Aulad Me Nainsafi: औलाद के बीच नाइंसाफी और विरासत का हक़
माँ-बाप अक्सर अपनी औलाद के बीच नाइंसाफी करते हैं, खासकर चापलूसी पसंद करने और विरासत न बांटने के मामले में। जानिए इस्लाम इस बारे में क्या कहता है।

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इस्लाम में अदल और इंसाफ (Justice) को बहुत ऊँचा मकाम दिया गया है। एक मुसलमान के लिए सिर्फ नमाज़-रोज़ा ही काफी नहीं, बल्कि उसे अपने रिश्तों में भी इंसाफ करना ज़रूरी है। अक्सर देखा गया है कि माँ-बाप अनजाने में या किसी दबाव में अपनी ही औलाद के बीच नाइंसाफी कर बैठते हैं। यह नाइंसाफी न सिर्फ घर का सुकून बर्बाद करती है, बल्कि आखिरत में भी सख्त जवाबदेही का सबब बनती है।
इस आर्टिकल में हम उन आम गलतियों और मसलों पर बात करेंगे जो माँ-बाप अक्सर अपनी औलाद के साथ करते हैं।
1. माँ-बाप की ज़िंदगी में माल की तक़सीम (Gifts/Hiba)
अक्सर माँ-बाप अपनी ज़िंदगी में ही अपनी जायदाद या दौलत किसी एक बच्चे के नाम कर देते हैं और दूसरे को महरूम कर देते हैं। कभी-कभी लाड़-प्यार में या किसी एक बच्चे की खिदमत से खुश होकर उसे सब कुछ दे दिया जाता है।
इस्लामी सबक: नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “अल्लाह से डरो और अपनी औलाद के दरमियान इंसाफ करो।” (सहीह बुखारी)
हज़रत नुमान बिन बशीर (रज़ि.) का वाकया इस बारे में मशहूर है कि जब उनके वालिद ने उन्हें एक खास तोहफा दिया और आप (ﷺ) को गवाह बनाना चाहा, तो आपने पूछा: “क्या तुमने अपनी सब औलाद को ऐसा ही दिया है?” इनकार करने पर आपने गवाह बनने से मना कर दिया और इसे ‘जुल्म’ करार दिया।
ज़िंदगी में बच्चों को कुछ देना ‘हिबा’ (Gift) कहलाता है और इसमें बराबरी सुन्नत है। किसी एक को सब देकर दूसरों को भूखा छोड़ना सख्त गुनाह है।
2. बेटियों का हिस्सा मार देना
हमारे समाज की एक सबसे बड़ी और कड़वी सच्चाई यह है कि बेटियों को विरासत (Inheritance) में हिस्सा नहीं दिया जाता। माँ-बाप और भाई यह दलील देते हैं कि “हमने इसकी शादी में बहुत खर्च किया है” या “दहेज दे तो दिया है”।
याद रखें, शादी पर किया गया खर्च या दहेज कभी भी विरासत का बदल नहीं हो सकता। विरासत अल्लाह का तय किया हुआ कानून है। बेटियों और बहनों को उनका हक़ न देना अल्लाह की हदों को तोड़ना है। विरासत के इस्लामी नियम विस्तार से यहाँ पढ़ें।
3. वालिद के इंतकाल के बाद विरासत रोकने का मसला
अक्सर वालिद (पिता) के इंतकाल के बाद माँ या घर के बड़े सदस्य यह कहकर विरासत तक़सीम नहीं होने देते कि “अभी तो मैं ज़िंदा हूँ” या “घर के टुकड़े नहीं होने चाहिए”।
हकीकत क्या है? जैसे ही किसी शख्स का इंतकाल होता है, उसका माल और जायदाद फौरन उसके वारिसों (बीवी, बच्चों, माँ-बाप) की मिल्कियत हो जाती है। इसे रोकना या किसी वारिस को उसके हिस्से के इस्तेमाल से मना करना ‘ग़सब’ (ज़बरदस्ती कब्ज़ा) के दायरे में आता है। माँ का यह कहना कि “मेरे बाद बांटना” शरीयत के खिलाफ है, क्योंकि हर वारिस को अपना हक़ मांगने का पूरा इख्तियार है।
4. खिदमत करने वाले और न करने वाले का बहाना
कभी-कभी माँ-बाप कहते हैं कि “फलां बेटा मेरी खिदमत करता है, इसलिए उसे ज्यादा दूंगा” और “बेटी तो अपने घर चली गई, उसे क्या ज़रूरत”।
