Surah Asr in Hindi: सूरह अस्र की फजीलत और तर्जुमा
Surah Asr in Hindi: जानिए सूरह अस्र का हिंदी तर्जुमा और तफसीर। इमाम शाफई (रह.) ने कहा कि अगर कुरान में सिर्फ यही सूरह होती तो इंसान की हिदायत के लिए काफी थी।

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सूरह अस्र (Surah Al-Asr) कुरान मजीद की 103वीं सूरह है। “अल-अस्र” का मतलब है “ज़माना” या “वक़्त” (The Time)। यह मक्का में नाज़िल हुई और इसमें सिर्फ 3 आयतें हैं।
यह सूरह कुरान की सबसे जामे (Comprehensive) सूरतों में से एक है। इमाम शाफई (रह.) ने इसके बारे में फरमाया: “अगर कुरान में सिर्फ यही एक सूरह नाज़िल होती, तो यह इंसान की हिदायत के लिए काफी थी।”
इस आर्टिकल में हम Surah Asr in Hindi, इसका तर्जुमा और अहमियत जानेंगे।
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इमाम शाफई कौन थे? (Who was Imam Shafi’i?)
इमाम शाफई (रह.) इस्लाम के चार बड़े इमामों में से एक हैं, जिनके नाम पर शाफई मसलक (School of thought) है। उनका पूरा नाम मुहम्मद इब्न इदरीस अश-शाफई है। वह एक बहुत बड़े आलिम, मुज्तहिद और फकीह (Islamic Jurist) थे। उनका यह कहना कि “अगर सिर्फ सूरह अस्र नाज़िल होती तो काफी थी,” इस सूरह की गहराई और अहमियत को बताता है।
वक़्त की क़सम क्यों? (Why the Oath on Time?)
अल्लाह तआला ने इस सूरह की शुरुआत “वल-अस्र” (ज़माने की क़सम) से की है। जब अल्लाह किसी चीज़ की क़सम खाता है, तो वह उसकी अहमियत बताने के लिए होती है।
वक़्त (Time) अल्लाह की सबसे कीमती नेमतों में से एक है। हमारी ज़िन्दगी का हर लम्हा इसी वक़्त से बना है। अल्लाह हमें यह बता रहा है कि यही वक़्त है जिसमें इंसान या तो कामयाबी हासिल करता है या घाटे में रहता है।
कामयाबी के 4 सुनहरे उसूल (तफसील)
इमाम शाफई (रह.) ने जो कहा कि यह सूरह हिदायत के लिए काफी है, उसकी वजह यह है कि इसमें कामयाबी का एक मुकम्मल फॉर्मूला दिया गया है। अल्लाह फरमाता है कि हर इंसान घाटे में है, सिवाय उन लोगों के जिनमें ये चार खूबियां हों:
ईमान (Faith): अल्लाह पर, उसके रसूलों पर और आखिरत पर सच्चा यकीन रखना।
नेक अमल (Amal-e-Salih): सिर्फ दिल में ईमान रखना काफी नहीं, बल्कि उसे अपने अमल (Actions) से साबित करना भी ज़रूरी है। नमाज़, रोज़ा, सदका, अच्छे अखलाक़, ये सब नेक अमल में शामिल हैं।
हक़ की नसीहत (Tawasi bil-Haqq): एक सच्चा मोमिन सिर्फ अपनी इस्लाह (सुधार) नहीं करता, बल्कि वह समाज की इस्लाह की भी फिक्र करता है। वह दूसरों को भी अच्छी बातों की दावत देता है और बुराई से रोकता है।
सब्र की तलकीन (Tawasi bis-Sabr): हक़ का रास्ता आसान नहीं होता। इस पर चलने में मुश्किलें आती हैं। इसलिए आपस में एक-दूसरे को सब्र की तालीम देना भी ज़रूरी है। सब्र सिर्फ मुसीबत पर नहीं, बल्कि गुनाहों से बचने पर और नेकी पर जमे रहने पर भी होता है।
यह चार उसूल एक मुकम्मल इस्लामी ज़िन्दगी का नक्शा हैं:
- ईमान: अल्लाह से ताल्लुक।
- नेक अमल: अपनी ज़ात की इस्लाह।
- हक़ की नसीहत: समाज की इस्लाह।
- सब्र की तलकीन: मुश्किलों का मुकाबला।
Surah Asr in Hindi (Hindi Mein)
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
वल-अस्र।
(ज़माने की कसम।)इन्नल-इंसाना लफी खुस्र।
(बेशक इंसान घाटे में है।)इल्लल-लज़ीना आमनू व अमिलुस-सालिहाति व तवा सौ बिल-हक़्क़ि व तवा सौ बिस-सब्र।
(सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और नेक अमल किए, और एक-दूसरे को हक़ की नसीहत की और एक-दूसरे को सब्र की तलकीन की।)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. अस्र (Asr) का क्या मतलब है?
“अस्र” का मतलब है “ज़माना” या “वक़्त”। अल्लाह ने वक़्त की कसम खाकर यह बताया है कि वक़्त कितनी कीमती चीज़ है और इंसान इसे कैसे बर्बाद कर रहा है।
Q. इस सूरह का असल पैगाम क्या है?
इस सूरह का असल पैगाम यह है कि दुनिया और आखिरत में कामयाबी के लिए सिर्फ ईमान लाना काफी नहीं, बल्कि नेक अमल करना, हक़ बात फैलाना और मुश्किलों पर सब्र करना भी ज़रूरी है।
Q. सहाबा इस सूरह को क्यों पढ़ते थे?
रिवायतों में आता है कि जब दो सहाबी (र.अ.) मिलते थे, तो जुदा होने से पहले एक-दूसरे को सूरह अस्र पढ़कर सुनाते थे ताकि कामयाबी के ये उसूल याद रहें।
Q. क्या यह सूरह सिर्फ मुसलमानों के लिए है?
यह सूरह पूरी इंसानियत के लिए एक पैगाम है। इसमें कामयाबी के जो उसूल बताए गए हैं (ईमान, नेक अमल, हक़ और सब्र), वो हर इंसान के लिए दुनिया और आखिरत में कामयाबी की कुंजी हैं।
नतीजा (Conclusion)
सूरह अस्र हमें सिखाती है कि हमारी ज़िन्दगी का हर लम्हा कीमती है। अगर हम इन चार उसूलों (ईमान, नेक अमल, हक़ और सब्र) को अपनी ज़िन्दगी में अपना लें, तो हम दुनिया और आखिरत, दोनों में घाटे से बच सकते हैं।
अल्लाह हमें इन बातों पर अमल करने की तौफीक दे। आमीन।





