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Muharram Ki Fazilat: मुहर्रम की फजीलत और आशूरा का महत्व

Muharram Ki Fazilat: जानिए इस्लाम में मुहर्रम के महीने की क्या अहमियत है? आशूरा (10 मुहर्रम) का रोज़ा और कर्बला की शहादत का पैगाम।

Muharram Ki Fazilat: मुहर्रम की फजीलत और आशूरा का महत्व

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मुहर्रम (Muharram) इस्लामी कैलेंडर (हिजरी साल) का पहला महीना है। इस्लाम में इस महीने को बहुत ही मुकद्दस (Sacred) और एहतराम वाला माना गया है। कुरान मजीद में जिन चार महीनों को “हुरमत वाले” (आदरणीय) कहा गया है, उनमें से एक मुहर्रम भी है।

अक्सर लोग मुहर्रम को सिर्फ गम और मातम का महीना समझते हैं, जबकि इसकी फजीलत और तारीख (History) इससे कहीं ज्यादा है।

इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि Muharram Ki Fazilat क्या है, आशूरा (10 मुहर्रम) का क्या महत्व है और हमें इस महीने में क्या करना चाहिए।

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मुहर्रम: हुरमत वाला महीना

अल्लाह तआला कुरान में फरमाता है: “बेशक महीनों की गिनती अल्लाह के नज़दीक बारह है… उनमें से चार हुरमत (आदर) वाले हैं।” (सूरह तौबा: 36)

नबी करीम (ﷺ) ने बताया कि वो चार महीने ये हैं: ज़िल-कादा, ज़िल-हिज्जा, मुहर्रम और रजब। इस महीने को “शहरुल्लाह” (अल्लाह का महीना) भी कहा जाता है।

आशूरा (10 मुहर्रम) की फजीलत

मुहर्रम की 10 तारीख को “आशूरा” (Ashura) कहते हैं। यह दिन इस्लाम में बहुत अहमियत रखता है।

  1. मूसा (अ.स.) की जीत: इसी दिन अल्लाह ने हज़रत मूसा (अ.स.) और बनी इसराइल को फिरौन के जुल्म से नजात दी थी और फिरौन को दरिया में गर्क किया था।
  2. रोज़ा रखना: जब नबी (ﷺ) मदीना तशरीफ लाए, तो यहूदियों को इस दिन रोज़ा रखते देखा। आपने फरमाया कि हम मूसा (अ.स.) के ज्यादा करीब हैं। इसलिए आपने खुद भी रोज़ा रखा और सहाबा को भी हुक्म दिया।

हदीस में है: “मुझे अल्लाह से उम्मीद है कि आशूरा का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ्फारा बन जाएगा।” (सहीह मुस्लिम)

नोट: यहूदियों की मुखालिफत (Difference) करने के लिए 9 और 10 मुहर्रम या 10 और 11 मुहर्रम का रोज़ा रखना मुस्तहब है।

कर्बला का वाकया (Tragedy of Karbala)

मुहर्रम का ज़िक्र आते ही कर्बला (Karbala) की याद भी आती है। 61 हिजरी में 10 मुहर्रम के दिन ही नबी (ﷺ) के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) और उनके खानदान को कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया गया था।

यह इस्लाम की तारीख का एक दर्दनाक वाकया है। इमाम हुसैन (रज़ि.) ने बातिल (झूठ) के सामने झुकने के बजाय सर कटाना मंजूर किया। उन्होंने हमें सिखाया कि हक़ के लिए जान भी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए।

सबक: कर्बला हमें मातम नहीं, बल्कि सबर (Patience) और हक़ पर डटे रहने का पैगाम देता है।

मुहर्रम में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें:

  1. रोज़ा रखें: 9-10 या 10-11 मुहर्रम का रोज़ा रखें।
  2. तौबा और इस्तिगफार: कसरत से अल्लाह से माफी मांगें।
  3. घरवालों पर खर्च: हदीस में है कि जो आशूरा के दिन अपने घरवालों पर खाने-पीने में वुसअत (खुला खर्च) करेगा, अल्लाह साल भर उसके रिज़्क में बरकत देगा।
  4. ज़िक्र-ओ-इबादत: नफल नमाज़ और कुरान की तिलावत करें।

क्या न करें:

  1. बिदअत और खुराफात: ढोल बजाना, ताजिया निकालना या खुद को तकलीफ देना इस्लाम में जायज़ नहीं है।
  2. सिर्फ मातम: इस्लाम सबर सिखाता है, चीखना-चिल्लाना और कपड़े फाड़ना जाहिलियत के काम हैं।
  3. शादी-ब्याह से परहेज़: कुछ लोग मुहर्रम में शादी को मनहूस समझते हैं, यह गलत अकीदा है। इस्लाम में कोई दिन या महीना मनहूस नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क्या मुहर्रम में शादी करना मना है?
A.

नहीं, इस्लाम में मुहर्रम या किसी भी महीने में शादी करना मना नहीं है। यह महीना “हुरमत” वाला है, मनहूस नहीं।

Q. आशूरा का रोज़ा रखना फ़र्ज़ है या नफल?
A.

आशूरा का रोज़ा नफल (Optional) है, फ़र्ज़ नहीं। लेकिन इसका सवाब बहुत ज्यादा है (एक साल के गुनाह माफ)।

Q. क्या मुहर्रम सिर्फ शिया मुसलमानों के लिए है?
A.

नहीं, मुहर्रम और इमाम हुसैन (रज़ि.) की मोहब्बत हर मुसलमान के ईमान का हिस्सा है। यह महीना पूरी उम्मत के लिए मुकद्दस है।


नतीजा (Conclusion)

मुहर्रम हमें नए इस्लामी साल की शुरुआत अल्लाह की इबादत से करने का पैगाम देता है। हमें चाहिए कि हम इस महीने की हुरमत का ख्याल रखें, आशूरा का रोज़ा रखें और इमाम हुसैन (रज़ि.) की कुर्बानी से हक़ पर चलने का सबक लें।

अल्लाह हमें सुन्नत के मुताबिक ज़िंदगी गुज़ारने की तौफीक दे। आमीन।

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