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Bidat Kya Hai in Hindi - बिदअत का मतलब और इसकी हकीकत
Bidat Kya Hai (बिदअत क्या है): जानिए इस्लाम में बिदअत किसे कहते हैं? बिदअत की तारीफ, इसके नुकसान और सुन्नत व बिदअत में फर्क हिंदी में।

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बिदअत (Bidat) इस्लाम में एक बहुत ही नाजुक और अहम मसला है। शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह बिदअत को माना जाता है, क्योंकि यह दीन की शक्ल बिगाड़ देती है।
अक्सर लोग नेकी समझकर कुछ ऐसे काम करते हैं जो नबी करीम (ﷺ) और सहाबा से साबित नहीं होते। इसे ही बिदअत कहते हैं।
इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि Bidat Kya Hai, इसकी पहचान कैसे करें और इससे बचना क्यों ज़रूरी है।
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बिदअत किसे कहते हैं? (What is Bidat?)
आसान लफ्ज़ों में, बिदअत का मतलब है “दीन में कोई नई चीज़ निकालना”।
शरीयत की इस्तिलाह में:
“जो काम सवाब और दीन का हिस्सा समझकर किया जाए, लेकिन उसका सबूत कुरान, हदीस और सहाबा की ज़िन्दगी (खैरुल कुरून) में न मिले, वह बिदअत है।”
नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जिसने हमारे इस दीन में कोई नई बात निकाली जो इसमें से नहीं है, तो वह मरदूद (रद्द) है।” (बुखारी और मुस्लिम)
बिदअत क्यों बुरी है?
- दीन मुकम्मल हो चुका है: अल्लाह ने फरमाया: “आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया।” (सूरह माइदा: 3)। बिदअत करने वाला गोया यह दावा करता है कि दीन में कुछ कमी रह गई थी जिसे वह पूरा कर रहा है (नऊज़ुबिल्लाह)।
- गुमराही का रास्ता: हदीस में है: “हर नई ईजाद शुदा चीज़ बिदअत है, हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही आग (जहन्नम) में ले जाने वाली है।”
- अमल की बर्बादी: बिदअती का कोई अमल (नमाज़, रोज़ा, सदका) कबूल नहीं होता जब तक वह बिदअत से तौबा न कर ले।
बिदअती को तौबा नसीब क्यों नहीं होती?
जो इंसान चोरी करता है या शराब पीता है, वह जानता है कि वह गुनाह कर रहा है, इसलिए उसे तौबा की तौफीक मिल सकती है।
लेकिन बिदअती अपने काम को “दीन” और “सवाब” समझकर करता है। वह सोचता है कि वह अल्लाह को राज़ी कर रहा है, इसलिए उसे अपनी गलती का अहसास नहीं होता और वह तौबा नहीं करता।
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सुन्नत और बिदअत में फर्क
- सुन्नत: वो तरीका जो नबी (ﷺ) ने सिखाया और सहाबा ने उस पर अमल किया।
- बिदअत: वो तरीका जो बाद में लोगों ने अपनी मर्जी से दीन में शामिल कर लिया।
मिसाल के तौर पर:
- अज़ान के बाद दुआ पढ़ना सुन्नत है।
- अज़ान से पहले या बाद में अपनी तरफ से कोई नया वज़ीफ़ा या तरीका जोड़ना बिदअत हो सकता है।
शक की सूरत में क्या करें?
अगर आपको किसी काम के बारे में शक हो कि यह सुन्नत है या बिदअत, तो उसे छोड़ देना बेहतर है। क्योंकि सुन्नत छोड़ने पर गुनाह नहीं होता (अगर वह फ़र्ज़/वाजिब न हो), लेकिन बिदअत करना गुनाह और गुमराही है।
हमेशा उलमा-ए-हक से पूछें और कुरान-ओ-हदीस की रौशनी में अमल करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या अच्छी बिदअत (बिदअत-ए-हसना) जायज़ है?
दीन के मामले में कोई बिदअत अच्छी नहीं होती। नबी (ﷺ) ने फरमाया “हर बिदअत गुमराही है”। दुनियावी ईजादात (जैसे कार, प्लेन, माइक) बिदअत नहीं हैं, ये ‘मसालिह-ए-मुर्साला’ (ज़रूरत) हैं। बिदअत सिर्फ इबादत के तरीकों में होती है।
Q. अगर कोई काम नेक नीयत से किया जाए तो क्या वह बिदअत होगा?
जी हाँ, अगर वह काम शरीयत से साबित नहीं है तो नेक नीयत होने के बावजूद वह बिदअत होगा और कबूल नहीं होगा। अमल के कबूल होने के लिए ‘नीयत की अच्छाई’ और ‘तरीके का सही होना (सुन्नत)’ दोनों ज़रूरी हैं।
अल्लाह हमें बिदअतों से बचाए और सुन्नत के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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