Tahajjud Namaz Ka Tarika: वक़्त, रकात और फ़ज़ीलत
Tahajjud Namaz Ka Tarika: क्या आप अपनी दुआ कुबूल करवाना चाहते हैं? जानिए तहज्जुद की नमाज़ का सही वक़्त, रकात, पढ़ने का तरीका और इसके बेशुमार फायदे।

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तहज्जुद (Tahajjud) की नमाज़ को “मोमिन का शर्फ” (Honor of a Believer) कहा गया है। यह वो वक़्त होता है जब दुनिया सो रही होती है और अल्लाह का बंदा अपने रब से अकेले में बातें करता है। अगर आपकी कोई दुआ कुबूल नहीं हो रही या दिल में सुकून नहीं है, तो तहज्जुद की नमाज़ पढ़ना शुरू करें।
इस आर्टिकल में हम आसान लफ़्ज़ों में जानेंगे कि Tahajjud Namaz Ka Tarika क्या है, इसका सही वक़्त कब शुरू होता है और कितनी रकात पढ़नी चाहिए।
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तहज्जुद की फ़ज़ीलत (Quran aur Hadith se)
तहज्जुद की अहमियत का अंदाज़ा इस हदीस से लगाया जा सकता है:
हदीस: “अल्लाह तआला हर रात के आखिरी पहर (Last part of the night) में दुनिया के आसमान पर तशरीफ़ लाता है और फरमाता है: ‘है कोई मुझसे मांगने वाला जिसे मैं अता करूँ? है कोई बख्शिश मांगने वाला जिसे मैं माफ़ करूँ?’” (सहीह बुखारी)
कुरान में अल्लाह फरमाता है: “और रात के कुछ हिस्से में तहज्जुद पढ़ा करो, यह तुम्हारे लिए नफ़िल (अतिरिक्त) इबादत है। उम्मीद है कि तुम्हारा रब तुम्हें ‘मकाम-ए- महमूद’ पर खड़ा करेगा।” (सूरह अल-इसरा: 79)
तहज्जुद का सही वक़्त (Time of Tahajjud)
अक्सर लोग वक़्त को लेकर कंफ्यूज रहते हैं। चलिए इसे आसान करते हैं:
- शुरुआत: ईशा की नमाज़ पढ़ने के बाद सो जाएं। फिर रात में जब भी आँख खुले (फज्र से पहले), वो तहज्जुद का वक़्त है।
- सबसे अफ़ज़ल वक़्त: रात का आखिरी हिस्सा (Last Third of Night)।
- मिसाल: अगर मगरिब 6 बजे है और फज्र 5 बजे, तो रात के 3 हिस्से करें। आखिरी हिस्सा (लगभग 2 बजे से 5 बजे तक) सबसे बेहतरीन है।
- खत्म: फज्र की अज़ान (सुब्ह सादिक) होते ही तहज्जुद का वक़्त खत्म हो जाता है।
नोट: तहज्जुद के लिए सो कर उठना शर्त है। अगर आप बिना सोए पूरी रात नमाज़ पढ़ें तो वो ‘क़याम-उल-लैल’ कहलाएगा, तहज्जुद नहीं।
तहज्जुद की रकात (Rakat)
तहज्जुद की नमाज़ 2-2 रकात करके पढ़ी जाती है।
- कम से कम: 2 रकात।
- अफ़ज़ल (Best): 8 रकात। (नबी करीम ﷺ अक्सर 8 रकात तहज्जुद और 3 रकात वित्र पढ़ते थे)।
- ज़्यादा से ज़्यादा: 12 रकात या जितनी आप आसानी से पढ़ सकें।
Tahajjud Namaz Ka Tarika (Step-by-Step)
तहज्जुद पढ़ने का तरीका बिल्कुल आम नफ़िल नमाज़ जैसा है:
- वुज़ू: सबसे पहले अच्छी तरह वुज़ू (Wazu) करें।
- नियत: दिल में इरादा करें: “मैं नियत करता हूँ 2 रकात नमाज़ तहज्जुद की, वास्ते अल्लाह के…”
- तकबीर: ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर हाथ बांध लें।
