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Surah Hud in Hindi: सूरह हूद की फजीलत और पहली 50 आयतें

Surah Hud in Hindi: जानिए सूरह हूद की फजीलत और पहली 50 आयतों का हिंदी तर्जुमा। इसमें हज़रत नूह (अ.स.) और हज़रत हूद (अ.स.) के वाकयात तफसील से हैं।

Surah Hud in Hindi: सूरह हूद की फजीलत और पहली 50 आयतें

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सूरह हूद (Surah Hud) कुरान मजीद की 11वीं सूरह है। यह मक्का में नाज़िल हुई (मक्की सूरह) और इसमें 123 आयतें हैं। इसका नाम हज़रत हूद (Hud) अलैहिस्सलाम के नाम पर है, जिनका वाकिया इसमें बयान किया गया है।

यह सूरह बहुत ही जलाल और रोब वाली है। हदीस में आता है कि नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “सूरह हूद और इसकी जैसी सूरतों ने मुझे बूढ़ा कर दिया।” (तिर्मिज़ी)। इसकी वजह इसमें मौजूद इस्तिकामत (मज़बूती) का हुक्म और पिछली कौमों पर अज़ाब के खौफनाक वाकयात हैं।

इस आर्टिकल में हम Surah Hud in Hindi, इसकी अहमियत और पहली 50 आयतों का तर्जुमा जानेंगे।

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सूरह हूद की अहमियत (Importance of Surah Hud)

  1. इस्तिकामत का हुक्म: इस सूरह की आयत नंबर 112 में अल्लाह ने नबी (ﷺ) को हुक्म दिया: “पस आप जम जाइए जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है।” यह दीन पर साबित-कदम रहने का सबसे सख्त हुक्म है।
  2. नबियों के किस्से: इसमें हज़रत नूह, हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत, शोएब और मूसा (अलैहिमुस्सलाम) के वाकयात तफसील से हैं, जो बताते हैं कि अल्लाह के नाफरमानों का अंजाम कैसा हुआ।
  3. अल्लाह की रहमत: यह सूरह बताती है कि अल्लाह की पकड़ सख्त है, लेकिन जो तौबा करते हैं उनके लिए वो बहुत मेहरबान है।

Surah Hud Ayat 1-50 in Hindi

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

  1. अलिफ़-लाम-रा, किताबुन उह-किमत आयातुहू सुम्मा फुस्सिलत मिल-लदुन हकीमिन ख़बीर।
    (अलिफ़-लाम-रा, यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें पक्की की गई हैं, फिर खोलकर बयान की गई हैं, एक हिकमत वाले, खबरदार की तरफ से।)

  2. अल्ला तअ्बुदू इल्लल्लाह, इन्नी लकुम मिन्हु नज़ीरुंव-व बशीर।
    ((यह कि) तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो, बेशक मैं तुम्हें उसकी तरफ से डराने वाला और खुशखबरी देने वाला हूँ।)

  3. व अनिस्तगफिरू रब्बकुम सुम्मा तूबू इलैहि युमत्तिअ्कुम मताअन हसनन इला अजलिम-मुसम्मन व युअ्ति कुल्ला ज़ी फज़लिन फज़लह, व इन तवल्लौ फ-इन्नी अख़ाफु अलैकुम अज़ाबा यौमिन कबीर।
    (और यह कि तुम अपने रब से माफ़ी मांगो, फिर उसकी तरफ तौबा करो, वो तुम्हें एक मुकर्रर वक़्त तक अच्छा फायदा देगा और हर फजीलत वाले को उसकी फजीलत देगा, और अगर तुम मुँह फेरोगे तो मैं तुम पर एक बड़े दिन के अज़ाब से डरता हूँ।)

  4. इलल्लाहि मरजिउकुम, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर।
    (अल्लाह ही की तरफ तुम्हें लौटना है, और वो हर चीज़ पर कादिर है।)

  5. अला इन्नहुम यस्नूना सुदूरहुम लि-यस्तख्फू मिन्ह, अला हीना यस्तग्शूना सियाबहुम यअ्लमु मा युसिर्रूना वमा युअ्लिनून, इन्नहू अलीमुम बि-ज़ातिस सुदूर।
    (सुनो! वो अपने सीने दोहरा करते हैं (मोड़ते हैं) ताकि उससे (अल्लाह से) छुप जाएं, सुनो! जब वो अपने कपड़े ओढ़ते हैं तो वो जानता है जो वो छुपाते हैं और जो वो ज़ाहिर करते हैं, बेशक वो सीनों की बातों को जानने वाला है।)

