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Iffat Zia
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इस्लाम में दहेज लेना कैसा है? जानिए कुरान और हदीस की रोशनी में

इस्लाम में दहेज प्रथा (Dowry System) एक बड़ी सामाजिक बुराई है। जानिए दहेज लेना और मांगना क्यों हराम है और कुरान और हदीस में इसके बारे में क्या हुक्म है।

इस्लाम में दहेज लेना कैसा है? जानिए कुरान और हदीस की रोशनी में

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दहेज प्रथा (Dowry System) एक ऐसी सामाजिक लानत है जो हमारे समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। यह एक गैर-इस्लामी रस्म है जो हिन्दू समाज से मुसलमानों में आई है। इस्लाम में दहेज का कोई तसव्वुर (Concept) नहीं है, बल्कि यह इस्लाम की रूह के बिल्कुल खिलाफ है।

इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि इस्लाम में दहेज लेना कैसा है और कुरान और हदीस में इसके बारे में क्या हुक्म है।

इस्लाम में निकाह: जिम्मेदारी मर्द की है

इस्लाम ने निकाह की पूरी माली ज़िम्मेदारी मर्द पर डाली है, औरत पर नहीं। अल्लाह तआला कुरान में फरमाता है:

मर्द औरतों पर कव्वाम (हाकिम और निगहबान) हैं क्योंकि अल्लाह ताला ने उनमें से एक को दूसरे पर फजीलत दी है और इसलिए कि मर्द अपना माल खर्च करते हैं

(सोर्स :अल कुरान 4:34)

इस आयत से साफ़ है कि खर्चा करने की ज़िम्मेदारी मर्द की है। दहेज मांगना इस आयत के हुक्म के बिल्कुल खिलाफ है। जो मर्द अपनी होने वाली बीवी के घर वालों से पैसों या सामान की मांग करता है, वह अपनी मर्दानगी और ज़िम्मेदारी से भाग रहा है।

निकाह को आसान बनाओ

इस्लाम निकाह को आसान बनाने का हुक्म देता है ताकि ज़िना (अनैतिक संबंध) मुश्किल हो जाए। लेकिन दहेज की रस्म ने निकाह को मुश्किल और ज़िना को आसान बना दिया है।

नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया:

“सबसे ज़्यादा बरकत वाला निकाह वो है जिसमें सबसे कम खर्च हो।” (मिश्कात अल-मसाबीह)

नबी (ﷺ) ने अपनी बेटी हज़रत फातिमा (रज़ि.) का निकाह हज़रत अली (रज़ि.) से किया तो हज़रत अली के पास मेहर देने के लिए भी कुछ खास नहीं था। आपने अपनी ज़िरह (कवच) बेचकर मेहर अदा किया। यह हमारे लिए बेहतरीन मिसाल है।

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जहेज़-ए-फातिमी की हकीकत

कुछ लोग दहेज को जायज़ ठहराने के लिए नबी (ﷺ) की बेटी हज़रत फातिमा (रज़ि.) के निकाह की मिसाल देते हैं, जिसे “जहेज़-ए-फातिमी” कहा जाता है। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है।

हकीकत यह है:

  1. यह मांग नहीं थी: हज़रत अली (रज़ि.) या उनके घर वालों ने किसी चीज़ की मांग नहीं की थी।
  2. यह मेहर के पैसे से था: हज़रत अली (रज़ि.) ने अपनी ज़िरह (कवच) बेचकर जो मेहर की रकम अदा की थी, उसी रकम से नबी (ﷺ) ने घर के लिए कुछ ज़रूरी सामान (जैसे एक चक्की, एक बिस्तर, और पानी का मश्कीज़ा) खरीदकर दिया था।
  3. यह दिखावा नहीं था: यह आज के दौर की तरह लाखों के सामान और दिखावे की नुमाइश नहीं थी, बल्कि एक नए घर को शुरू करने के लिए बुनियादी ज़रूरतें थीं।

आज के दहेज का, जिसमें लड़के वाले लिस्ट बनाकर सामान और नकद मांगते हैं, इस सुन्नत से कोई लेना-देना नहीं है। यह सरासर बिदअत और ज़ुल्म है।

दहेज प्रथा के नुकसानात (Harms of Dowry)

दहेज की वजह से समाज में कई बड़ी बुराइयां पैदा होती हैं:

