Surah Alaq in Hindi: सूरह अलक़ (इक़रा) की फजीलत और तर्जुमा
Surah Alaq in Hindi: जानिए कुरान की सबसे पहली नाज़िल होने वाली सूरह अलक़ (इक़रा) का हिंदी तर्जुमा और फजीलत। यह सूरह "पढ़ने" के हुक्म से शुरू होती है।

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सूरह अलक़ (Surah Al-Alaq) कुरान मजीद की 96वीं सूरह है। “अलक़” का मतलब है “जमा हुआ खून” (The Clot)। यह मक्का में नाज़िल हुई और इसमें 19 आयतें हैं।
यह सूरह इस्लाम की तारीख में बहुत खास अहमियत रखती है क्योंकि इसकी शुरुआती 5 आयतें कुरान की सबसे पहली वही (Revelation) हैं जो नबी करीम (ﷺ) पर गार-ए-हिरा (Cave of Hira) में नाज़िल हुईं। यह सूरह “इक़रा” (Iqra) यानी “पढ़ो” के हुक्म से शुरू होती है।
इस आर्टिकल में हम Surah Alaq in Hindi, इसका तर्जुमा और अहमियत जानेंगे।
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सूरह अलक़ की अहमियत (Importance of Surah Al-Alaq)
- पहली वही: यह सूरह कुरान की शुरुआत का ऐलान है। इसने नबी (ﷺ) को नबूवत का आगाज़ किया।
- इल्म की अहमियत: इस्लाम का पहला हुक्म “पढ़ो” था। यह बताता है कि इस्लाम में इल्म (Knowledge) हासिल करने की कितनी ज़्यादा अहमियत है।
- इंसान की हकीकत: यह सूरह बताती है कि अल्लाह ने इंसान को एक मामूली खून के लोथड़े से बनाया, फिर उसे इल्म देकर अशरफुल मखलूकात (सबसे बेहतर) बनाया।
- सज्दे की आयत: इस सूरह की आखिरी आयत (आयत 19) तिलावत-ए-सज्दा है, जिसे पढ़ने या सुनने पर सज्दा करना वाजिब है।
Surah Alaq in Hindi (Hindi Mein)
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
इक़-रअ् बिस्मि रब्बिकल-लज़ी ख़लक़।
(पढ़ो! अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया।)ख़लक़ल-इंसाना मिन अलक़।
(उसने इंसान को जमे हुए खून से पैदा किया।)इक़-रअ् व रब्बुकल-अकरम।
(पढ़ो! और तुम्हारा रब बड़ा करीम है।)अल्लज़ी अल्लमा बिल-क़लम।
(जिसने कलम के ज़रिए (इल्म) सिखाया।)अल्लमल-इंसाना मा लम यअ्लम।
(इंसान को वो सिखाया जो वो नहीं जानता था।)कल्ला इन्नल-इंसाना ल-यत्गा।
(हरगिज़ नहीं! बेशक इंसान सरकशी (हद से आगे बढ़ना) करता है।)अर-रआहुस्तग्ना।
(जब वो अपने आप को बे-नियाज़ (Self-sufficient) देखता है।)इन्ना इला रब्बिकर-रुज्आ।
(बेशक तुम्हारे रब ही की तरफ लौटना है।)अ-र-ऐतल-लज़ी यन्हा।
(क्या तुमने उस शख्स (अबू जहल) को देखा जो मना करता है।)अब्दन इज़ा सल्ला।
(एक बंदे (नबी ﷺ) को जब वो नमाज़ पढ़ता है।)अ-र-ऐता इन काना अलल-हुदा।
(भला देखो तो, अगर वो (नबी) हिदायत पर हो।)औ अमरा बित-तक़वा।
(या परहेज़गारी का हुक्म देता हो।)अ-र-ऐता इन कज़्ज़बा व तवल्ला।
(भला देखो तो, अगर वो (अबू जहल) झुठलाता और मुँह फेरता है।)अलम यअ्लम बि-अन्नल्लाहा यरा।
(क्या वो नहीं जानता कि अल्लाह देख रहा है?)कल्ला ल-इल्लम् यन्तहि ल-नस्फअम्-बिन-नासियाह।
(हरगिज़ नहीं! अगर वो बाज़ न आया तो हम ज़रूर (उसकी) पेशानी के बाल पकड़कर घसीटेंगे।)नासियातिन काज़िबतिन खातिअह।
(झूठी, खताकार पेशानी।)फल-यद्उ नादियह।
(तो वो अपने साथियों को बुला ले।)स-नद्उज़-ज़बानियह।
(हम भी (जहन्नम के) फरिश्तों को बुला लेंगे।)कल्ला, ला तुतिअ्हु वस्जुद वक़-तरिब। (सज्दा)
(हरगिज़ नहीं! उसकी बात न मानो, और सज्दा करो और (अपने रब का) कुर्ब (निकटता) हासिल करो।)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. अलक़ (Alaq) का क्या मतलब है?
“अलक़” का मतलब है “जमा हुआ खून” या “खून का लोथड़ा”। यह इंसान की पैदाइश के शुरुआती मरहले की तरफ इशारा है।
Q. यह सूरह कब और कहाँ नाज़िल हुई?
इसकी पहली 5 आयतें मक्का में गार-ए-हिरा (गुफा) में नाज़िल हुईं और यह कुरान की सबसे पहली वही है।
Q. इस सूरह में सज्दा क्यों है?
इसकी आखिरी आयत में अल्लाह ने अपने नबी (ﷺ) को हुक्म दिया कि वो काफिरों की बात न मानें, बल्कि अल्लाह को सज्दा करें और उसका कुर्ब हासिल करें। इसी हुक्म की वजह से इस आयत पर सज्दा-ए-तिलावत वाजिब है।
नतीजा (Conclusion)
सूरह अलक़ हमें इल्म की अहमियत, इंसान की हकीकत और अल्लाह के सामने झुकने का दर्स देती है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी असलियत कुछ नहीं, अल्लाह ने ही हमें इल्म देकर इज़्ज़त बख्शी है, इसलिए हमें तकब्बुर (घमंड) नहीं करना चाहिए।
अल्लाह हमें इल्म हासिल करने और उस पर अमल करने की तौफीक दे। आमीन।





