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Virasat Ke Ahkam in Hindi | इस्लाम में विरासत के नियम और तकसीम

इस्लाम में विरासत (Meeras) के क्या नियम हैं? जानिए कुरान और हदीस की रौशनी में जायदाद की तकसीम (Property Distribution) का सही तरीका।

Virasat Ke Ahkam in Hindi | इस्लाम में विरासत के नियम और तकसीम

Table of Contents

विरासत (Meeras) या उत्तराधिकार इस्लाम का एक बहुत अहम हिस्सा है। अल्लाह तआला ने कुरान मजीद में मरने वाले की जायदाद (Property) को उसके वारिसों (Heirs) में बांटने के बहुत सख्त और वाजेह (Clear) हुक्म दिए हैं।

अफ़सोस की बात है कि आज बहुत से मुसलमान इन अहकाम से गाफिल हैं या जानबूझकर इनका पालन नहीं करते, खासकर बेटियों और बहनों को उनका हक़ देने के मामले में।

इस आर्टिकल में हम आसान भाषा में जानेंगे कि इस्लाम में विरासत के नियम (Islamic Inheritance Rules) क्या हैं और जायदाद की तकसीम कैसे की जाती है।


विरासत (Meeras) की अहमियत

इस्लाम में विरासत का कानून अल्लाह का बनाया हुआ है, किसी इंसान का नहीं। कुरान की सूरह अन-निसा (Surah An-Nisa) में अल्लाह ने वारिसों के हिस्से मुकर्रर कर दिए हैं और इसे अपनी “हदें” (Limits) बताया है।

अल्लाह तआला फरमाता है:

ये अल्लाह की तय की हुई हदें हैं। और जो अल्लाह और उसके रसूल की ताबेदारी करेगा, अल्लाह उसे ऐसी जन्नतों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी… और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफरमानी करेगा और उसकी हदों को तोड़ेगा, अल्लाह उसे आग (जहन्नम) में दाखिल करेगा जिसमें वह हमेशा रहेगा। (सूरह अन-निसा: 13-14)

इससे पता चलता है कि विरासत की सही तकसीम न करना या किसी वारिस का हक़ मारना कबीरा गुनाह है और जहन्नम में ले जाने वाला काम है।

विरासत की तकसीम से पहले ज़रूरी काम

मरने वाले की जायदाद बांटने से पहले ये 4 काम तरतीबवार (Sequence wise) करना ज़रूरी हैं:

  1. कफन-दफन का खर्च: मरने वाले के छोड़े हुए माल में से सबसे पहले उसके कफन और दफन का जायज़ खर्च निकाला जाएगा।
  2. क़र्ज़ की अदायगी (Debt Payment): अगर मरने वाले पर कोई क़र्ज़ है, तो उसे अदा किया जाएगा। यह वारिसों का हक़ मिलने से पहले ज़रूरी है।
  3. वसीयत (Will): अगर मरने वाले ने कोई जायज़ वसीयत की है, तो उसे पूरा किया जाएगा। लेकिन वसीयत कुल माल के एक-तिहाई (1/3) से ज्यादा नहीं हो सकती और किसी वारिस (जिसका हिस्सा कुरान में तय है) के हक़ में वसीयत नहीं हो सकती।
  4. विरासत की तकसीम: ऊपर के तीनों काम होने के बाद जो माल बचे, उसे वारिसों में बांटा जाएगा।

वारिसों के हिस्से (Shares of Heirs)

इस्लाम में वारिसों के हिस्से हालात के हिसाब से बदलते रहते हैं। यहाँ हम कुछ आम सूरतों का ज़िक्र करेंगे:

1. औलाद (Children) का हिस्सा

  • बेटा और बेटी: अगर मरने वाले के बेटे और बेटियां दोनों हैं, तो बेटे को बेटी से दोगुना (Double) मिलेगा।
    • उसूल: “लिल-ज़करि मिस्लु हज़्ज़िल उनस-यैन” (लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है)।
  • सिर्फ बेटियां: अगर सिर्फ बेटियां हैं (बेटा नहीं), और दो या दो से ज्यादा हैं, तो उन्हें कुल माल का दो-तिहाई (2/3) मिलेगा। अगर अकेली बेटी है, तो उसे आधा (1/2) मिलेगा।

