Roza Makrooh Hone Ki Wajah: ऐसे रोज़ेदार जिनको कोई सवाब नहीं मिलेगा
Roza Makrooh Hone Ki Wajah: क्या आप जानते हैं कि कुछ गलतियों की वजह से रोज़े का सवाब खत्म हो जाता है? जानिए वो कौन से काम हैं जिनसे रोज़ा मकरूह हो जाता है।

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रमज़ान (Ramzan) में हम सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहते हैं, लेकिन कभी-कभी हमारी छोटी-छोटी गलतियों की वजह से हमें इस भूख-प्यास का कोई सवाब नहीं मिलता।
नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “बहुत से रोज़ेदार ऐसे हैं जिन्हें उनके रोज़े से भूख और प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं होता।” (इब्ने माजा)
आज हम जानेंगे कि Roza Makrooh Hone Ki Wajah (रोज़ा मकरूह होने की वजहें) क्या हैं और वो कौन से काम हैं जो रोज़े के सवाब को बर्बाद कर देते हैं।
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रोज़ा मकरूह होने की वजहें (Reasons for Fasting Becoming Makrooh)
मकरूह का मतलब है “नापसंदीदा”। इन कामों से रोज़ा टूटता तो नहीं, लेकिन उसकी रूहानी ताकत खत्म हो जाती है और सवाब कम हो जाता है।
- बिला वजह चखना: बिना ज़रूरत किसी चीज़ को चखना या चबाना। (हाँ, अगर औरत को शौहर के गुस्से का डर हो तो वह सालन का नमक चखकर थूक सकती है)।
- टूथपेस्ट या मंजन: रोज़े की हालत में टूथपेस्ट या मंजन का इस्तेमाल करना मकरूह है। अगर हलक में चला गया तो रोज़ा टूट जाएगा। बेहतर है कि मिस्वाक करें।
- थूक जमा करना: मुँह में थूक जमा करके निगलना।
- कमज़ोरी का डर: ऐसा काम करना जिससे इतनी कमज़ोरी हो जाए कि रोज़ा तोड़ने का डर हो (जैसे बहुत ज़्यादा खून देना)।
- गंदी बातें: लड़ाई-झगड़ा करना या गाली-गलौज करना।
- वज़ू में ज़्यादाती: वज़ू करते वक़्त कुल्ली करने या नाक में पानी डालने में बहुत ज़्यादाती (Mubalagha) करना मकरूह है, क्योंकि पानी हलक में जाने का डर होता है।
- शौहर-बीवी का प्यार: अगर खुद पर काबू न हो, तो शौहर-बीवी का एक-दूसरे को चूमना या गले लगाना मकरूह है।
वो गुनाह जो रोज़े का सवाब खत्म कर देते हैं
कुछ गुनाह ऐसे हैं जो रोज़े की हालत में करना बहुत सख्त मना है। इनसे रोज़ा सिर्फ एक “फाका” (Starvation) बनकर रह जाता है।
1. झूठ बोलना (Lying)
हदीस में है: “जो शख्स (रोज़े में) झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़े, तो अल्लाह को कोई ज़रूरत नहीं कि वह अपना खाना-पीना छोड़े।” (बुखारी)
2. गीबत या चुगली (Backbiting)
किसी की पीठ पीछे बुराई करना (गीबत) मुर्दा भाई का गोश्त खाने के बराबर है। यह नेकियों को ऐसे खा जाती है जैसे आग लकड़ी को।
3. हराम काम (Haram Acts)
रोज़े की हालत में फिल्में देखना, गाने सुनना, या बदनज़री करना। आँख, कान और जुबान का भी रोज़ा होता है।
4. हराम कमाई (Haram Income)
सहरी और इफ्तार हराम कमाई (सूद, रिश्वत, चोरी) से करना। हराम लुक़मे से की गई इबादत कुबूल नहीं होती।
क्या ये काम मकरूह हैं? (Common Myths)
अक्सर लोगों को गलतफहमी होती है कि कुछ जायज़ कामों से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है, जबकि ऐसा नहीं है:
- तेल लगाना: सर या दाढ़ी में तेल लगाने से रोज़ा मकरूह नहीं होता।