  6. व मा मिन दाब्बतिन फिल अर्ज़ि इल्ला अलल्लाहि रिज़्कुहा व यअ्लमु मुस्तक़र्रहा व मुस्तव्द-अहा, कुल्लुन फी किताबिम मुबीन।
    (और ज़मीन में चलने वाला कोई जानवर ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे न हो, और वो जानता है उसके ठहरने की जगह और उसके सौंपे जाने की जगह, सब कुछ एक खुली किताब में है।)

  7. व हुवल लज़ी ख़लक़स समावाति वल अर्ज़ा फी सित्तति अय्यामिन व काना अर्शुहू अलल मा-इ लि-यब्लुवकुम अय्युकुम अहसनु अमला, व ल-इन कुल्ता इन्नकुम मब्ऊसूना मिम बअ्दिल मौति ल-यकूलन्नल लज़ीना कफरू इन हाज़ा इल्ला सिहरुम मुबीन।
    (और वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिन में पैदा किया और उसका अर्श पानी पर था ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें से कौन अमल में ज़्यादा अच्छा है, और अगर आप कहें कि तुम मरने के बाद उठाए जाओगे तो काफिर ज़रूर कहेंगे कि यह तो बस खुला जादू है।)

  8. व ल-इन अख्खरना अन्हुमुल अज़ाबा इला उम्मतुम मअ्दूदतिल ल-यकूलुन्न मा यहबिसुह, अला यौमा यअ्तीहिम लैसा मसरूफ़न अन्हुम व हाक़ बिहिम मा कानू बिही यस्तहज़िऊन।
    (और अगर हम उनसे अज़ाब को एक गिने-चुने वक़्त तक रोक दें तो वो ज़रूर कहेंगे: इसे किस चीज़ ने रोक रखा है? सुनो! जिस दिन वो उन पर आएगा तो उनसे फेरा नहीं जाएगा और उन्हें घेर लेगा वो जिसका वो मज़ाक उड़ाते थे।)

  9. व ल-इन अज़क़नल इंसान मिन्ना रहमतन सुम्मा नज़अ्नाहा मिन्हु इन्नहू ल-यऊसून कफूर।
    (और अगर हम इंसान को अपनी तरफ से रहमत का मज़ा चखाएं फिर उसे उससे छीन लें तो वो ज़रूर मायूस, ना-शुकरा हो जाता है।)

  10. व ल-इन अज़क़नाहु नअ्मा-अ बअ्दा ज़र्रा-अ मस्सत्हु ल-यकूलन्न ज़हबस सय्यि-आतु अन्नी, इन्नहू ल-फरिहुन फखूर।
    (और अगर हम उसे नेमत का मज़ा चखाएं तकलीफ के बाद जो उसे पहुँची थी, तो वो ज़रूर कहेगा: बुराइयां मुझसे दूर हो गईं, बेशक वो इतराने वाला, डींगें मारने वाला है।)

  11. इल्लल लज़ीना सबरू व अमिलुस सालिहाति उलाइका लहुम मगफिरतुंव व अजरुन कबीर।
    (सिवाय उन लोगों के जिन्होंने सब्र किया और नेक अमल किए, उन्हीं के लिए बख्शिश और बड़ा अज्र है।)

  12. फ-ल-अल्लका तारिकुम बअ्ज़ मा यूहा इलौका व ज़ाइकुम बिही सदरुका अंय यकूलू लौला उनज़िला अलैहि कन्जुन औ जा-अ म-अहू मलक, इन्नमा अन्ता नज़ीर, वल्लाहु अला कुल्लि शैइन वकील।
    (तो शायद आप उसमें से कुछ छोड़ने वाले हैं जो आपकी तरफ वही किया जाता है और उससे आपका सीना तंग होता है कि वो कहते हैं: उस पर कोई खज़ाना क्यों नहीं उतारा गया या उसके साथ कोई फरिश्ता क्यों नहीं आया? आप तो बस डराने वाले हैं, और अल्लाह हर चीज़ पर निगहबान है।)

