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Surah Maidah in Hindi: सूरह मायदा की फजीलत और पहली 50 आयतें

Surah Maidah in Hindi: जानिए सूरह मायदा की फजीलत और पहली 50 आयतों का हिंदी तर्जुमा। यह सूरह हलाल-हराम, वज़ू के अहकाम और दीन के मुकम्मल होने का ऐलान करती है।

Surah Maidah in Hindi: सूरह मायदा की फजीलत और पहली 50 आयतें

Table of Contents

सूरह मायदा (Surah Al-Maidah) कुरान मजीद की 5वीं सूरह है। “अल-मायदा” का मतलब है “दस्तरख्वान” (The Table Spread with Food)। यह मदीना में नाज़िल हुई (मदनी सूरह) और इसमें 120 आयतें हैं।

इस सूरह का नाम उस वाकये पर रखा गया है जब हज़रत ईसा (अ.स.) के हवारियों (शिष्यों) ने आसमान से खाने का दस्तरख्वान उतारने की ख्वाहिश की थी। इस सूरह में बहुत से अहम अहकाम (नियम) बयान किए गए हैं, जैसे हलाल-हराम, वज़ू, और वादों को पूरा करने का हुक्म।

इस आर्टिकल में हम Surah Maidah in Hindi की पहली 50 आयतों का तर्जुमा और इसकी फजीलत जानेंगे।

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सूरह मायदा की अहमियत (Importance of Surah Al-Maidah)

  1. अहकाम की सूरह: इसमें खाने-पीने (हलाल-हराम), शिकार, वज़ू, तयम्मुम और कसम के कफ्फारे जैसे कई ज़रूरी मसाइल बयान किए गए हैं।
  2. दीन का मुकम्मल होना: इसी सूरह की आयत नंबर 3 में अल्लाह ने दीन-ए-इस्लाम के मुकम्मल होने का ऐलान किया है।
  3. वादों को पूरा करना: सूरह की शुरुआत ही वादों और अहद को पूरा करने के हुक्म से होती है।
  4. दस्तरख्वान का वाकिया: इसमें हज़रत ईसा (अ.स.) का वो मोजिज़ा (चमत्कार) बयान किया गया है जब अल्लाह ने आसमान से खाने का दस्तरख्वान नाज़िल किया था।

Surah Maidah Ayat 1-50 in Hindi

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

  1. या अय्युहल-लज़ीना आमनू औफू बिल-उक़ूद, उहिल्लत लकुम बहीमतुल-अन्आमि इल्ला मा युत्ला अलैकुम गैरा मुहिल्लिस-सैदि व अन्तुम हुरुम, इन्नल्लाहा यहकुमु मा युरीद।
    (ऐ ईमान वालों! अपने अहद (वादों) को पूरा करो। तुम्हारे लिए चौपाए जानवर हलाल किए गए, सिवाय उनके जो तुम्हें पढ़कर सुनाए जाएंगे, लेकिन जब तुम एहराम की हालत में हो तो शिकार को हलाल न समझो। बेशक अल्लाह जो चाहता है हुक्म देता है।)

  2. या अय्युहल-लज़ीना आमनू ला तुहिल्लू शआ-इरल्लाहि व लश-शहरल-हरामा व लल-हदया व लल-क़ला-इदा व ला आम्मीनल्-बैतल-हरामा यब्तगूना फज़्लम-मिर-रब्बिहिम व रिज़्वाना…
    (ऐ ईमान वालों! अल्लाह की निशानियों की बेहुर्मती न करो, न हुरमत वाले महीने की, न क़ुरबानी के जानवरों की, न पट्टे वाले जानवरों की, और न उन लोगों की जो अपने रब के फज़्ल और रज़ामंदी की तलाश में बैतुल-हराम (काबा) का इरादा करके जा रहे हों…)