- बाल या नाखून काटना: रोज़े की हालत में बाल या नाखून काटने में कोई हर्ज नहीं है।
- ठंडक के लिए नहाना: अगर गर्मी ज़्यादा हो, तो ठंडक हासिल करने के लिए नहाना या गीला कपड़ा सर पर रखना मकरूह नहीं है।
- सुरमा लगाना: आँखों में सुरमा लगाने से रोज़ा मकरूह नहीं होता।
रोज़े की रूह को ज़िंदा रखें (Keep the Spirit of Fasting Alive)
रोज़े का असल मकसद सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि तक़वा (परहेज़गारी) हासिल करना है। कुछ काम ऐसे हैं जो रोज़े को तोड़ते या मकरूह तो नहीं करते, लेकिन उसकी रूह को खत्म कर देते हैं:
- दिन भर सोना: बहुत से लोग रोज़े की मशक्कत से बचने के लिए दिन का ज़्यादातर हिस्सा सो कर गुज़ार देते हैं। यह रोज़े के मकसद के खिलाफ है। रोज़ा हमें भूख का एहसास दिलाने और इबादत में ज़्यादा वक़्त गुज़ारने के लिए है, सोने के लिए नहीं।
- गुस्सा करना: रोज़ा सब्र की ट्रेनिंग है। अगर कोई आपसे लड़े या बुरा-भला कहे, तो उससे उलझने के बजाय हदीस पर अमल करें और कहें: “मैं रोज़े से हूँ।”
- इफ्तार पर इसराफ (Extravagance): इफ्तार के दस्तरखान पर ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें बनाना और फिर उन्हें फेंक देना, अल्लाह की नेमत की ना-शुक्री और गुनाह है।
- वक़्त की बर्बादी: रमज़ान का कीमती वक़्त टीवी, फिल्मों, गानों और सोशल मीडिया पर बर्बाद करना बहुत बड़ी महरूमी है। यह वक़्त कुरान, ज़िक्र और दुआ का है।
याद रखें, रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं, बल्कि आँखों (बुरे देखने से), कानों (बुरा सुनने से), और ज़बान (बुरा बोलने से) का भी होता है।
रोज़े की हिफाज़त कैसे करें? (How to Protect Your Fast)
सिर्फ भूखा रहने से रोज़ा मुकम्मल नहीं होता। अपने रोज़े को मकरूह होने और सवाब कम होने से बचाने के लिए इन बातों का ख्याल रखें:
- ज़बान की हिफाज़त: कम बोलें और सोच-समझ कर बोलें। झूठ, गीबत और गाली-गलौज से रोज़े का नूर खत्म हो जाता है।
- निगाह की हिफाज़त: बद-नज़री से बचें। मोबाइल या सोशल मीडिया इस्तेमाल करते वक़्त अगर कोई ना-महराम या बेहयाई सामने आए, तो फौरन नज़र हटा लें।
- कान की हिफाज़त: गाने-बाजे और किसी की बुराई सुनने से बचें।
- बुरी संगत से दूरी: ऐसे दोस्तों या महफिल से दूर रहें जहाँ अल्लाह की नाफरमानी या दूसरों की बुराई हो रही हो।
- इफ्तार में एहतियात: हराम कमाई के खाने से रोज़ा खोलना तो दूर, दुआ भी कुबूल नहीं होती। इसलिए रिज़्क़-ए-हलाल का एहतमाम करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या खुशबू लगाने से रोज़ा मकरूह होता है?
नहीं, रोज़े की हालत में खुशबू या इत्र लगाना जायज़ है, इससे रोज़ा मकरूह नहीं होता।
Q. क्या मिस्वाक करने से रोज़ा मकरूह होता है?
नहीं, मिस्वाक करना सुन्नत है और इससे रोज़ा मकरूह नहीं होता, बल्कि यह रोज़ेदार के मुँह की सफाई के लिए बेहतरीन है।
Q. अगर कोई गाली दे तो क्या करें?
हदीस में है कि अगर कोई रोज़ेदार से लड़े या गाली दे, तो वह कह दे: “मैं रोज़े से हूँ” (Inni Saa’imun)।
नतीजा (Conclusion)
रोज़े का असल मकसद तक़वा (परहेज़गारी) है। हमें चाहिए कि हम सिर्फ पेट का रोज़ा न रखें, बल्कि अपनी आँखों, कानों और जुबान को भी गुनाहों से बचाएं, ताकि हमें रोज़े का पूरा सवाब मिल सके।
अल्लाह हमें सही तरीके से रोज़ा रखने की तौफीक दे।





