Eid-ul-Adha (Bakra Eid): Qurbani Ka Tarika, Dua aur Masail
Eid-ul-Adha (Bakra Eid) क्यों मनाई जाती है? जानिए कुर्बानी का इतिहास, तरीका, दुआ और ज़रूरी मसाइल आसान हिंदी में।

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ईद-उल-अज़हा (Eid-ul-Adha), जिसे हम आम जुबान में बकरा ईद (Bakra Eid) कहते हैं, इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार बलिदान (Sacrifice), त्याग और अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने का पैगाम देता है।
अक्सर लोग साल भर बाद कुर्बानी करते हैं तो Qurbani Ka Tarika और Qurbani Ki Dua भूल जाते हैं। साथ ही कई लोगों के मन में सवाल होता है कि Bakra Eid Kyu Manate Hai?
इस आर्टिकल में हम बकरा ईद का इतिहास, कुर्बानी का सही तरीका, दुआ और इससे जुड़े ज़रूरी मसाइल तफसील से जानेंगे।
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बकरा ईद क्यों मनाते हैं? (History of Eid-ul-Adha)
बकरा ईद हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हज़रत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) की याद में मनाई जाती है।
अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहिम (अ.स.) को ख्वाब में हुक्म दिया कि वो अपनी सबसे प्यारी चीज़ अल्लाह की राह में कुर्बान करें। हज़रत इब्राहिम (अ.स.) के लिए बुढ़ापे में मिले बेटे हज़रत इस्माइल (अ.स.) से बढ़कर प्यारा कोई नहीं था।
अल्लाह के हुक्म पर अमल करते हुए, उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का फैसला किया। जब वो बेटे को ज़िबह करने लगे, तो अल्लाह ने उनकी वफादारी और जज़्बे को कुबूल फरमाया और हज़रत जिब्रईल (अ.स.) के ज़रिए जन्नत से एक मेंढा (दुंबा) भेज दिया, जो हज़रत इस्माइल (अ.स.) की जगह ज़िबह हो गया।
अल्लाह को हज़रत इब्राहिम (अ.स.) की यह अदा इतनी पसंद आई कि कयामत तक के लिए साहिब-ए-हैसियत मुसलमानों पर कुर्बानी वाजिब कर दी गई।
कुर्बानी किस पर वाजिब है? (Who must perform Qurbani?)
कुर्बानी हर उस मुसलमान (मर्द और औरत) पर वाजिब है जो:
- बालिग (Adult) हो।
- आकिल (समझदार) हो।
- मुकीम हो (सफर में न हो)।
- साहिब-ए-निसाब हो (यानी उसके पास ज़रुरत से ज़्यादा इतना माल या सोना-चांदी हो जिस पर ज़कात वाजिब होती है, या उसके बराबर कीमत हो)।
नोट: कुर्बानी के लिए माल पर साल गुज़रना शर्त नहीं है। अगर कुर्बानी के दिनों में भी कोई साहिब-ए-निसाब बन जाए, तो उस पर कुर्बानी वाजिब है।
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कुर्बानी के जानवर के मसाइल
कुर्बानी के जानवर का सेहतमंद और बे-ऐब होना ज़रूरी है।
- बकरा/बकरी/भेड़/दुंबा: कम से कम 1 साल का हो। (अगर 6 महीने का दुंबा इतना मोटा-ताज़ा हो कि 1 साल का लगे, तो जायज़ है)।
- गाय/बैल/भैंस: कम से कम 2 साल के हों।
- ऊंट: कम से कम 5 साल का हो।
ऐब: जानवर अंधा, काना, लंगड़ा (जो खुद चलकर ज़िबह की जगह तक न जा सके), या बहुत ज़्यादा कमज़ोर नहीं होना चाहिए। कान या पूंछ एक तिहाई (1/3) से ज़्यादा कटी न हो।
कुर्बानी कब करें? (Days of Qurbani)
कुर्बानी के तीन दिन हैं:
- 10 ज़िलहिज्जा: ईद की नमाज़ के बाद। (यह सबसे अफ़ज़ल दिन है)।
- 11 ज़िलहिज्जा
- 12 ज़िलहिज्जा: सूरज डूबने (Maghrib) से पहले तक।
शहरों में ईद की नमाज़ के बाद ही कुर्बानी जायज़ है। देहात (जहाँ ईद की नमाज़ नहीं होती) में फज्र के बाद भी कुर्बानी की जा सकती है।
Qurbani Ka Tarika (कुर्बानी करने का तरीका)
- जानवर को चारा-पानी दें और नरमी के साथ ज़िबह की जगह ले जाएं।
