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Surah Araf in Hindi: सूरह आराफ़ की फजीलत और पहली 50 आयतें

Surah Araf in Hindi: जानिए सूरह आराफ़ की फजीलत और पहली 50 आयतों का हिंदी तर्जुमा। इसमें आदम (अ.स.) और इबलीस का वाकिया तफसील से है।

Surah Araf in Hindi: सूरह आराफ़ की फजीलत और पहली 50 आयतें

Table of Contents

सूरह आराफ़ (Surah Al-A’raf) कुरान मजीद की सातवीं सूरह है। “आराफ़” का मतलब है “ऊंचाइयां” (The Heights), जो जन्नत और जहन्नम के बीच की एक जगह है। यह मक्का में नाज़िल हुई (मक्की सूरह) और इसमें 206 आयतें हैं।

यह सूरह इस्लाम के बुनियादी अकीदों को मज़बूत करती है। इसमें हज़रत आदम (अ.स.) और इबलीस (शैतान) का किस्सा, और कई दूसरे नबियों (जैसे नूह, हूद, सालेह, लूत, शोएब और मूसा अलैहिमुस्सलाम) के वाकयात तफसील से बयान किए गए हैं।

इस आर्टिकल में हम Surah Araf in Hindi, इसकी अहमियत और पहली 50 आयतों का तर्जुमा जानेंगे।

ये भी पढ़े: Surah Anam in Hindi | सूरह अनआम का तर्जुमा

सूरह आराफ़ की अहमियत (Importance of Surah Al-A’raf)

  1. इंसान की हकीकत: यह सूरह हमें बताती है कि इंसान का असल दुश्मन शैतान है और वह हमें कैसे बहकाता है।
  2. नबियों के किस्से: इसमें पिछली कौमों का हाल बयान किया गया है जिन्होंने अपने नबियों को झुठलाया और अज़ाब का शिकार हुए। यह हमारे लिए एक सबक है।
  3. तौहीद का पैगाम: यह सूरह शिर्क का रद्द करती है और सिर्फ एक अल्लाह की इबादत का पैगाम देती है।

Surah Araf Ayat 1-50 in Hindi

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

  1. अलिफ़-लाम-मीम-साद।
    (अलिफ़-लाम-मीम-साद।)

  2. किताबुन उनज़िला इलौका फला यकुन फी सदरिका हरजुम मिन्हु लि-तुनज़िरा बिही व ज़िकरा लिल-मुअ्मिनीन।
    ((ऐ नबी!) यह एक किताब है जो आप पर नाज़िल की गई है, तो आपके सीने में इससे कोई तंगी नहीं होनी चाहिए, ताकि आप इसके ज़रिए (लोगों को) डराएं और यह मोमिनों के लिए नसीहत है।)

  3. इत्तबिऊ मा उनज़िला इलैकुम मिर रब्बिकुम वला तत्तबिऊ मिन दूनिही औलिया, क़लीलम मा तज़क्करून।
    (उसकी पैरवी करो जो तुम्हारे रब की तरफ से तुम पर नाज़िल किया गया है और उसके सिवा दूसरे दोस्तों (सरपरस्तों) की पैरवी न करो, तुम बहुत कम नसीहत हासिल करते हो।)

  4. व कम मिन क़रयतिन अहलक्नाहा फ-जा-अहा बअ्सुना बयातन औ हुम क़ाइलून।
    (और कितनी ही बस्तियां हैं जिन्हें हमने हलाक कर दिया, तो उन पर हमारा अज़ाब रात को आया या जब वो दोपहर को आराम कर रहे थे।)

  5. फमा काना दअ्वाहुम इज़ जा-अहुम बअ्सुना इल्ला अन क़ालू इन्ना कुन्ना ज़ालिमीन।
    (तो जब उन पर हमारा अज़ाब आया तो उनकी पुकार इसके सिवा कुछ न थी कि उन्होंने कहा: बेशक हम ही ज़ालिम थे।)