2. शौहर और बीवी (Spouse) का हिस्सा

  • शौहर (Husband):
    • अगर बीवी की औलाद है (चाहे इस शौहर से हो या पहले किसी और से), तो शौहर को 1/4 (चौथाई) मिलेगा।
    • अगर बीवी की कोई औलाद नहीं है, तो शौहर को 1/2 (आधा) मिलेगा।
  • बीवी (Wife):
    • अगर शौहर की औलाद है, तो बीवी को 1/8 (आठवां हिस्सा) मिलेगा।
    • अगर शौहर की कोई औलाद नहीं है, तो बीवी को 1/4 (चौथाई) मिलेगा।
    • (नोट: अगर एक से ज्यादा बीवियां हैं, तो इसी हिस्से (1/8 या 1/4) में सब बराबर शरीक होंगी)।

3. माँ-बाप (Parents) का हिस्सा

  • बाप (Father): अगर मरने वाले की औलाद है, तो बाप को 1/6 (छठा हिस्सा) मिलेगा।
  • माँ (Mother):
    • अगर मरने वाले की औलाद है या एक से ज्यादा भाई-बहन हैं, तो माँ को 1/6 मिलेगा।
    • अगर औलाद नहीं है और भाई-बहन भी नहीं हैं (या सिर्फ एक है), तो माँ को 1/3 (तिहाई) मिलेगा।

वारिसों के हिस्से का चार्ट (Quick Reference Table)

वारिस (Heir)हालात (Condition)हिस्सा (Share)
बेटा (Son)बेटी के साथबेटी से दोगुना (2:1)
बेटी (Daughter)अकेली1/2 (आधा)
बेटियां (Daughters)दो या ज्यादा (बिना बेटे के)2/3 (दो-तिहाई)
शौहर (Husband)औलाद है1/4 (चौथाई)
शौहर (Husband)औलाद नहीं है1/2 (आधा)
बीवी (Wife)औलाद है1/8 (आठवां)
बीवी (Wife)औलाद नहीं है1/4 (चौथाई)
बाप (Father)औलाद है1/6 (छठा)
माँ (Mother)औलाद है या भाई-बहन हैं1/6 (छठा)
माँ (Mother)औलाद/भाई-बहन नहीं हैं1/3 (तिहाई)

यतीम पोते-पोती का विरासत में हक़ (Rights of Orphaned Grandchildren)

एक बहुत अहम मसला यह है कि अगर किसी शख्स का बेटा या बेटी उसकी ज़िन्दगी में ही इंतकाल कर जाए, तो क्या उनके बच्चों (यतीम पोते-पोती) को दादा की जायदाद में हिस्सा मिलेगा?

  1. शरई उसूल: अगर मरने वाले (दादा) का कोई और बेटा ज़िंदा है, तो शरीयत के आम उसूल के मुताबिक यतीम पोते को विरासत में हिस्सा नहीं मिलता। क्योंकि उसूल है: “करीबी रिश्तेदार की मौजूदगी में दूर वाला महरूम हो जाता है”।
  2. दादा की ज़िम्मेदारी (वसीयत): लेकिन इस्लाम यतीमों को बेसहारा नहीं छोड़ता। दादा पर यह लाज़िम (ज़रूरी) है कि वह अपने यतीम पोते-पोतियों के लिए अपने माल के एक-तिहाई (1/3) हिस्से में से वसीयत कर जाए।
  3. वसीयत वाजिबा: अगर दादा ने वसीयत नहीं की, तो कई इस्लामी देशों के कानून में “वसीयत वाजिबा” के तहत यतीम पोते-पोतियों को उनके वालिद का हिस्सा (या अधिकतम एक-तिहाई) दिला दिया जाता है।

विरासत से जुड़ी गलतफहमियां (Misconceptions)

1. “बेटियों को हिस्सा नहीं देना चाहिए क्योंकि उनकी शादी में दहेज़ दिया था”

यह सरासर गलत और गैर-इस्लामी सोच है। दहेज़ एक रस्म है (जो इस्लाम में पसंददीदा नहीं), जबकि विरासत अल्लाह का हुक्म है। शादी पर खर्च करने से बेटी का विरासत में हक़ खत्म नहीं होता।

2. “सिर्फ बड़े बेटे का हक़ है”

इस्लाम में बड़े या छोटे बेटे का कोई फर्क नहीं है। सभी बेटों का हिस्सा बराबर होता है।

3. “ज़िन्दगी में ही सब बांट देना”