  13. अम यकूलूनफ्तराह, कुल फअ्तू बि-अश्रि सुवरिम मिस्लिही मुफ्तरयातिंव वदऊ मनिस ततअ्तुम मिन दूनिल्लाहि इन कुन्तुम सादिक़ीन।
    (क्या वो कहते हैं कि उसने इसे घड़ लिया है? कह दीजिए: तो तुम इसके जैसी दस सूरतें घड़ी हुई ले आओ और अल्लाह के सिवा जिसे चाहो बुला लो अगर तुम सच्चे हो।)

  14. फ-इल्लम यस्तजीबू लकुम फअ्लमू अन्नमा उनज़िला बि-इल्मिल्लाहि व अल्ला इलाहा इल्ला हू, फ-हल अन्तुम मुस्लिमून।
    (फिर अगर वो तुम्हारी बात न मानें तो जान लो कि यह अल्लाह के इल्म से उतारा गया है और यह कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं, तो क्या तुम मुसलमान (फरमाबरदार) होते हो?)

  15. मन काना युरीदुल हयातद दुनिया व ज़ीनतहा नुवफ्फि इलैहिम अअ्मालहुम फीहा व हुम फीहा ला युब्खसून।
    (जो दुनिया की ज़िन्दगी और उसकी ज़ीनत चाहता है तो हम उन्हें उनके आमाल (का बदला) उसी में पूरा दे देते हैं और उन्हें उसमें कोई कमी नहीं की जाती।)

  16. उलाइकल लज़ीना लैसा लहुम फिल आखिरति इल्लन नार, व हबित मा सनऊ फीहा व बातिलुम मा कानू यअ्मलून।
    (यही वो लोग हैं जिनके लिए आखिरत में आग के सिवा कुछ नहीं, और बर्बाद हो गया जो उन्होंने वहां (दुनिया में) बनाया और बातिल है जो वो करते थे।)

  17. अ-फ-मन काना अला बय्यिनतिम मिर रब्बिही व यत्लूहू शाहिदुम मिन्हु व मिन क़ब्लिही किताबु मूसा इमामंव व रहमह, उलाइका युअ्मिनूना बिह, व मंय यक्फुर बिही मिनल अहज़ाबि फन्नारु मौइदुह, फला तकु फी मिर्यतिम मिन्ह, इन्नहुल हक़्क़ु मिर रब्बिका व लाकिन्ना अकसरन नासि ला युअ्मिनून।
    (तो क्या वो जो अपने रब की तरफ से खुली दलील पर हो और उसके पीछे उसी की तरफ से एक गवाह (कुरान) आए और उससे पहले मूसा की किताब पेशवा और रहमत हो (वो दूसरों जैसा हो सकता है)? यही लोग उस पर ईमान लाते हैं, और गिरोहों में से जो उसका इनकार करे तो आग उसका ठिकाना है, तो आप इसमें शक में न हों, बेशक यह आपके रब की तरफ से हक़ है लेकिन अक्सर लोग ईमान नहीं लाते।)

  18. व मन अज़लमु मिम्मानिफ्तरा अलल्लाहि कज़िबा, उलाइका युअ्रजूना अला रब्बिहिम व यकूलुल अश्हादु हा-उलाइल लज़ीना कज़बू अला रब्बिहिम, अला लअ्नतुल्लाहि अलज़ ज़ालिमीन।
    (और उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ बांधे? ये लोग अपने रब के सामने पेश किए जाएंगे और गवाह कहेंगे: यही वो लोग हैं जिन्होंने अपने रब पर झूठ बोला, सुनो! ज़ालिमों पर अल्लाह की लानत है।)

  19. अल्लज़ीना यसुद्दूना अन सबीलिल्लाहि व यबगूनहा इवजा, व हुम बिल आखिरति हुम काफिरून।
    (जो अल्लाह के रास्ते से रोकते हैं और उसमें टेढ़ापन तलाश करते हैं, और वही आखिरत के मुनकिर हैं।)

  20. उलाइका लम यकूनू मुअ्जिज़ीना फिल अर्ज़ि व मा काना लहुम मिन दूनिल्लाहि मिन औलिया, युज़ा-अफु लहुमुल अज़ाब, मा कानू यस्ततीऊनस सम-अ व मा कानू युब्सिरून।
    (ये लोग ज़मीन में (अल्लाह को) आजिज़ करने वाले नहीं और न अल्लाह के सिवा उनका कोई मददगार है, उनके लिए अज़ाब दुगना किया जाएगा, वो न सुनने की ताकत रखते थे और न देखते थे।)