  3. हुर्रिमत अलैकुमुल-मैततु वद-दमु व लहमुल-खिन्ज़ीरि व मा उहिल्ला लि-गैरिल्लाहि बिही… अलयौ-म अक्मल्तु लकुम दी-नकुम व अत्मम्तु अलैकुम निअ्मती व रज़ीतु लकुमुल-इस्लामा दीना…
    (तुम पर हराम किया गया है मुर्दार, खून, सुअर का गोश्त, और वो जानवर जो अल्लाह के सिवा किसी और के नाम पर ज़िबह किया गया हो… आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन के तौर पर पसंद कर लिया…)

  4. यस-अलू-नका माज़ा उहिल्ला लहुम, कुल उहिल्ला लकुमुत-तय्यिबातु व मा अल्लम्तुम मिनल-जवारिहि मुकल्लिबीना तु-अल्लिमूनहुन्ना मिम्मा अल्लमकुमुल्लाह…
    (वो आपसे पूछते हैं कि उनके लिए क्या हलाल किया गया है? कह दीजिए: तुम्हारे लिए पाकीज़ा चीज़ें हलाल की गई हैं और वो शिकारी जानवर जिन्हें तुमने सिखाया हो…)

  5. अलयौ-म उहिल्ला लकुमुत-तय्यिबात, व तआमुल्लज़ीना ऊतुल-किताबा हिल्लुल-लकुम व तआमुकुम हिल्लुल-लहुम, वल-मुह्सनातु मिनल-मुअ्मिनाति वल-मुह्सनातु मिनल्लज़ीना ऊतुल-किताबा मिन क़ब्लिकुम…
    (आज तुम्हारे लिए पाकीज़ा चीज़ें हलाल कर दी गईं, और अहले किताब का खाना तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है, और पाक दामन औरतें मोमिनों में से और पाक दामन औरतें उनसे जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई…)

  6. या अय्युहल-लज़ीना आमनू इज़ा क़ुम्तुम इलस-सलाति फगसिलू वुजू-हकुम व अय्दियकुम इलल-मराफ़िक़ि वम्सहू बि-रुऊसिकुम व अर्जु-लकुम इलल-कअ्बैन…
    (ऐ ईमान वालों! जब तुम नमाज़ के लिए खड़े हो तो अपने चेहरों को और हाथों को कोहनियों समेत धो लो और अपने सरों का मसह करो और अपने पैरों को टखनों समेत धो लो…)

  7. वज़्कुरू निअ्मतल्लाहि अलैकुम व मीसाक़हुल्लज़ी वास-सक़कुम बिही इज़ क़ुल्तुम समिअ्ना व अतअ्ना, वत्तक़ुल्लाह, इन्नल्लाहा अलीमुम बि-ज़ातिस-सुदूर।
    (और अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो और उस अहद को जो उसने तुमसे लिया था, जब तुमने कहा: हमने सुना और हमने माना, और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह सीनों की बातों को जानने वाला है।)

  8. या अय्युहल-लज़ीना आमनू कूनू क़व्वामीना लिल्लाहि शुहदा-अ बिल-क़िस्त, व ला यजरिमन्नकुम श-नआनु क़ौमिन अला अल्ला तअ्दिलू, इअ्दिलू, हुवा अक़रबु लित-तक़वा, वत्तक़ुल्लाह, इन्नल्लाहा ख़बीरूम बिमा तअ्मलून।
    (ऐ ईमान वालों! अल्लाह के लिए मज़बूती से खड़े रहने वाले, इन्साफ के साथ गवाही देने वाले बनो, और किसी कौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर न उभारे कि तुम इन्साफ न करो, इन्साफ करो, यही तक़वा के ज़्यादा करीब है, और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह तुम्हारे कामों से बाखबर है।)

  9. व-अदल्लाहुल्लज़ीना आमनू व अमिलुस-सालिहाति लहुम-मगफिरतुंव-व अजरुन अज़ीम।
    (अल्लाह ने उन लोगों से वादा किया है जो ईमान लाए और नेक अमल किए, उनके लिए बख्शिश और बड़ा अज्र है।)