- सना और क़िरात: सना पढ़ें, फिर सूरह फातिहा और कुरान की कोई भी सूरह पढ़ें।
- टिप: अगर आपको बड़ी सूरह याद नहीं, तो सूरह इखलास या जो भी याद हो, पढ़ सकते हैं।
- रुकू और सज्दा: आम नमाज़ की तरह रुकू और सज्दे करें।
- सलाम: 2 रकात पूरी करके सलाम फेर दें।
- इसी तरह जितनी रकात पढ़ना चाहें, 2-2 करके पढ़ें।
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तहज्जुद के लिए उठने का तरीका (Real-Life Problem)
बहुत से लोग तहज्जुद पढ़ना चाहते हैं लेकिन आँख नहीं खुलती। इसके लिए कुछ टिप्स:
- जल्दी सोएं: ईशा के बाद फौरन सोने की आदत डालें।
- नियत करके सोएं: सोने से पहले पक्का इरादा करें कि मुझे अल्लाह से मिलने उठना है।
- अलार्म: अपने फोन में अलार्म लगाएं और उसे बिस्तर से दूर रखें ताकि उठकर बंद करना पड़े।
- गुनाहों से बचें: सुफियान सूरी (रह.) कहते हैं कि “मैं एक गुनाह की वजह से 5 महीने तक तहज्जुद से महरूम रहा।” दिन में गुनाहों से बचना रात की इबादत को आसान करता है।
तहज्जुद के फायदे (Benefits)
- दुआ की कुबूलियत: यह वो वक़्त है जब दुआएं सीधे अर्श तक जाती हैं।
- चेहरे का नूर: तहज्जुद पढ़ने वालों के चेहरे पर एक अलग ही चमक और सुकून होता है।
- सेहत: मेडिकल साइंस के मुताबिक भी सुबह जल्दी उठना डिप्रेशन और दिल की बीमारियों से बचाता है।
- जन्नत का रास्ता: यह नमाज़ जन्नत में ले जाने वाली और जहन्नम से बचाने वाली है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या तहज्जुद के लिए सोना ज़रूरी है?
जी हाँ, ‘तहज्जुद’ का मतलब ही है ‘नींद तोड़कर उठना’। अगर आप ईशा के बाद सोए नहीं, तो वो नफ़िल नमाज़ होगी, तहज्जुद का सवाब (जो सो कर उठने पर है) शायद पूरा न मिले।
Q. अगर तहज्जुद में आँख न खुले तो क्या करें?
अगर आपने पक्की नियत की थी लेकिन आँख नहीं खुली, तो हदीस में है कि अल्लाह उसे नमाज़ का सवाब देता है और उसका सोना अल्लाह की तरफ से सदका होता है। आप अफ़सोस न करें और अगली रात कोशिश करें।
Q. क्या तहज्जुद के बाद वित्र पढ़ना ज़रूरी है?
वित्र की नमाज़ रात की आखिरी नमाज़ होनी चाहिए। अगर आपको यकीन है कि आप तहज्जुद के लिए उठेंगे, तो ईशा के साथ वित्र न पढ़ें, बल्कि तहज्जुद के बाद पढ़ें। लेकिन अगर उठने का भरोसा न हो, तो ईशा के साथ ही वित्र पढ़ लेना बेहतर है।
Q. अगर कज़ा नमाज़ें बाकी हों तो क्या तहज्जुद पढ़ सकते हैं?
नफ़िल (तहज्जुद) से ज़्यादा ज़रूरी फ़र्ज़ नमाज़ें हैं। अगर आपकी ज़िंदगी की बहुत सी नमाज़ें छूटी हुई हैं, तो बेहतर है कि तहज्जुद के वक़्त में आप अपनी कज़ा नमाज़ें (Qaza Namaz) अदा करें।
नतीजा:
कोशिश करें कि हफ्ते में कम से कम एक बार या जब भी मौका मिले, तहज्जुद ज़रूर पढ़ें। यह अल्लाह से दोस्ती करने का सबसे खास वक़्त है। अल्लाह हमें अमल की तौफीक दे। आमीन।
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