  21. उलाइकल लज़ीना खसिरू अनफुसहुम व ज़ल्ला अन्हुम मा कानू यफ्तरून।
    (यही वो लोग हैं जिन्होंने अपनी जानों को घाटे में डाला और जो वो घड़ते थे उनसे खो गया।)

  22. ला जरमा अन्नहुम फिल आखिरति हुमुल अख्सरून।
    (ज़रूरी है कि वही आखिरत में सबसे ज़्यादा घाटा उठाने वाले हैं।)

  23. इन्नल लज़ीना आमनू व अमिलुस सालिहाति व अख्बतू इला रब्बिहिम उलाइका अस्हाबुल जन्नह, हुम फीहा खालिदून।
    (बेशक जो लोग ईमान लाए और नेक अमल किए और अपने रब के सामने आज़िज़ी (झुकाव) की, यही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे।)

  24. मसलुल फरीक़ैनि कल-अअ्मा वल-असम्म वल-बसीरि वस-समीअ्, हल यस्तवियानि मसला, अफला तज़क्करून।
    (दोनों फरीकों (गिरोहों) की मिसाल अंधे और बहरे और देखने वाले और सुनने वाले जैसी है, क्या मिसाल में दोनों बराबर हो सकते हैं? तो क्या तुम नसीहत नहीं पकड़ते?)

  25. व लक़द अर्सल्ना नूहन इला कौमिही इन्नी लकुम नज़ीरुम मुबीन।
    (और हमने नूह को उनकी कौम की तरफ भेजा (उन्होंने कहा): बेशक मैं तुम्हारे लिए खुला डराने वाला हूँ।)

  26. अल्ला तअ्बुदू इल्लल्लाह, इन्नी अख़ाफु अलैकुम अज़ाबा यौमिन अलीम।
    (कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो, बेशक मैं तुम पर एक दर्दनाक दिन के अज़ाब से डरता हूँ।)

  27. फ-क़ालल मल-उल लज़ीना कफरू मिन कौमिही मा नराका इल्ला बशरम मिस्लना व मा नरा कत्तब-अका इल्लल लज़ीना हुम अराज़िलुना बादियर रायि व मा नरा लकुम अलैना मिन फज़लिम् बल नज़ुन्नुकुम काज़िबीन।
    (तो उनकी कौम के सरदारों ने जिन्होंने कुफ्र किया, कहा: हम तो तुम्हें अपने जैसा एक बशर (इंसान) ही देखते हैं और हम नहीं देखते कि किसी ने तुम्हारी पैरवी की हो सिवाय उन लोगों के जो हममें सबसे कमतर (गरीब) हैं सरसरी राय से, और हम अपने ऊपर तुम्हारी कोई फजीलत नहीं देखते बल्कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।)

  28. क़ाला या कौमि अ-र-अय्तुम इन कुन्तु अला बय्यिनतिम मिर रब्बी व आतानी रहमतम मिन इन्दिही फ-उम्मियत अलैकुम, अ-नुलज़िमुकुमूहा व अन्तुम लहा कारिहून।
    (उन्होंने कहा: ऐ मेरी कौम! देखो तो अगर मैं अपने रब की तरफ से खुली दलील पर हूँ और उसने मुझे अपने पास से रहमत दी हो फिर वो तुम पर पोशीदा (छुपी) रही, तो क्या हम उसे तुम पर चिपका दें जबकि तुम उसे नापसंद करते हो?)

  29. व या कौमि ला अस-अलुकुम अलैहि माला, इन अजरिया इल्ला अलल्लाह, व मा अना बि-तारिदिल लज़ीना आमनू, इन्नहुम मुलाकू रब्बिहिम व लाकिन्नी अराकुम कौमन तजहलून।
    (और ऐ मेरी कौम! मैं तुमसे इस पर कोई माल नहीं मांगता, मेरा बदला तो सिर्फ अल्लाह पर है, और मैं उन लोगों को धक्के देने वाला नहीं जो ईमान लाए, बेशक वो अपने रब से मिलने वाले हैं लेकिन मैं तुम्हें ऐसी कौम देखता हूँ जो जहालत करती है।)

  30. व या कौमि मंय यन्सुरुनी मिनल्लाहि इन तरत्तुहुम, अफला तज़क्करून।
    (और ऐ मेरी कौम! अल्लाह (की पकड़) से मुझे कौन बचाएगा अगर मैं उन्हें निकाल दूँ? तो क्या तुम नसीहत नहीं पकड़ते?)

