Beta Aur Beti Me Fark: बेटा-बेटी में भेदभाव और इस्लाम की तालीम
Beta Aur Beti Me Fark: आज भी समाज में बेटा और बेटी में फर्क किया जाता है। जानिए इस भेदभाव के नुकसान, इस्लाम में बेटियों का मकाम और एक समान परवरिश की अहमियत।

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कहने को तो हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन आज भी हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई “Beta Aur Beti Me Fark” (बेटा और बेटी में भेदभाव) है। लोग बेटे को “कुल का चिराग” और बेटी को “पराया धन” समझते हैं।
हालांकि, इस्लाम और इंसानियत दोनों ही इस भेदभाव के सख्त खिलाफ हैं। औलाद चाहे बेटा हो या बेटी, दोनों अल्लाह की नेमत हैं।
इस आर्टिकल में हम समाज में फैले इस भेदभाव, इसके नुकसान और इस्लाम में बेटियों के मकाम के बारे में जानेंगे।
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समाज में भेदभाव के रूप (Forms of Discrimination)
हमारे आस-पास आज भी कई तरीकों से बेटा और बेटी में फर्क किया जाता है:
- शिक्षा (Education): बेटे की पढ़ाई पर लाखों खर्च किए जाते हैं, लेकिन बेटी की पढ़ाई को “पैसे की बर्बादी” समझा जाता है क्योंकि “उसे तो दूसरे घर जाना है”।
- आज़ादी (Freedom): बेटे को हर तरह की आज़ादी होती है, जबकि बेटी पर बचपन से ही पाबंदियां लगा दी जाती हैं।
- खान-पान: कई गरीब परिवारों में अच्छे खाने का पहला हक़ बेटे का समझा जाता है, और बेटी को बचा-खुचा मिलता है।
- पैदाइश पर खुशी: बेटे की पैदाइश पर जश्न मनाया जाता है, मिठाइयां बंटती हैं, जबकि बेटी की पैदाइश पर घर में मातम जैसा माहौल हो जाता है।
इस्लाम में बेटियों का मकाम (Status of Daughters in Islam)
इस्लाम ने बेटियों को वो इज़्ज़त दी है जो किसी और मज़हब ने नहीं दी।
- जन्नत की बशारत: नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जिस शख्स ने दो बेटियों की परवरिश की, उन्हें अच्छी तालीम दी और उनका निकाह कराया, वो कयामत के दिन मेरे साथ ऐसे होगा जैसे ये दो उंगलियां।” (सहीह मुस्लिम)
- रहमत: हदीस में बेटियों को “रहमत” कहा गया है। जब बेटी पैदा होती है तो अल्लाह फरिश्तों को भेजता है जो कहते हैं “ऐ घर वालों! तुम पर सलामती हो”।
- बराबरी: इस्लाम ने परवरिश, प्यार और तोहफे देने में बेटा और बेटी के बीच बराबरी का हुक्म दिया है।
बेटा और बेटी एक समान (Equality)
अक्सर देखा गया है कि बुढ़ापे में वही बेटियां माँ-बाप का सहारा बनती हैं जिन्हें बचपन में बोझ समझा गया था।
एक सच्ची हकीकत: बेटे अक्सर शादी के बाद अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं, लेकिन बेटियां चाहे कितनी भी दूर चली जाएं, उनके दिल में माँ-बाप की फिक्र हमेशा रहती है। इसलिए कहा जाता है: “बेटा तब तक बेटा है जब तक उसे बीवी नहीं मिलती, लेकिन बेटी ता-उम्र बेटी रहती है।“
बेटियों की शिक्षा और तरबियत (Education and Upbringing)
इस्लाम में इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है। एक शिक्षित बेटी न सिर्फ अपना घर संवारती है, बल्कि आने वाली नस्लों की भी बेहतरीन तरबियत करती है। आज की बेटियां डॉक्टर, इंजीनियर और टीचर बनकर समाज की सेवा कर रही हैं। उन्हें कमज़ोर समझना हमारी भूल है।
दहेज: एक सामाजिक लानत
बेटियों को बोझ समझने की एक बड़ी वजह “दहेज” (Dowry) है। लोग सोचते हैं कि बेटी की शादी में बहुत खर्च होगा। जबकि इस्लाम में शादी को बहुत आसान बनाया गया है। दहेज मांगना और देना दोनों ही गलत रस्में हैं जिन्होंने समाज को खोखला कर दिया है।
समाज की सोच बदलने की ज़रूरत
हमें यह समझना होगा कि Beta Aur Beti Me Fark करना न सिर्फ एक सामाजिक बुराई है, बल्कि अल्लाह की नाफरमानी भी है।
- भ्रूण हत्या (Female Foeticide): बेटी को पैदा होने से पहले ही मार देना सबसे बड़ा गुनाह है।
- दहेज (Dowry): दहेज के डर से बेटियों को बोझ समझना गलत है। इस्लाम में दहेज हराम है।
हमें अपनी बेटियों को भी बेटों की तरह अच्छी तालीम देनी चाहिए ताकि वो एक जिम्मेदार नागरिक और बेहतरीन माँ बन सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या इस्लाम में बेटे को बेटी पर फजीलत हासिल है?
नहीं, अल्लाह के नज़दीक फजीलत का मयार (Standard) “तक़्वा” (परहेजगारी) है, न कि जेंडर। बेटा और बेटी दोनों अल्लाह की नेमतें हैं।
Q. अगर किसी के सिर्फ बेटियां हों तो?
यह बहुत बड़ी खुशकिस्मती है। हदीस के मुताबिक, जो अपनी बेटियों पर सब्र करे और उनकी अच्छी परवरिश करे, वो बेटियां उसके लिए जहन्नम की आग से आड़ बन जाएंगी।
Q. क्या विरासत में बेटी का हिस्सा नहीं होता?
इस्लाम ने 1400 साल पहले ही बेटी को विरासत (Property) में हक़ दिया है। माँ-बाप की जायदाद में बेटी का भी हिस्सा होता है।
Q. क्या बुढ़ापे में माँ-बाप की सेवा सिर्फ बेटे की ज़िम्मेदारी है?
नहीं, माँ-बाप की सेवा करना बेटा और बेटी दोनों का फ़र्ज़ है। अक्सर देखा गया है कि बेटियां शादी के बाद भी अपने वालिदैन का खूब ख्याल रखती हैं।
Q. क्या इस्लाम में बेटी को अपनी पसंद से शादी करने का हक़ है?
जी हाँ, इस्लाम ने बालिग लड़की को अपनी पसंद से निकाह करने या रिश्ते के लिए रज़ामंदी देने का पूरा हक़ दिया है। ज़बरदस्ती निकाह जायज़ नहीं है।
नतीजा (Conclusion)
बेटा और बेटी एक ही बाग़ के दो फूल हैं। दोनों को बराबर पानी और धूप (प्यार और तालीम) की ज़रूरत है। जब हम यह फर्क मिटा देंगे, तभी हमारा समाज और देश तरक्की करेगा।
अल्लाह हमें अपनी औलाद (चाहे बेटा हो या बेटी) के साथ इन्साफ करने की तौफीक दे। आमीन।