  10. वल्लज़ीना कफरू व कज़्ज़बू बि-आयातिना उलाइका अस्हाबुल-जहीम।
    (और जिन लोगों ने कुफ्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही जहन्नम वाले हैं।)

  11. या अय्युहल-लज़ीना आमनुज़्कुरू निअ्मतल्लाहि अलैकुम इज़ हम्मा क़ौमुन अंय-यब्सुतू इलैकुम अय्दियहुम फ-कफ्फा अय्दियहुम अन्कुम, वत्तक़ुल्लाह, व अलल्लाहि फल-यतवक्क-लिल मुअ्मिनून।
    (ऐ ईमान वालों! अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो जब एक कौम ने इरादा किया कि तुम्हारी तरफ अपने हाथ बढ़ाएं तो उसने उनके हाथों को तुमसे रोक दिया, और अल्लाह से डरो, और मोमिनों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।)

  12. व लक़द अख़ज़ल्लाहु मीसाक़ा बनी इसरा-ईल, व ब-अस्ना मिन्हुमुस्नै अशरा नक़ीबा…
    (और बेशक अल्लाह ने बनी इसराईल से अहद लिया, और हमने उनमें से बारह सरदार मुकर्रर किए…)

  13. फ-बिमा नक़ज़िहिम मीसाक़हुम ल-अन्नाहुम व ज-अल्ना क़ुलूबहुम क़ासियह, युहर्रिफूनल-कलिमा अन मवाज़ि-इही व नसू हज़्ज़म-मिम्मा ज़ुक्किरू बिह…
    (तो उनके अहद तोड़ने की वजह से हमने उन पर लानत की और उनके दिलों को सख्त कर दिया, वो बातों को उनकी जगहों से फेर देते हैं और जो नसीहत उन्हें की गई थी उसका एक हिस्सा भुला बैठे…)

  14. व मिनल्लज़ीना क़ालू इन्ना नसारा अख़ज़्ना मीसाक़हुम फ-नसू हज़्ज़म-मिम्मा ज़ुक्किरू बिह…
    (और उन लोगों से भी जिन्होंने कहा कि हम नसारा (ईसाई) हैं, हमने उनका अहद लिया तो वो भी उस नसीहत का एक हिस्सा भुला बैठे जो उन्हें की गई थी…)

  15. या अहलल-किताबि क़द जा-अकुम रसूलुना युबय्यिनु लकुम कसीरम-मिम्मा कुन्तुम तुख्फूना मिनल-किताबि व यअ्फू अन कसीर…
    (ऐ अहले किताब! बेशक तुम्हारे पास हमारे रसूल आ गए हैं जो तुम्हारे लिए बहुत सी वो बातें खोलकर बयान करते हैं जो तुम किताब में से छुपाते थे और बहुत सी बातों से दरगुज़र करते हैं…)

  16. यहदी बिहिल्लाहु मनित्त-ब-अ रिज़्वानहू सुबुलस-सलामि व युख्रिजुहुम मिनज़-ज़ुलुमाति इलन-नूरि बि-इज़्निही व यहदीहिम इला सिरातिम-मुस्तक़ीम।
    (अल्लाह उसके ज़रिए उन्हें हिदायत देता है जो उसकी रज़ामंदी की पैरवी करें, सलामती के रास्तों की, और उन्हें अपनी इजाज़त से अंधेरों से नूर की तरफ निकालता है और उन्हें सीधे रास्ते की तरफ हिदायत देता है।)

  17. लक़द कफरल्लज़ीना क़ालू इन्नल्लाहा हुवल-मसीहुब्नु मरयम…
    (बेशक उन लोगों ने कुफ्र किया जिन्होंने कहा कि अल्लाह ही मसीह इब्ने मरियम है…)

  18. व लिल्लाहि मुल्कुस-समावाति वल-अर्ज़ि व मा बैनहुमा, यख्लुक़ु मा यशा, वल्लाहु अला कुल्लि शैइन क़दीर।
    (और अल्लाह ही के लिए आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उसकी बादशाही है, वो जो चाहता है पैदा करता है, और अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है।)