यह सोच गलत है। खिदमत औलाद का फ़र्ज़ है जिसके लिए अल्लाह उन्हें अज्र देगा, लेकिन इसके बदले माँ-बाप को शरीयत के कानून बदलने का हक़ नहीं है। अल्लाह ने हर वारिस का हिस्सा खुद तय किया है क्योंकि वह जानता है कि कौन किसके लिए कितना फायदेमंद है। हलाल और हराम कमाई के बारे में भी गौर करें।
5. जज़्बाती नाइंसाफी (Emotional Injustice)
नाइंसाफी सिर्फ माल में नहीं होती, बल्कि प्यार और तवज्जो (Attention) में भी होती है। किसी एक बच्चे को हमेशा तरजीह देना और दूसरे को नीचा दिखाना उनके दिलों में नफरत पैदा करता है। यही नफरत आगे चलकर भाई-बहनों के बीच झगड़े और ताल्लुकात टूटने की वजह बनती है। बच्चों की सही तरबियत के बारे में यहाँ पढ़ें।
6. “मेरी जायदाद, मेरी मर्ज़ी” – एक गलत अक़ीदा
अक्सर वालिद (पिता) यह सोचते हैं कि “यह प्रॉपर्टी मैंने खून-पसीने से कमाई है, इसलिए मैं जिसे चाहूँ दूँ और जिसे चाहूँ न दूँ, कोई मुझे रोकने वाला नहीं है।”
हकीकत क्या है? बेशक माल आपका है, लेकिन आप इसके ‘मालिक’ नहीं बल्कि ‘अमीन’ (Trustee) हैं। अल्लाह ने आपको माल एक इम्तिहान के तौर पर दिया है। अपनी मर्ज़ी चलाकर किसी एक वारिस को महरूम करना अल्लाह के कानून को चुनौती देने जैसा है। आप अपनी ज़िंदगी में तोहफा दे सकते हैं, लेकिन उसका मकसद किसी दूसरे बच्चे को नीचा दिखाना या उसका हक़ मारना नहीं होना चाहिए।
7. चापलूसी पसंद करना और हक़ कहने वालों से बदला लेना
यह एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक मसला है। जो बच्चे वालिदैन की हाँ में हाँ मिलाते हैं या चापलूसी (Flattery) करते हैं, वालिदैन अक्सर उन पर फिदा रहते हैं और उन्हें सब कुछ दे देते हैं। इसके उलट, जो बच्चा शरीयत की बात करता है या अपना हक़ मांगता है, उसे “गुस्ताख” समझकर उससे बदला लिया जाता है या उसे जायदाद से बेदखल कर दिया जाता है।
इस्लामी सबक: अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने हमेशा हक़ बात कहने की ताकीद की है। वालिदैन को चाहिए कि वो चापलूसी और सच्चाई के बीच फर्क करें। चापलूसी करने वाला बच्चा अक्सर लालची होता है, जबकि हक़ की बात करने वाला असल में वालिद को गुनाह से बचाना चाहता है।
8. अपने आप को “हद से ज़्यादा समझदार” मानना
कभी-कभी माँ-बाप बुज़ुर्गी के घमंड में यह समझने लगते हैं कि वो जो भी फैसला कर रहे हैं, वही सही है। वो बच्चों की जायज़ ज़रूरतों और उनके मशवरों को ठुकरा देते हैं। “हमने दुनिया देखी है” का जुमला बोलकर वो अक्सर नाइंसाफी को सही ठहराने की कोशिश करते हैं।
हकीकत: समझदारी उम्र में नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म को मानने में है। अगर आपका फैसला कुरान और सुन्नत के खिलाफ है, तो वह ‘समझदारी’ नहीं बल्कि ‘नादानी’ है। वालिदैन को चाहिए कि अपनी अना (Ego) को छोड़कर बच्चों के साथ मशवरा करें।
9. नाइंसाफी से हासिल क्या? – सिर्फ नुकसान और पछतावा
वालिदैन को ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि नाइंसाफी करने से उन्हें आखिर क्या हासिल होगा? हकीकत तो यह है कि इससे न दुनिया संवरती है और न आख़िरत।
- ज़हनी सुकून की तबाही: जब आप अपनी ही औलाद के बीच फर्क करते हैं, तो घर में आपसी नफरत और लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं। जिस घर में आप चैन से बुढ़ापा गुज़ारना चाहते थे, वहां कलह और शोर-शराबा शुरू हो जाता है। नाइंसाफी की वजह से औलाद के बीच पैदा होने वाली यह जंग वालिदैन का अपना ज़हनी सुकून भी छीन लेती है।
