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Qaza Namaz Ka Tarika: छूटी हुई नमाज़ें कैसे अदा करें?
Qaza Namaz Ka Tarika: क्या आपकी बहुत सी नमाज़ें छूट गई हैं? जानिए कज़ा-ए-उमरी (Qaza e Umri) पढ़ने का आसान तरीका, नियत और हिसाब लगाने का तरीका।

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इंसान कमज़ोर है, कभी गफलत में या कभी मजबूरी में नमाज़ें छूट जाती हैं। लेकिन एक मोमिन को चाहिए कि वह अपनी छूटी हुई नमाज़ों (Qaza Namaz) की फ़िक्र करे। कयामत के दिन सबसे पहला सवाल नमाज़ का ही होगा।
इस आर्टिकल में हम Qaza Namaz Ka Tarika और कज़ा-ए-उमरी (जिंदगी भर की छूटी नमाज़ें) अदा करने का तरीका जानेंगे।
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कज़ा नमाज़ किसकी होती है?
सिर्फ फ़र्ज़ और वित्र (ईशा के) की कज़ा पढ़नी होती है। सुन्नत और नफ़िल की कोई कज़ा नहीं होती। यानी एक दिन में कुल 20 रकात कज़ा बनती हैं:
- फज्र: 2 फ़र्ज़
- ज़ुहर: 4 फ़र्ज़
- असर: 4 फ़र्ज़
- मगरिब: 3 फ़र्ज़
- ईशा: 4 फ़र्ज़ + 3 वित्र
Qaza Namaz Ka Tarika (तरीका और नियत)
कज़ा नमाज़ पढ़ने का तरीका वही है जो अदा नमाज़ का है। बस नियत में फर्क होगा।
नियत कैसे करें?
अगर आपको याद है कि कौन से दिन की नमाज़ है (जैसे: कल की फज्र), तो वैसे नियत करें। लेकिन अगर बहुत सारी पुरानी नमाज़ें हैं (कज़ा-ए-उमरी), तो यह नियत करें: “मैं नियत करता हूँ अपनी जिंदगी की सबसे पहली (या आखिरी) छूटी हुई फज्र/ज़ुहर… की नमाज़ की।“
आसान तरीका (जल्दी पढ़ने के लिए)
अगर बहुत साल की नमाज़ें बाकी हैं, तो आप रकातों में थोड़ी आसानी कर सकते हैं ताकि जल्दी अदा हो जाएं:
- रुकू और सज्दे की तस्बीह: 3 बार की जगह सिर्फ 1 बार “सुब्हान रब्बी-अल अज़ीम/आला” कह सकते हैं।
- तीसरी/चौथी रकात: फ़र्ज़ नमाज़ की तीसरी और चौथी रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह मिलाना ज़रूरी नहीं होता, आप सिर्फ “सुब्हानअल्लाह” 3 बार कहकर रुकू में जा सकते हैं (या खामोश खड़े रह सकते हैं मिकदार पूरी होने तक, लेकिन सूरह फातिहा पढ़ लेना बेहतर है)।
- अत्तहियात के बाद: दरूद शरीफ और दुआ की जगह सिर्फ “अल्लाहुम्मा सल्ली अला मुहम्मद व आलिही” कहकर सलाम फेर सकते हैं।
- वित्र में: दुआ-ए-क़ुनूत याद न हो या जल्दी हो, तो 1 या 3 बार “रब्बना आतिना…” या “अल्लाहुम्मा-गफिर ली” पढ़ सकते हैं।
कज़ा-ए-उमरी का हिसाब कैसे लगाएं?
- बालिग होने की उम्र (लड़कों के लिए एह्तेलाम या 12-15 साल, लड़कियों के लिए हैज़ या 9-15 साल) से लेकर अब तक का हिसाब लगाएं।
- जितने साल नमाज़ नहीं पढ़ी, उसे दिनों में बदलें।
- एक चार्ट बनाएं और हर नमाज़ के बाद एक कज़ा नमाज़ पढ़ने का मामूल बना लें। (जैसे फज्र के साथ एक कज़ा फज्र, ज़ुहर के साथ एक कज़ा ज़ुहर)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या कज़ा नमाज़ जमात के साथ पढ़ सकते हैं?
हाँ, अगर इमाम और मुक्तदी दोनों एक ही वक़्त की कज़ा पढ़ रहे हों (जैसे दोनों की कल की फज्र छूटी हो)। लेकिन कज़ा-ए-उमरी आमतौर पर अकेले ही पढ़ी जाती है।
Q. क्या असर और मगरिब के बीच कज़ा पढ़ सकते हैं?
सूरज डूबने (Sunset) के वक़्त (मकरूह वक़्त) नमाज़ मना है। लेकिन असर की नमाज़ के बाद सूरज पीला पड़ने से पहले तक कज़ा पढ़ सकते हैं। इसी तरह फज्र के बाद सूरज निकलने तक न पढ़ें।
Q. क्या नफ़िल की जगह कज़ा पढ़ना बेहतर है?
जी हाँ, जिन पर बहुत सारी कज़ा नमाज़ें बाकी हैं, उनके लिए नफ़िल (जैसे इशराक, चाश्त, तहज्जुद) पढ़ने से ज़्यादा ज़रूरी और बेहतर यह है कि वो अपनी कज़ा नमाज़ें पूरी करें। फ़र्ज़ का दर्जा नफ़िल से बहुत ऊँचा है।
नतीजा:
अल्लाह गफूर-उर-रहीम है। सच्ची तौबा करें और आज ही से अपनी छूटी हुई नमाज़ें अदा करना शुरू करें। थोड़ी-थोड़ी करके पढ़ते रहें, इंशाअल्लाह बोझ हल्का हो जाएगा।
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