  19. या अहलल-किताबि क़द जा-अकुम रसूलुना युबय्यिनु लकुम अला फतरतिम-मिनर-रुसुलि…
    (ऐ अहले किताब! बेशक तुम्हारे पास हमारे रसूल आ गए हैं जो रसूलों के एक सिलसिले के बाद तुम्हारे लिए (दीन) बयान करते हैं…)

  20. व इज़ क़ाला मूसा लि-क़ौमिही या क़ौमिज़्कुरू निअ्मतल्लाहि अलैकुम इज़ ज-अला फीकुम अम्बिया-अ व ज-अ-लकुम मुलूकंव-व आताकुम मा लम युअ्ति अहदम-मिनल आलमीन।
    (और जब मूसा ने अपनी कौम से कहा: ऐ मेरी कौम! अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो जब उसने तुममें नबी बनाए और तुम्हें बादशाह बनाया और तुम्हें वो दिया जो जहानों में किसी को नहीं दिया।)

  21. या क़ौमिद-खुलुल-अर्ज़ल-मुक़द्द-सतल-लती क-त-बल्लाहु लकुम व ला तरतद्दू अला अदबारिकुम फ-तनक़लिबू खासिरिन।
    (ऐ मेरी कौम! उस मुकद्दस ज़मीन में दाखिल हो जाओ जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दी है और अपनी पीठों पर वापस न लौटो, वरना तुम घाटे में पड़ जाओगे।)

  22. क़ालू या मूसा इन्ना फीहा क़ौमन जब्बारीन, व इन्ना लन-नदखु-लहा हत्ता यखरुजू मिन्हा…
    (उन्होंने कहा: ऐ मूसा! बेशक उसमें ज़बरदस्त लोग हैं, और हम हरगिज़ उसमें दाखिल नहीं होंगे जब तक वो उससे निकल न जाएं…)

  23. क़ाला रजुलानि मिनल्लज़ीना यख़ाफूना अन-अमल्लाहु अलैहिमद-खुलू अलैहिमुल-बाब…
    (उन लोगों में से दो मर्दों ने जो (अल्लाह से) डरते थे और जिन पर अल्लाह ने इनाम किया था, कहा: उन पर दरवाज़े से दाखिल हो जाओ…)

  24. क़ालू या मूसा इन्ना लन-नदखु-लहा अबदम-मा दामू फीहा, फज़्हब अन्ता व रब्बुका फ-क़ातिला इन्ना हाहुना क़ा-इदून।
    (उन्होंने कहा: ऐ मूसा! हम हरगिज़ उसमें दाखिल नहीं होंगे जब तक वो उसमें हैं, तो तुम और तुम्हारा रब जाओ और लड़ो, हम तो यहीं बैठे हैं।)

  25. क़ाला रब्बी इन्नी ला अम्लिकु इल्ला नफ्सी व अख़ी, फफरुक़ बैनना व बैनल-क़ौमिल-फासिक़ीन।
    (उन्होंने कहा: ऐ मेरे रब! मैं अपनी जान और अपने भाई के सिवा किसी पर इख्तियार नहीं रखता, तो हमारे और इस नाफरमान कौम के बीच जुदाई डाल दे।)

  26. क़ाला फ-इन्नहा मुहर्र-मतुन अलैहिम अर्बईना सनह, यतीहूना फिल-अर्ज़, फला तअ्स अलल-क़ौमिल-फासिक़ीन।
    (फरमाया: तो बेशक वो (ज़मीन) उन पर चालीस साल तक हराम कर दी गई, वो ज़मीन में भटकते फिरेंगे, तो तुम इस नाफरमान कौम पर अफ़सोस न करो।)

