुरान और हदीस की रौशनी में जानेंगे कि Islam Mein Damaad Aur Sasural Ke Huqooq क्या हैं और एक खुशगवार रिश्ता कैसे निभाया जाए।
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दामाद पर ससुराल के हुकूक (Responsibilities of Son-in-Law)
दामाद के लिए ज़रूरी है कि वह अपनी बीवी के घरवालों (सास-ससुर) के साथ अच्छा सुलूक करे।
- सास-ससुर का एहतराम: बीवी के माँ-बाप, दामाद के लिए भी माँ-बाप की तरह मोहतरम हैं। उनका अदब और एहतराम करना चाहिए।
- बीवी को मिलने की इजाज़त: शौहर को चाहिए कि वह अपनी बीवी को उसके माँ-बाप और भाई-बहनों से मिलने से न रोके। सिला-रहमी (रिश्ते जोड़ना) इस्लाम में बहुत ज़रूरी है।
- अच्छा बर्ताव (Husn-e-Sulook): ससुराल वालों के साथ नरमी और मोहब्बत से पेश आएं। अगर उनसे कोई गलती हो जाए, तो उसे नज़रअंदाज़ करें।
- मुश्किल में मदद: अगर ससुराल वालों को मदद की ज़रूरत हो, तो अपनी हैसियत के मुताबिक उनकी मदद करें।
- बुज़ुर्गों का ख्याल: अगर सास-ससुर बूढ़े हैं और उनका कोई बेटा नहीं है, या वो बीमार हैं, तो दामाद को चाहिए कि इंसानियत और रिश्तेदारी के नाते उनका ख्याल रखे।
- तोहफे देना: कभी-कभी ससुराल वालों के लिए तोहफे ले जाना चाहिए। हदीस में है कि “तोहफे दिया करो, इससे आपस में मोहब्बत बढ़ती है।“
एक मिसाली दामाद कैसे बनें?
अगर आप चाहते हैं कि ससुराल में आपकी इज़्ज़त हो, तो इन बातों का ख्याल रखें:
- कभी भी बीवी के सामने उसके घरवालों की बुराई न करें।
- ससुराल के निजी मामलों में बेवजह दखल न दें।
- जब ससुराल जाएं तो खुश-अखलाकी से मिलें।
- सास-ससुर की नसीहत को बुरा न मानें, बल्कि उसे बड़ों का प्यार समझें।
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ससुराल वालों पर दामाद के हुकूक (Rights of Son-in-Law)
रिश्ता एक तरफा नहीं होता। ससुराल वालों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे दामाद के हुकूक का ख्याल रखें।
- दामाद की इज़्ज़त: दामाद को घर का बेटा समझें और उसे इज़्ज़त दें। उसकी छोटी-मोटी कमियों को नज़रअंदाज़ करें।
- निजी ज़िन्दगी में दखल न दें: बेटी और दामाद की निजी ज़िन्दगी (Personal Life) में बेवजह दखलअंदाज़ी न करें। उन्हें अपने तरीके से घर चलाने दें।
- बेजा फरमाइशें न करें: दामाद पर अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करने या तोहफे देने का बोझ न डालें।
- ताने न दें: अगर दामाद गरीब है या कम कमाता है, तो उसे ताने न दें। अल्लाह ने रिज़्क की तकसीम अपने हाथ में रखी है।
- तुलना (Comparison) न करें: अपने दामाद की तुलना दूसरों के दामाद से न करें कि “फलां ने तो गाड़ी दी” या “फलां इतना कमाता है”। इससे रिश्तों में खटास आती है।
- बेटी के घर का राज़: बेटी के घर की बातें लोगों को न बताएं। दामाद के ऐब (कमियों) पर पर्दा डालें।
रिश्तों में दरार की वजहें और उनका हल
अक्सर सास-ससुर और दामाद के बीच दूरियां इन वजहों से आती हैं:
- उम्मीदें: जब दोनों तरफ से उम्मीदें बहुत ज़्यादा होती हैं। याद रखें, कोई भी इंसान कामिल (Perfect) नहीं होता।
- ग़ीबत (Backbiting): एक दूसरे की बुराई करना रिश्तों को दीमक की तरह खा जाता है।
- गलतफहमी: बात न करने से गलतफहमियां बढ़ती हैं। अगर कोई मसला हो तो बैठकर बात करें।
नबी (ﷺ) का तरीका
प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (ﷺ) अपने दामाद हज़रत अली (रज़ि.) और हज़रत उस्मान (रज़ि.) के साथ बेहद मोहब्बत और शफकत का मामला फरमाते थे। आप (ﷺ) उनकी इज़्ज़त करते और उनके मशवरों को अहमियत देते थे।
इसी तरह आप (ﷺ) अपनी अज़वाज-ए-मुतहहरात (बीवियों) के रिश्तेदारों का भी ख्याल रखते थे और उनके यहाँ तोहफे भेजते थे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या दामाद पर सास-ससुर की खिदमत फ़र्ज़ है?
इस्लाम में दामाद पर सास-ससुर की खिदमत फ़र्ज़ नहीं है, लेकिन अखलाकी तौर पर (Morally) उसे चाहिए कि वह बुज़ुर्गों का ख्याल रखे और उनकी मदद करे। यह सवाब का काम है।
Q. क्या शौहर अपनी बीवी को उसके माँ-बाप से मिलने से रोक सकता है?
बिला वजह (Without valid reason) रोकना जायज़ नहीं है। इस्लाम सिला-रहमी (रिश्ते जोड़ने) का हुक्म देता है, तोड़ने का नहीं। हाँ, अगर वहां जाने से बीवी के दीन या घर को कोई सख्त नुकसान हो, तो हिकमत से मना कर सकता है।
Q. अगर ससुराल वाले दामाद की बेइज्जती करें तो क्या करें?
दामाद को चाहिए कि सब्र से काम ले और बद-अखलाकी का जवाब बद-अखलाकी से न दे। लेकिन अगर मामला हद से बढ़ जाए, तो बीवी के ज़रिए या किसी बड़े के ज़रिए बात को सुलझाने की कोशिश करे।
अल्लाह हम सबको रिश्तों की कद्र करने और एक-दूसरे के हुकूक अदा करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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