  31. व ला अकूलु लकुम इन्दी खज़ाइनुल्लाहि व ला अअ्लमुल गैबा व ला अकूलु इन्नी मलकंव व ला अकूलु लिल्लज़ीना तज़दरी अअ्युनुकुम लंय युअ्तियहुमुल्लाहु खैरा, अल्लाहु अअ्लमु बिमा फी अनफुसिहिम, इन्नी इज़ल ल-मिनज़ ज़ालिमीन।
    (और मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के खज़ाने हैं और न मैं गैब जानता हूँ और न मैं कहता हूँ कि मैं फरिश्ता हूँ और न मैं उन लोगों के बारे में कहता हूँ जिन्हें तुम्हारी आँखें हकीर (छोटा) समझती हैं कि अल्लाह उन्हें हरगिज़ कोई भलाई नहीं देगा, अल्लाह खूब जानता है जो उनके दिलों में है, (अगर ऐसा कहूँ) तो बेशक मैं उस वक़्त ज़ालिमों में से हूँगा।)

  32. क़ालू या नूहू क़द जादल्तना फ-अक्सर्ता जिदालना फअ्तिना बिमा त-इदुना इन कुन्ता मिनस सादिक़ीन।
    (उन्होंने कहा: ऐ नूह! तूने हमसे झगड़ा किया और बहुत झगड़ा किया, तो हमारे पास वो ले आ जिसका तू हमसे वादा करता है अगर तू सच्चों में से है।)

  33. क़ाला इन्नमा यअ्तीकुम बिहिल्लाहु इन शा-अ व मा अन्तुम बि-मुअ्जिज़ीन।
    (उन्होंने कहा: वो तो अल्लाह ही तुम्हारे पास लाएगा अगर चाहेगा और तुम (उसे) आजिज़ करने वाले नहीं।)

  34. व ला यन्फउकुम नुस्ही इन अरत्तु अन अन् सहा लकुम इन कानल्लाहु युरीदु अंय युग्वियकुम, हुवा रब्बुकुम व इलैहि तुरजऊन।
    (और मेरी नसीहत तुम्हें फायदा नहीं देगी अगर मैं चाहूँ कि तुम्हारी खैर-ख्वाही करूँ जबकि अल्लाह चाहता हो कि तुम्हें गुमराह कर दे, वही तुम्हारा रब है और उसी की तरफ तुम लौटाए जाओगे।)

  35. अम यकूलूनफ्तराह, कुल इनिफ्तरायतुहू फ-अलय्या इजरामी व अना बरीउम मिम्मा तुजरिमून।
    (क्या वो कहते हैं कि उसने इसे घड़ लिया है? कह दीजिए: अगर मैंने इसे घड़ा है तो मेरा जुर्म मुझ पर है और मैं बरी हूँ उससे जो तुम जुर्म करते हो।)

  36. व ऊहिया इला नूहिन अन्नहू लंय युअ्मिना मिन कौमिका इल्ला मन क़द आमना फला तब्तइस बिमा कानू यफअ्लून।
    (और नूह की तरफ वही की गई कि तुम्हारी कौम में से हरगिज़ कोई ईमान नहीं लाएगा सिवाय उनके जो ईमान ला चुके, तो तुम गम न करो उस पर जो वो करते हैं।)

  37. वस्नइल फुल्का बि-अअ्युनिना व वहयिना व ला तुखातिब्नी फिल्लज़ीना ज़लमू, इन्नहुम मुग्रकून।
    (और हमारी आँखों के सामने और हमारी वही के मुताबिक कश्ती बनाओ और मुझसे उन लोगों के बारे में बात न करना जिन्होंने ज़ुल्म किया, बेशक वो गर्क (डूबने) किए जाने वाले हैं।)