विरासत का कानून मौत के बाद लागू होता है। ज़िन्दगी में अगर कोई अपनी औलाद को कुछ देना चाहे तो उसे हिबा (Gift) कहते हैं। हिबा में बेहतर यह है कि बेटे और बेटी को बराबर दिया जाए, हालांकि कम-ज़्यादा करना हराम नहीं है लेकिन इंसाफ बेहतर है।

4. “सौतेली माँ या सौतेले भाई-बहन”

सौतेली माँ (Step-mother) का सौतेले बच्चों की जायदाद में कोई हिस्सा नहीं होता। इसी तरह सौतेले भाई-बहनों के अहकाम सगे भाई-बहनों से अलग होते हैं।

5. “घर सिर्फ बेटों का होता है”

यह एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है। घर या कोई भी जायदाद मरने वाले की मिल्कियत होती है और उसमें सभी वारिसों (बेटे, बेटी, बीवी, माँ-बाप) का हिस्सा होता है। बेटियों को घर में हिस्सा न देना उनका हक़ मारना है।

6. “वसीयत से किसी को भी हिस्सा दे सकते हैं”

वसीयत सिर्फ उन लोगों के लिए की जा सकती है जो शरई तौर पर वारिस नहीं हैं (जैसे कोई गरीब रिश्तेदार, कोई इदारा या गोद लिया बच्चा)। जो वारिस हैं (जैसे बेटा, बेटी, बीवी), उनके लिए वसीयत करना जायज़ नहीं क्योंकि अल्लाह ने उनका हिस्सा खुद तय कर दिया है।

7. किसी एक बच्चे को हिबा (Gift) करना

ज़िन्दगी में अपनी जायदाद किसी एक बेटे या बेटी को दे देना और बाकी औलाद को महरूम कर देना सख्त नापसंदीदा (Makruh) और बाज़ उलेमा के नज़दीक हराम है। हदीस में इसे “जुल्म” कहा गया है। माँ-बाप को चाहिए कि अगर वो ज़िन्दगी में कुछ दें, तो सब बच्चों (बेटे और बेटियों) को बराबर दें ताकि उनमें आपस में नफरत पैदा न हो।


बेटी को हिस्सा न देने का गुनाह और उसका हल

बेटी का हक़ मारना कबीरा गुनाह है

किसी भी वारिस, खासकर बेटी या बहन को उसका शरई हक़ न देना अल्लाह की हदों को तोड़ने के बराबर है। यह एक कबीरा गुनाह (Major Sin) और ज़ुल्म है। जो लोग ऐसा करते हैं, वो कुरान की उस वईद (Warning) के हक़दार बनते हैं जिसमें अल्लाह ने अपनी हदों को तोड़ने वालों के लिए हमेशा की जहन्नम का अज़ाब बताया है।

बेटी अपना हक़ कैसे ले सकती है?

अगर किसी बेटी को उसके वालिद की विरासत से हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, तो वह ये कदम उठा सकती है:

  1. बातचीत और याददिहानी: सबसे पहले उसे अपने घर वालों (जैसे भाइयों) से नरमी के साथ बात करनी चाहिए और उन्हें अल्लाह के हुक्म और उसके अज़ाब की याद दिलानी चाहिए।
  2. कानूनी मदद (Legal Action): अगर बातचीत से मसला हल न हो, तो बेटी को कानूनी मदद लेने का पूरा हक़ है। भारत समेत कई देशों के कानून में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत की तकसीम की गुंजाइश है। अदालत के ज़रिये वह अपना शरई हक़ हासिल कर सकती है।
  3. माफ़ करना: अगर कोई बेटी अपनी खुशी से, बिना किसी दबाव के, अपना हिस्सा अपने भाइयों या किसी और वारिस को माफ़ कर दे, तो यह जायज़ है। लेकिन अगर उस पर किसी भी तरह का सामाजिक या भावनात्मक दबाव डालकर हक़ छुड़वाया जाए, तो यह माफ़ी अल्लाह के यहाँ क़बूल नहीं होगी और हक़ मारने का गुनाह बाकी रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क्या गोद लिए हुए बच्चे (Adopted Child) को विरासत मिलेगी?
A.