  1. लड़कियों की शादी में देरी: गरीब माँ-बाप दहेज का इंतज़ाम न कर पाने की वजह से अपनी बेटियों की शादी वक़्त पर नहीं कर पाते।
  2. हराम कमाई का रास्ता: दहेज पूरा करने के लिए बाप को रिश्वत, सूद (ब्याज) और दूसरे हराम काम करने पड़ते हैं।
  3. औरतों पर ज़ुल्म: कम दहेज लाने पर लड़कियों को ससुराल में ताने दिए जाते हैं, मारा-पीटा जाता है और कभी-कभी जलाकर मार भी दिया जाता है।
  4. दिखावा और फिजूलखर्ची: लोग अपनी झूठी शान दिखाने के लिए शादी में बेतहाशा पैसा बर्बाद करते हैं, जो कि शैतानी काम है।
  5. लड़कियों को बोझ समझना: इसी रस्म की वजह से लड़कियों को बोझ समझा जाने लगा और उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देने का चलन शुरू हुआ।

मेहर और दहेज में फर्क (Meher vs Dowry)

कुछ लोग मेहर और दहेज को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है:

  • मेहर (Mahr): यह मर्द की तरफ से औरत को दिया जाने वाला एक हक़ है। यह निकाह की शर्त है और इस पर सिर्फ औरत का हक़ होता है।
  • दहेज (Dowry): यह औरत के घर वालों से मर्द की तरफ से की जाने वाली मांग है। यह एक ज़ुल्म और गैर-इस्लामी रस्म है।

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इस लानत को कैसे खत्म करें?

इस सामाजिक बुराई को खत्म करना हम सब की ज़िम्मेदारी है।

1. नौजवानों का किरदार

लड़कों को हिम्मत दिखानी होगी। उन्हें अपने माँ-बाप को साफ़-साफ़ कहना चाहिए कि “मैं अपनी ज़िम्मेदारी खुद उठा सकता हूँ, मुझे किसी की बेटी के साथ भीख का सामान नहीं चाहिए।” यह गैरत और मर्दानगी की निशानी है।

2. माँ-बाप का किरदार

लड़की के माँ-बाप को भी सब्र और हिम्मत से काम लेना चाहिए। अपनी बेटी को दीन और हुनर की तालीम दें, उसे खुद पर भरोसा करना सिखाएं। रिश्ता ढूंढते वक़्त लड़के के दीन और अखलाक़ को देखें, न कि उसकी दौलत और लालच को। ऐसे घर में बेटी देने से इंकार कर दें जो निकाह से पहले ही भीख का कटोरा लेकर खड़ा हो।

3. समाज का किरदार

पूरे समाज को मिलकर दहेज मांगने और देने वालों का सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) करना चाहिए। ऐसी शादियों में जाना बंद कर दें जहाँ दहेज की नुमाइश हो रही हो। उलमा और मस्जिदों के इमामों को जुमे के खुतबों में इस बुराई के खिलाफ लगातार आवाज़ उठानी चाहिए।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क्या अपनी बेटी को खुशी से तोहफे देना भी दहेज है?
A.

अगर माँ-बाप अपनी बेटी को उसकी ज़रूरत का सामान अपनी खुशी से, बिना किसी मांग या सामाजिक दबाव के देते हैं, तो यह जायज़ है। इसे “जहेज़-ए-फातिमी” की मिसाल दी जाती है। लेकिन जब यह एक रस्म, मांग और दिखावा बन जाए, तो यह हराम हो जाता है।

Q. अगर लड़के वाले दहेज न मांगे पर लड़की वाले अपनी शान के लिए दें तो?
A.

यह भी गलत है। लड़की वालों को भी दिखावे और फिजूलखर्ची से बचना चाहिए। अगर वो अपनी बेटी को कुछ देना चाहते हैं, तो निकाह के बाद भी दे सकते हैं। निकाह के मौके पर देने से यह दूसरों के लिए एक गलत मिसाल बनती है और गरीब लोगों पर दबाव पड़ता है।

Q. दहेज मांगने वाले लड़के से शादी करना कैसा है?
A.

जो लड़का निकाह से पहले ही अपनी ज़िम्मेदारी से भागकर भीख (दहेज) मांग रहा हो, वह एक अच्छा शौहर कैसे बन सकता है? माँ-बाप को चाहिए कि ऐसे लालची लड़कों से अपनी बेटियों का निकाह करने से बचें और दीनदार और ज़िम्मेदार लड़के को तरजीह दें।


नतीजा (Conclusion)

दहेज एक सामाजिक कैंसर है जो इस्लाम के नाम पर फैलाया जा रहा है। यह हराम है और एक बड़ा गुनाह है।

हम सबको मिलकर इस लानत के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। लड़कों को यह अहद करना चाहिए कि वे दहेज नहीं लेंगे और माँ-बाप को चाहिए कि वे अपनी बेटियों का निकाह ऐसे लड़कों से करें जो दीनदार हों, लालची नहीं।

अल्लाह हमें इस गुनाह से बचने और निकाह को आसान बनाने की तौफीक दे। आमीन।

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