  38. व यस्नउल फुल्का व कुल्लमा मर्रा अलैहि मल-उम मिन कौमिही सखिरू मिन्ह, क़ाला इन तस्खरू मिन्ना फ-इन्ना नस्खरु मिन्कुम कमा तस्खरून।
    (और वो कश्ती बना रहे थे और जब भी उनकी कौम के सरदार उनके पास से गुज़रते तो उनका मज़ाक उड़ाते, उन्होंने कहा: अगर तुम हम पर हँसते हो तो हम भी तुम पर हँसेंगे जैसे तुम हँसते हो।)

  39. फ-सौफा तअ्लमूना मंय यअ्तीहि अज़ाबुंय युख्ज़ीहि व यहिल्लु अलैहि अज़ाबुम मुक़ीम।
    (तो जल्द ही तुम जान लोगे कि किस पर वो अज़ाब आता है जो उसे रुसवा कर देगा और किस पर हमेशा रहने वाला अज़ाब उतरता है।)

  40. हत्ता इज़ा जा-अ अमरुना व फारत तन्नूरु कुल्नहमिल फीहा मिन कुल्लिन ज़ौजयनिस नैनि व अहलका इल्ला मन सबक़ा अलैहिल कौलु व मन आमन, व मा आमना म-अहू इल्ला क़लील।
    (यहाँ तक कि जब हमारा हुक्म आ गया और तन्नूर उबल पड़ा, हमने कहा: इसमें हर किस्म (के जानवरों) में से दो-दो जोड़े चढ़ा लो और अपने घर वालों को, सिवाय उसके जिस पर बात पहले तय हो चुकी, और जो ईमान लाया (उसे भी), और उसके साथ ईमान नहीं लाए थे मगर बहुत थोड़े।)

  41. व क़ालरकबू फीहा बिस्मिल्लाहि मजरेहा व मुरसाहा, इन्ना रब्बी ल-गफूरुर रहीम।
    (और उन्होंने कहा: इसमें सवार हो जाओ, अल्लाह के नाम से इसका चलना और इसका ठहरना है, बेशक मेरा रब बख्शने वाला, मेहरबान है।)

  42. व हिया तजरी बिहिम फी मौजिन कल-जिबालि व नादा नूहूनिब्नहू व काना फी मअ्ज़िलिंय या बुनय्यरकम म-अना व ला तकुम म-अल काफ़िरीन।
    (और वो उन्हें लेकर पहाड़ों जैसी मौज में चल रही थी और नूह ने अपने बेटे को पुकारा और वो एक किनारे पर था: ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा और काफिरों के साथ न हो।)

  43. क़ाला स-आवी इला जबलिंय यअ्सिमुनी मिनल मा-इ, क़ाला ला आसिमल यौमा मिन अम्रिल्लाहि इल्ला मर रहिम, व हाला बैनहुमल मौजु फ-काना मिनल मुग्रक़ीन।
    (उसने कहा: मैं जल्द ही किसी पहाड़ की पनाह ले लूँगा जो मुझे पानी से बचा लेगा, उन्होंने कहा: आज अल्लाह के हुक्म से बचाने वाला कोई नहीं सिवाय उस पर जिस पर वो रहम करे, और उन दोनों के दरमियान मौज हाइल (आड़) हो गई तो वो डूबने वालों में से हो गया।)

  44. व कीला या अर्दुब्लई मा-अकि व या समा-उ अक़लिई व गीज़ल मा-उ व कुज़ियल अमरु वस्तवत अलल जूदि य्यि व कीला बुअ्दल लिल-कौमिज़ ज़ालिमीन।
    (और कहा गया: ऐ ज़मीन! अपना पानी निगल ले और ऐ आसमान! थम जा, और पानी खुशक कर दिया गया और काम तमाम कर दिया गया और वो (कश्ती) जूदी (पहाड़) पर ठहर गई और कहा गया: दूरी हो ज़ालिम कौम के लिए।)

  45. व नादा नूहुर रब्बहू फ-क़ाला रब्बी इन्नब्नी मिन अहली व इन्ना वअ्दकल हक़्क़ु व अन्ता अहकमुल हाकिमीन।
    (और नूह ने अपने रब को पुकारा तो कहा: ऐ मेरे रब! बेशक मेरा बेटा मेरे घर वालों में से है और बेशक तेरा वादा सच्चा है और तू सब हाकिमों से बड़ा हाकिम है।)

