Zakat Calculator: अपनी ज़कात का सही हिसाब (Calculation) करें

Zakat Calculator Online: अपनी जमा रकम, सोना-चांदी और माल-ए-तिजारत पर ज़कात का सही हिसाब लगाएं। जानिए निसाब क्या है और ज़कात किस पर फ़र्ज़ है।

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ज़कात कैलकुलेटर (Zakat Calculator)

ज़कात (Zakat) इस्लाम का तीसरा और बहुत अहम रुकन (Pillar) है। यह एक माली इबादत है जो हर साहिब-ए-निसाब (मालदार) मुसलमान पर फ़र्ज़ है।

हमारा Zakat Calculator आपको अपनी कुल संपत्ति (Assets) पर ज़कात की सही रकम निकालने में मदद करता है।

ज़कात के बारे में तफसील से जानने के लिए हमारा यह आर्टिकल पढ़ें: Zakat Kaise Nikale (ज़कात कैसे निकालें)

ज़कात की अहमियत (Importance of Zakat)

अल्लाह तआला कुरान में फरमाता है: “और नमाज़ कायम करो और ज़कात अदा करो।” (सूरह बक़रह: 43)

ज़कात अदा करने से:

  • माल पाक होता है।
  • अल्लाह की रज़ा हासिल होती है।
  • गरीब और ज़रूरतमंदों की मदद होती है।
  • माल में बरकत होती है।

निसाब क्या है? (What is Nisab?)

निसाब (Nisab) वह कम से कम मिकदार (Minimum Amount) है, जिसके पास होने पर ज़कात फ़र्ज़ हो जाती है। अगर आपके पास निसाब के बराबर या उससे ज़्यादा माल पूरे एक साल तक रहता है, तो आपको उसका 2.5% (चालीसवां हिस्सा) ज़कात में देना होगा।

निसाब के दो पैमाने हैं:

  1. सोना (Gold): 87.48 ग्राम (साढ़े 7 तोला) सोना।
  2. चाँदी (Silver): 612.36 ग्राम (साढ़े 52 तोला) चाँदी।

आजकल के दौर में चाँदी का निसाब कम है, इसलिए एहतियात के तौर पर चाँदी के निसाब को आधार माना जाता है ताकि ज़्यादा लोग ज़कात दे सकें और गरीबों का भला हो।

ज़कात किस पर फ़र्ज़ है? (Assets Subject to Zakat)

ज़कात इन चीज़ों पर फ़र्ज़ होती है:

  • नकद रकम (Cash): हाथ में, बैंक अकाउंट में या घर पर रखी हुई जमा रकम।
  • सोना और चाँदी (Gold & Silver): जेवरात, सिक्के या बिस्किट (चाहे इस्तेमाल में हों या नहीं, इस पर उलेमा की अलग राय हो सकती है, लेकिन एहतियात देने में है)।
  • माल-ए-तिजारत (Business Goods): बेचने की नीयत से खरीदा गया सामान।
  • इन्वेस्टमेंट (Investments): शेयर्स, म्यूचुअल फंड्स वगैरह।

ज़कात किसे दे सकते हैं? (Masarif-e-Zakat)

कुरान मजीद (सूरह तौबा: 60) में ज़कात के 8 हकदार बताए गए हैं:

  1. फकीर (Fuqara): जिनके पास कुछ न हो।
  2. मिस्कीन (Masakeen): जो बहुत ज़रूरतमंद हों।
  3. आमileen: ज़कात वसूलने वाले।
  4. मुअल्लफतुल कुलूब: नए मुसलमान या जिनका दिल इस्लाम की तरफ माइल करना हो।
  5. गुलाम आज़ाद कराना।
  6. कर्ज़दार (Debtors): जो कर्ज़ में डूबे हों और अदा करने की ताकत न रखते हों।
  7. फी-सबिलिल्लाह: अल्लाह के रास्ते में (जैसे जिहाद या दीन की दावत)।
  8. मुसाफिर (Traveler): जो सफर में हो और उसके पास पैसे ख़त्म हो गए हों।

नोट: अपने सगे माँ-बाप, दादा-दादी, और औलाद (बेटा-बेटी) को ज़कात नहीं दी जा सकती।

ज़कात कब अदा करनी चाहिए?

जब आपके पास निसाब के बराबर माल आ जाए और उस पर एक इस्लामिक साल (Lunar Year) गुज़र जाए, तो ज़कात फ़र्ज़ हो जाती है। बहुत से लोग Ramadan के महीने में ज़कात निकालते हैं क्योंकि इस महीने में नेकियों का सवाब 70 गुना बढ़ जाता है।

दीन की और बातें सीखने के लिए पढ़ें: Namaz Ka Tarika और Surah Yaseen in Hindi

इस टूल का इस्तेमाल कैसे करें? (How to Use)

यह कैलकुलेटर इस्तेमाल करना बहुत आसान है:

  1. Assets (संपत्ति) डालें:
    • Cash: अपनी नकद रकम लिखें।
    • Gold/Silver: सोने-चाँदी की आज की वैल्यू लिखें।
    • Business: अपने कारोबारी माल की वैल्यू लिखें।
  2. Liabilities (कर्ज़) डालें:
    • अगर आप पर कोई कर्ज़ है जो अभी अदा करना है, तो उसे लिखें। यह रकम आपकी कुल संपत्ति से घटा दी जाएगी।
  3. Nisab (निसाब) सेट करें:
    • अपने देश में आज का सोने या चाँदी का रेट पता करें और निसाब की वैल्यू डालें। (आमतौर पर चाँदी का निसाब बेहतर रहता है)।
  4. Calculate:
    • बटन दबाते ही आपको पता चल जाएगा कि आप पर कितनी ज़कात फ़र्ज़ है।

रमज़ान के महीने में ज़कात अदा करना बहुत अफ़ज़ल है। सेहरी और इफ्तार का वक़्त जानने के लिए हमारा Ramadan Calendar देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. ज़कात कितनी देनी होती है?
A.

कुल बचत (Total Savings) का 2.5% हिस्सा ज़कात में देना होता है। यानी हर 100 रुपये पर 2.5 रुपये।

Q. क्या इस्तेमाल के जेवरात पर ज़कात है?
A.

इस पर उलेमा की अलग-अलग राय है। हनफी मसलक में इस्तेमाल के जेवरात पर भी ज़कात फ़र्ज़ है अगर वह निसाब तक पहुँचते हैं।

Q. क्या कर्ज़दार को ज़कात देनी होगी?
A.

अगर कर्ज़ घटाने के बाद भी आपके पास निसाब के बराबर माल बचता है, तो ज़कात देनी होगी। अगर कर्ज़ इतना है कि माल निसाब से कम हो जाए, तो ज़कात फ़र्ज़ नहीं।

Q. ज़कात किसे दे सकते हैं?
A.

ज़कात गरीबों, मिस्कीनों, कर्ज़दारों और मुसाफिरों को दी जा सकती है। अपने सगे माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी और औलाद (बेटा-बेटी, पोता-पोती) को ज़कात नहीं दी जा सकती। भाई-बहन और रिश्तेदारों को देना अफ़ज़ल है।

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