इस्लाम में मुंह बोले या गोद लिए हुए बच्चे का विरासत में हिस्सा नहीं होता। हालांकि, आप उसके लिए अपने माल के एक-तिहाई (1/3) हिस्से तक वसीयत कर सकते हैं।

Q. अगर वारिस काफिर (Non-Muslim) हो तो?
A.

हदीस के मुताबिक, मुसलमान काफिर का वारिस नहीं होता और काफिर मुसलमान का वारिस नहीं होता। यानी अगर बाप मुसलमान है और बेटा काफिर, तो बेटे को विरासत नहीं मिलेगी।

Q. क्या औरत अपनी विरासत (Meher/Property) की मालिक खुद है?
A.

जी हाँ, औरत को विरासत, मेहर या कमाई से जो भी माल मिले, वह उसकी तन्हा मालिक है। उस पर शौहर, बाप या किसी और का हक़ नहीं है।

Q. अगर मरने वाले ने कोई वारिस नहीं छोड़ा?
A.

अगर कोई करीबी वारिस (Zawil Furooz या Asbah) नहीं है, तो दूर के रिश्तेदारों (Zawil Arham) को मिलता है। अगर वो भी नहीं हैं, तो माल बैतुल-माल (इस्लामिक ट्रेज़री) या गरीबों में जाएगा।

Q. क्या बेटी के लिए वसीयत कर सकते हैं अगर जायदाद ज्यादा हो?
A.

जी नहीं, वारिस (जैसे बेटी) के लिए वसीयत करना जायज़ नहीं है, चाहे जायदाद कितनी भी हो। हदीस में है: “वारिस के लिए कोई वसीयत नहीं।” आप अपनी ज़िन्दगी में उसे तोहफा (Gift) दे सकते हैं, लेकिन वसीयत नहीं।

Q. अगर वालिद अपनी जायदाद बेचकर किसी एक बेटे के घर में लगा दें, तो उन्हें कैसे रोकें?
A.

चूंकि वालिद घर के बड़े हैं और जायदाद उनके नाम है, तो आप उनसे जबरदस्ती नहीं कर सकते। लेकिन शरीयत में औलाद के बीच नाइंसाफी करना ‘जुल्म’ है।


रोकने का तरीका: 1. नरमी से समझाएं: उन्हें हदीस का हवाला दें कि अल्लाह औलाद में बराबरी पसंद करता है और नाइंसाफी से भाई-बहनों में नफरत पैदा होती है। 2. किसी बड़े को बीच में लाएं: खानदान के किसी ऐसे बुज़ुर्ग या आलिम से बात करवाएं जिनकी वो इज़्ज़त करते हों। 3. सब्र और दुआ: अगर वो फिर भी न मानें, तो बदतमीज़ी न करें क्योंकि वालिद का एहतराम लाज़िम है। अपना मामला अल्लाह पर छोड़ दें।

Q. अगर दादा अपने मरहूम बेटे के हिस्से के बराबर पोतों के लिए वसीयत कर दे तो?
A.

यह बिल्कुल जायज़ और बेहतरीन अमल है। चूंकि यतीम पोते वारिस नहीं बनते (अगर चाचा ज़िंदा हों), इसलिए दादा अपने माल के एक-तिहाई (1/3) हिस्से तक उनके लिए वसीयत कर सकता है।


शर्त: अगर मरहूम बेटे का हिस्सा 1/3 के अंदर आता है, तो पोतों को पूरा मिल जाएगा। अगर 1/3 से ज्यादा बनता है, तो उन्हें सिर्फ 1/3 मिलेगा (जब तक कि बाकी वारिस अपनी खुशी से ज्यादा देने पर राज़ी न हों)।


नतीजा (Conclusion)

विरासत के अहकाम (Meeras Rules) पर अमल करना उतना ही ज़रूरी है जितना नमाज़ और रोज़े पर। यह “हकूक-उल-इबाद” (बंदों के हक़) का मामला है। अगर हमने किसी का हक़ मारा, तो क़यामत के दिन हमें अपनी नेकियां देकर उसका बदला चुकाना पड़ेगा।

अल्लाह हमें समझ दे कि हम अपनी ज़िन्दगी में और मरने के बाद अपने माल के मामले में अल्लाह के हुक्मों की पाबंदी करें। आमीन।

Disclaimer: यह जानकारी सिर्फ तालीमी मकसद के लिए है। असल बंटवारे से पहले किसी मुफ्ती या आलिम-ए-दीन से सलाह मशवरा ज़रूर करें।

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