  27. वत्लु अलैहिम न-ब-अबनै आदमा बिल-हक़्क़, इज़ क़र्रबा क़ुरबानन फ-तुक़ुब्बिला मिन अहदिहिमा व लम यु-त-क़ब्बल मिनल-आखर…
    (और उन्हें आदम के दो बेटों (हाबील और क़ाबील) का किस्सा हक़ के साथ सुनाओ, जब दोनों ने एक-एक क़ुरबानी पेश की तो एक की कुबूल हो गई और दूसरे की कुबूल नहीं हुई…)

  28. क़ाला ल-अक़्तुलन्नक, क़ाला इन्नमा य-त-क़ब्बलुल्लाहु मिनल-मुत्तक़ीन।
    ((क़ाबील ने) कहा: मैं तुझे ज़रूर क़त्ल कर दूँगा, (हाबील ने) कहा: अल्लाह तो सिर्फ परहेज़गारों से ही कुबूल करता है।)

  29. ल-इम-ब-सत्त इलय्या य-दका लि-तक़्तुलनी मा अना बि-बासितिंय-यदिया इलैका लि-अक़्तुलक, इन्नी अख़ाफुल्लाहा रब्बल-आलमीन।
    (अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाएगा तो मैं तुझे क़त्ल करने के लिए अपना हाथ तेरी तरफ नहीं बढ़ाऊंगा, बेशक मैं अल्लाह से डरता हूँ जो तमाम जहानों का रब है।)

  30. इन्नी उरीदु अन तबू-अ बि-इस्मी व इस्मिका फ-तकूना मिन अस्हाबिन-नार, व ज़ालिका जज़ा-उज़-ज़ालिमीन।
    (मैं चाहता हूँ कि तू मेरा गुनाह और अपना गुनाह दोनों लेकर लौटे तो तू जहन्नम वालों में से हो जाए, और यही ज़ालिमों की सज़ा है।)

  31. फ-तव्व-अत लहू नफ्सुहू क़त्ला अख़ीहि फ-क़-त-लहू फ-अस्बहा मिनल-खासिरिन।
    (तो उसके नफ़्स ने उसे अपने भाई के क़त्ल पर आमादा कर दिया, तो उसने उसे क़त्ल कर दिया और घाटा उठाने वालों में से हो गया।)

  32. मिन अजलि ज़ालिका क-तब्ना अला बनी इसरा-ईल अन्नहू मन क़-त-ल नफ्सम बि-गैर नफ्सिन औ फसादिल फिल-अर्ज़ि फ-क-अन्नमा क़-त-लन-नासा जमीआ…
    (इसी वजह से हमने बनी इसराईल पर लिख दिया कि जिसने किसी जान को बगैर किसी जान के या ज़मीन में फसाद के क़त्ल किया तो गोया उसने तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया…)

  33. इन्नमा जज़ा-उल्लज़ीना युहारिबूनल्लाहा व रसूलहू व यस-औना फिल-अर्ज़ि फसादन अंय-युक़त्तलू औ युसल्ल-बू औ तुक़त्त-अ अय्दीहिम व अर्जु-लुहुम मिन ख़िलाफिन औ युन्फौ मिनल-अर्ज़…
    (बेशक जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से लड़ते हैं और ज़मीन में फसाद फैलाते फिरते हैं, उनकी सज़ा यही है कि उन्हें क़त्ल किया जाए या सूली पर चढ़ाया जाए या उनके हाथ और पैर मुखालिफ सिम्तों से काट दिए जाएं या उन्हें ज़मीन से निकाल दिया जाए…)

  34. इल्लल्लज़ीना ताब मिन क़ब्लि अन तक़दिरू अलैहिम, फअ्लमू अन्नल्लाहा गफूरुर-रहीम।
    (सिवाय उन लोगों के जो तुम्हारे काबू में आने से पहले तौबा कर लें, तो जान लो कि अल्लाह बख्शने वाला, मेहरबान है।)