- न दुनिया का फायदा, न आख़िरत का: किसी एक बच्चे को सब कुछ दे देने से न तो उसकी तकदीर बदल जाएगी और न ही आपका रुतबा बढ़ेगा। बल्कि आप मुफ्त में गुनाह का बोझ अपने सिर पर ले लेते हैं। दुनिया में बे-बरकती और आख़िरत में सख्त पकड़ के सिवा कुछ हाथ नहीं आता।
- बेफायदा काम क्यों? जब इस अमल का कोई भी फायदा (Dunyavi ya Akhirat) नहीं है, तो फिर ऐसा जुल्म क्यों करना? वालिदैन को चाहिए कि वो अपनी मौत और अल्लाह के सामने हाज़िरी को याद रखें।
10. नाइंसाफी का अंजाम: आखिरत की बर्बादी
जो माँ-बाप अपनी औलाद के बीच नाइंसाफी करते हैं, वो न सिर्फ दुनिया में फितना खड़ा करते हैं, बल्कि आखिरत में भी अल्लाह के गुनहगार होते हैं। किसी का हक़ मारना कबीरा गुनाह (Major Sin) है। कयामत के दिन मज़लूम औलाद अपने जालिम माँ-बाप के खिलाफ खड़ी होगी।
11. वालिदैन के लिए इंसाफ की चेकलिस्ट (Checklist for Parents)
खुद अपना मुहासबा करने के लिए इन सवालों के जवाब ईमानदारी से तलाशें:
- क्या मैं अपने तमाम बच्चों (बेटों और बेटियों) के साथ बराबरी और प्यार का बर्ताव कर रहा हूँ?
- क्या मैंने बेटियों का शरई हिस्सा देने की पक्की नियत कर ली है और उसे अपनी वसीयत में शामिल किया है?
- क्या मैं चापलूस बच्चे की बातों में आकर ईमानदार और हक़ बोलने वाले बच्चे को सज़ा तो नहीं दे रहा?
- क्या मेरे फैसलों की वजह से भाई-बहनों के बीच नफरत तो नहीं बढ़ रही?
- क्या मैं अपनी जायदाद को अल्लाह की दी हुई अमानत समझता हूँ या अपनी ज़ाती मिल्कियत?
- क्या मुझे हर पल अल्लाह के सामने अपनी औलाद के हक़ के बारे में जवाबदेही का अहसास रहता है?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या माँ-बाप अपनी मर्जी से किसी एक बच्चे को जायदाद से बेदखल कर सकते हैं?
शरीयत में किसी वारिस को उसके हक़ से पूरी तरह बेदखल करना जायज़ नहीं है। अगर कोई बच्चा नाफरमान भी है, तो भी उसे उसके शरई हिस्से से महरूम नहीं किया जा सकता।
Q. अगर माँ विरासत बांटने से मना करे तो बच्चों को क्या करना चाहिए?
बच्चों को चाहिए कि माँ को आलिमों या खानदान के बुजुर्गों के ज़रिए नरमी से समझाएं कि यह अल्लाह का हुक्म है। विरासत रोकना गुनाह है। अगर फिर भी न मानें, तो शरीयत की रौशनी में अपना हक़ मांगना बदतमीज़ी नहीं है।
Q. क्या दहेज देना बेटी के विरासत के हक़ को खत्म कर देता है?
बिल्कुल नहीं। दहेज एक रस्म है (जो अक्सर गैर-इस्लामी होती है), जबकि विरासत अल्लाह का फ़र्ज़ किया हुआ हक़ है। दहेज देने के बावजूद बेटी का हिस्सा उसके वालिद और वालिदा दोनों की जायदाद में बाकी रहता है।
नतीजा (Conclusion)
औलाद के बीच नाइंसाफी एक ज़हर है जो परिवार की जड़ों को खोखला कर देता है। माँ-बाप को चाहिए कि वो अपनी पसंद-नापसंद को किनारे रखकर अल्लाह के डर (तक़वा) के साथ अपने बच्चों के बीच बराबरी और इंसाफ करें। वालिदैन के हुकूक अदा करना बच्चों पर लाज़िम है, लेकिन बच्चों के हक़ अदा करना भी माँ-बाप की ज़िम्मेदारी है।
अल्लाह हमें सही समझ और इंसाफ करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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