  46. क़ाला या नूहू इन्नहू लैसा मिन अहलिका इन्नहू अमलुन गैरू सालिह, फला तस्अल्नि मा लैसा लका बिही इल्म, इन्नी अइज़ुका अन तकूना मिनल जाहिलीन।
    (फरमाया: ऐ नूह! बेशक वो तेरे घर वालों में से नहीं, बेशक उसके अमल नेक नहीं, तो मुझसे वो सवाल न कर जिसका तुझे इल्म नहीं, मैं तुझे नसीहत करता हूँ कि तू जाहिलों में से न हो।)

  47. क़ाला रब्बी इन्नी अऊज़ु बिका अन अस-अलका मा लैसा ली बिही इल्म, व इल्ला तगफिर ली व तरहम्नी अकुम मिनल खासिरिन।
    (उन्होंने कहा: ऐ मेरे रब! मैं तेरी पनाह मांगता हूँ कि तुझसे वो सवाल करूँ जिसका मुझे इल्म नहीं, और अगर तूने मुझे माफ़ न किया और मुझ पर रहम न किया तो मैं घाटा उठाने वालों में से हो जाऊँगा।)

  48. कीला या नूहूहबित बि-सलामिन मिन्ना व बरकातिन अलौका व अला उममिम मिम्मन म-अक, व उममुन स-नुमत्तिउहुम सुम्मा यमस्सुहुम मिन्ना अज़ाबुन अलीम।
    (कहा गया: ऐ नूह! उतर जाओ हमारी तरफ से सलामती और बरकतों के साथ तुम पर और उन गिरोहों पर जो तुम्हारे साथ हैं, और कुछ गिरोह ऐसे होंगे जिन्हें हम फायदा देंगे फिर उन्हें हमारी तरफ से दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा।)

  49. तिल्का मिन अम्बाइल गैबि नूहीहा इलैक, मा कुन्ता तअ्लमुहा अन्ता वला कौमुका मिन क़ब्लि हाज़ा, फसबिर, इन्नल आक़िबता लिल-मुत्तक़ीन।
    (ये गैब की खबरें हैं जो हम आपकी तरफ वही करते हैं, आप उन्हें नहीं जानते थे और न आपकी कौम इससे पहले, तो सब्र करें, बेशक अंजाम परहेज़गारों के लिए है।)

  50. व इला आदिन अख़ाहुम हूदा, क़ाला या कौमिअ्-बुदुल्लाहा मा लकुम मिन इलाहिन गैरूह, इन अन्तुम इल्ला मुफ्तरून।
    (और आद की तरफ उनके भाई हूद को (भेजा), उन्होंने कहा: ऐ मेरी कौम! अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं, तुम तो बस झूठ घड़ने वाले हो।)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. सूरह हूद मक्की है या मदनी?
A.

सूरह हूद एक मक्की सूरह है। यह हिजरत से पहले मक्का के आखिरी दौर में नाज़िल हुई थी।

Q. नबी (ﷺ) ने क्यों कहा कि सूरह हूद ने मुझे बूढ़ा कर दिया?
A.

क्योंकि इस सूरह में “फस्तक़िम कमा उमिरता” (जम जाओ जैसा हुक्म दिया गया है) की आयत है, जो इस्तिकामत (Steadfastness) का बहुत भारी हुक्म है। इसकी ज़िम्मेदारी के एहसास ने आप (ﷺ) पर असर डाला।

Q. कौम-ए-आद पर कौन सा अज़ाब आया था?
A.

कौम-ए-आद पर एक सख्त आंधी (Windstorm) का अज़ाब आया था जो लगातार 7 रात और 8 दिन तक चलती रही और उन्हें जड़ से उखाड़ फेंका।


नतीजा (Conclusion)

सूरह हूद हमें सिखाती है कि दीन पर जमना (इस्तिकामत) कितना ज़रूरी है। चाहे हालात कितने भी मुश्किल हों, हमें अल्लाह की नाफरमानी नहीं करनी चाहिए। हज़रत हूद (अ.स.) और दूसरी कौमों के वाकयात हमें याद दिलाते हैं कि तकब्बुर का अंजाम तबाही है।

अल्लाह हमें दीन पर साबित-कदम रखे। आमीन।

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