  35. या अय्युहल-लज़ीना आमनुत्तक़ुल्लाहा वब्तगू इलैहिल-वसीलता व जाहिदू फी सबीलिही ल-अल्लकुम तुफ्लिहून।
    (ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और उसकी तरफ वसीला (ज़रिया) तलाश करो और उसकी राह में जिहाद करो ताकि तुम कामयाब हो जाओ।)

  36. इन्नल्लज़ीना कफरू लौ अन्ना लहुम मा फिल-अर्ज़ि जमीअंव-व मिस्लहू म-अहू लि-यफ्तादू बिही मिन अज़ाबि यौमिल-क़ियामति मा तुक़ुब्बिला मिन्हुम, व लहुम अज़ाबुन अलीम।
    (बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया, अगर उनके पास वो सब कुछ हो जो ज़मीन में है और उतना ही और भी हो ताकि वो कयामत के दिन के अज़ाब से बचने के लिए फिदिया दें, तो उनसे कुबूल नहीं किया जाएगा, और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।)

  37. युरीदूना अंय-यखरुजू मिनन-नारि व मा हुम बि-ख़ारिजीना मिन्हा, व लहुम अज़ाबुम-मुक़ीम।
    (वो चाहेंगे कि आग से निकल जाएं लेकिन वो उससे निकलने वाले नहीं, और उनके लिए हमेशा रहने वाला अज़ाब है।)

  38. वस-सारिक़ु वस-सारिक़तु फक़्त-ऊ अय्दियहुमा जज़ा-अम-बिमा क-स-बा नकालम-मिनल्लाह, वल्लाहु अज़ीज़ुन हकीम।
    (और चोर, मर्द हो या औरत, दोनों के हाथ काट दो, उनके किए का बदला और अल्लाह की तरफ से इबरतनाक सज़ा, और अल्लाह ज़बरदस्त, हिकमत वाला है।)

  39. फ-मन ताबा मिम-बअ्दि ज़ुल्मिही व अस्लहा फ-इन्नल्लाहा यतूबु अलैह, इन्नल्लाहा गफूरुर-रहीम।
    (फिर जो अपने ज़ुल्म के बाद तौबा कर ले और अपनी इस्लाह कर ले तो बेशक अल्लाह उसकी तौबा कुबूल करता है, बेशक अल्लाह बख्शने वाला, मेहरबान है।)

  40. अलम तअ्लम अन्नल्लाहा लहू मुल्कुस-समावाति वल-अर्ज़ि यु-अज़्ज़िबु मंय-यशा-उ व यगफिरु लि-मंय-यशा, वल्लाहु अला कुल्लि शैइन क़दीर।
    (क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह ही के लिए आसमानों और ज़मीन की बादशाही है, वो जिसे चाहता है अज़ाब देता है और जिसे चाहता है बख्श देता है, और अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है।)

  41. या अय्युहर-रसूलु ला यहज़ुन्कल्लज़ीना युसारिऊना फिल-कुफ्रि मिनल्लज़ीना क़ालू आमन्ना बि-अफ्वाहिहिम व लम तुअ्मिन क़ुलूबुहुम…
    (ऐ रसूल! आपको वो लोग गमगीन न करें जो कुफ्र में दौड़-धूप करते हैं, उनमें से जो अपने मुँह से कहते हैं कि हम ईमान लाए हालांकि उनके दिल ईमान नहीं लाए…)

  42. सम्माऊना लिल-कज़िबि अक्कालूना लिस-सुहत…
    (वो झूठ को बहुत सुनने वाले, हराम को बहुत खाने वाले हैं…)

  43. व कैफा युहक्किमूनका व इन्दहुमुत-तौरातु फीहा हुक्मुल्लाहि…
    (और वो आपसे कैसे फैसला करवाते हैं जबकि उनके पास तौरात है जिसमें अल्लाह का हुक्म है…)

  44. इन्ना अन्ज़ल्नत-तौरात फीहा हुदंव-व नूर…
    (बेशक हमने तौरात नाज़िल की जिसमें हिदायत और नूर था…)