- जानवर को बाएं पहलू (Left Side) पर इस तरह लिटाएं कि उसका मुँह किबला (काबा) की तरफ हो।
- अपना दाहिना पैर जानवर की गर्दन के पास पहलू पर रखें।
- छुरी को पहले से तेज़ कर लें (जानवर के सामने छुरी तेज़ न करें)।
- दुआ पढ़ें और “बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर” कहकर तेज़ छुरी से ज़िबह करें।
- चार रगों (सांस की नली, खाने की नली, और दो खून की रगें) में से कम से कम तीन का कटना ज़रूरी है।
- जानवर के ठंडा होने (तड़पना बंद होने) तक इंतज़ार करें, फिर खाल उतारें।
Qurbani Ki Dua (कुर्बानी की दुआ)
जानवर को लिटाने के बाद ज़िबह करने से पहले यह दुआ पढ़ें:
दुआ (अरबी): “इन्नी वज्जहतु वज्हि-य लिल्लज़ी फ़-त-रस्समावाति वल अर-ज़ हनीफ़ंव व मा अना मिनल मुश्रिकीन। इन्ना सलाती व नुसुकी व महया-य व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आ ल मी न। ला शरी-क लहू व बि ज़ालि-क उमिर्तु व अना मिनल मुस्लिमीन। अल्लाहुम-म मिन-क व ल-क।”
तर्जुमा: “मैंने अपना रुख उस ज़ात की तरफ किया जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, एक तरफ होकर, और मैं मुशरिकों में से नहीं हूँ। बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है जो तमाम जहानों का रब है। उसका कोई शरीक नहीं, मुझे इसी का हुक्म मिला है और मैं फरमाबरदारों में से हूँ। ऐ अल्लाह! यह (कुर्बानी) तेरी ही तरफ से है और तेरे ही लिए है।”
ज़िबह करते वक़्त कहें: “बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर”
ज़िबह के बाद की दुआ: “अल्लाहुम्म तक़ब्बल मिन्नी कमा तक़ब्बल्त मिन् ख़लीलिक इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम व हबीबिक मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम”
(अगर दूसरे की तरफ से कर रहे हैं तो ‘मिन्नी’ की जगह ‘मिन [उसका नाम]’ कहें)
कुर्बानी के गोश्त का बंटवारा
मुस्तहब (बेहतर) यह है कि कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किए जाएं:
- एक हिस्सा गरीबों और मिस्कीनों के लिए।
- एक हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए।
- एक हिस्सा अपने घर के लिए।
आप चाहें तो सारा गोश्त खुद भी रख सकते हैं या सारा सदका भी कर सकते हैं, लेकिन बांटना अफ़ज़ल है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या एक जानवर में कई लोग हिस्सा ले सकते हैं?
बकरे/दुंबे में सिर्फ एक आदमी की कुर्बानी हो सकती है। बड़े जानवर (गाय, भैंस, ऊंट) में 7 लोग हिस्सा ले सकते हैं, बशर्ते सबकी नियत कुर्बानी या अकीके की हो।
Q. क्या कर्ज़ लेकर कुर्बानी कर सकते हैं?
अगर आप पर कुर्बानी वाजिब नहीं है, तो कर्ज़ लेकर करना ज़रूरी नहीं। लेकिन अगर आप साहिब-ए-निसाब हैं और नकद पैसे नहीं हैं, तो कर्ज़ लेकर कुर्बानी करनी होगी (अगर कर्ज़ उतारने की उम्मीद हो)।
Q. क्या मरे हुए लोगों के नाम पर कुर्बानी कर सकते हैं?
जी हाँ, सवाब पहुंचाने (ईसाल-ए-सवाब) की नियत से मरे हुए लोगों की तरफ से कुर्बानी करना बहुत अच्छा अमल है।
Q. क्या कुर्बानी का गोश्त गैर-मुस्लिम को दे सकते हैं?
जी हाँ, कुर्बानी का गोश्त गैर-मुस्लिम पड़ोसियों या ज़रूरतमंदों को देना जायज़ है।
नतीजा (Conclusion)
बकरा ईद सिर्फ गोश्त खाने का त्यौहार नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म पर अपना सब कुछ कुर्बान करने के जज़्बे का नाम है। हमें चाहिए कि हम कुर्बानी के मसाइल का ख्याल रखें, दिखावे से बचें और गरीबों को अपनी खुशियों में शामिल करें।
अल्लाह हमारी और आपकी कुर्बानी को कुबूल फरमाए। आमीन।