  45. व क-तब्ना अलैहिम फीहा अन्नन-नफ्-स बिन-नफ्सि वल-ऐना बिल-ऐनि वल-अन्फा बिल-अन्फि वल-उज़ुना बिल-उज़ुनि वस-सिन्ना बिस-सिन्नि वल-जुरूहा क़िसास…
    (और हमने उसमें उन पर लिख दिया कि जान के बदले जान, और आँख के बदले आँख, और नाक के बदले नाक, और कान के बदले कान, और दांत के बदले दांत, और ज़ख्मों का बदला है…)

  46. व क़फ्फैना अला आसारिहिम बि-ईसब्नि मरयमा मुसद्दिक़ल-लिमा बैना यदैहि मिनत-तौरात, व आतैनाहुल-इन्जीला फीहि हुदंव-व नूर…
    (और हमने उनके पीछे ईसा इब्ने मरियम को भेजा जो अपने से पहले की किताब तौरात की तस्दीक करने वाले थे, और हमने उन्हें इंजील दी जिसमें हिदायत और नूर था…)

  47. वल-यहकुम अहलुल-इन्जीलि बिमा अन्ज़लल्लाहु फीह…
    (और चाहिए कि अहले इंजील उसी के मुताबिक फैसला करें जो अल्लाह ने उसमें नाज़िल किया है…)

  48. व अन्ज़ल्ना इलैकल-किताबा बिल-हक़्क़ि मुसद्दिक़ल-लिमा बैना यदैहि मिनल-किताबि व मुहयमिनन अलैह…
    (और हमने आपकी तरफ हक़ के साथ किताब नाज़िल की जो अपने से पहले की किताबों की तस्दीक करने वाली और उन पर निगहबान है…)

  49. व अनिहकुम-बैनहुम बिमा अन्ज़लल्लाहु व ला तत्तबिअ् अह्वा-अहुम वह्ज़रहुम अंय-यफ्तिनूका अन बअ्ज़ि मा अन्ज़लल्लाहु इलैक…
    (और आप उनके दरमियान उसी के मुताबिक फैसला करें जो अल्लाह ने नाज़िल किया है और उनकी ख्वाहिशों की पैरवी न करें और उनसे बचें कि वो आपको उसमें से कुछ से बहका दें जो अल्लाह ने आपकी तरफ नाज़िल किया है…)

  50. अ-फ-हुक्मल-जाहिलिय्यति यबगून, व मन अहसनु मिनल्लाहि हुक्मल-लि-क़ौमिंय-यूक़िनून।
    (तो क्या वो जाहिलियत का फैसला चाहते हैं? और यकीन रखने वाली कौम के लिए अल्लाह से बेहतर फैसला करने वाला कौन है?)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. मायदा (Maidah) का क्या मतलब है?
A.

“मायदा” का मतलब है “खाने से भरा हुआ दस्तरख्वान”। यह हज़रत ईसा (अ.स.) के हवारियों की ख्वाहिश पर आसमान से उतारा गया था।

Q. यह सूरह मक्की है या मदनी?
A.

यह एक मदनी सूरह है, जो हिजरत के बाद मदीना में नाज़िल हुई। इसमें ज़्यादातर अहकाम और कानून बयान किए गए हैं।

Q. इस सूरह का असल पैगाम क्या है?
A.

इस सूरह का असल पैगाम यह है कि मुसलमान अपने वादों को पूरा करें, हलाल-हराम का ख्याल रखें और अल्लाह के अहकाम पर पूरी तरह अमल करें क्योंकि अब दीन मुकम्मल हो चुका है।


नतीजा (Conclusion)

सूरह मायदा हमें एक मुकम्मल इस्लामी ज़िन्दगी गुज़ारने के उसूल सिखाती है। यह हमें याद दिलाती है कि अल्लाह ने हम पर अपनी नेमत पूरी कर दी है, अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उसके अहकाम पर चलें।

अल्लाह हमें दीन की सही समझ और अमल की तौफीक दे। आमीन।

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