  6. फ-ल-नस्-अलन्नल लज़ीना उर्सिला इलैहिम व ल-नस्-अलन्नल मुरसलीन।
    (तो हम ज़रूर उन लोगों से पूछेंगे जिनकी तरफ (रसूल) भेजे गए थे और हम ज़रूर रसूलों से भी पूछेंगे।)

  7. फ-ल-नकुस्सन्न अलैहिम बि-इल्मिंव व मा कुन्ना गा-इबीन।
    (फिर हम ज़रूर उनके सामने अपने इल्म से (सब कुछ) बयान कर देंगे, और हम कहीं गायब नहीं थे।)

  8. वल वज़्नु यौमइज़िनिल हक़्क़, फ-मन सकुलत मवाज़ीनूहू फ-उलाइका हुमुल मुफ़लिहून।
    (और उस दिन (आमाल का) वज़न होना हक़ है, तो जिनके पलड़े भारी होंगे वही लोग कामयाब होंगे।)

  9. व मन खफ्फत मवाज़ीनूहू फ-उलाइकल लज़ीना खसिरू अनफुसहुम बिमा कानू बि-आयातिना यज़लिमून।
    (और जिनके पलड़े हल्के होंगे तो यही वो लोग हैं जिन्होंने अपनी जानों को घाटे में डाला क्योंकि वो हमारी आयतों के साथ ज़ुल्म करते थे।)

  10. व लक़द मक्कन्नाकुम फिल अर्ज़ि व ज-अल्ना लकुम फीहा मआइश, क़लीलम मा तश्कुरून।
    (और बेशक हमने तुम्हें ज़मीन में ठिकाना दिया और तुम्हारे लिए उसमें गुज़र-बसर का सामान बनाया, तुम बहुत कम शुक्र करते हो।)

  11. व लक़द ख़लक़नाकुम सुम्मा सव्वर्नाकुम सुम्मा कुल्ना लिल-मलाइकतिस्जुदू लि-आदमा फ-सजदू इल्ला इबलीस, लम यकुम मिनस साजिदीन।
    (और बेशक हमने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हारी सूरत बनाई, फिर हमने फरिश्तों से कहा: आदम को सज्दा करो, तो सबने सज्दा किया सिवाय इबलीस के, वो सज्दा करने वालों में से न हुआ।)

  12. क़ाला मा मन-अका अल्ला तस्जुदा इज़ अमर्तुक, क़ाला अना खैरूम मिन्ह, ख़लक़्तनी मिन नारिंव व ख़लक़्तहू मिन तीन।
    ((अल्लाह ने) फरमाया: तुझे किस चीज़ ने रोका कि तूने सज्दा नहीं किया जब मैंने तुझे हुक्म दिया? वो बोला: मैं उससे बेहतर हूँ, तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया।)

  13. क़ाल फहबित मिन्हा फमा यकूनु लका अन ततकब्बरा फीहा फखरुज इन्नका मिनस सागिरीन।
    (फरमाया: तो यहाँ से उतर जा, तेरे लिए जायज़ नहीं कि तू यहाँ तकब्बुर (घमंड) करे, तो निकल जा, बेशक तू ज़लील लोगों में से है।)

  14. क़ाला अन्ज़िरनी इला यौमि युब-असून।
    (वो बोला: मुझे उस दिन तक मोहलत दे जब लोग उठाए जाएंगे।)

  15. क़ाला इन्नका मिनल मुन्ज़रीन।
    (फरमाया: बेशक तू मोहलत दिए गए लोगों में से है।)

  16. क़ाला फ-बिमा अगवैतनी ल-अक़-उदन्न लहुम सिरातकल मुस्तक़ीम।
    (वो बोला: तो चूँकि तूने मुझे गुमराह किया है, मैं ज़रूर उनके लिए तेरे सीधे रास्ते पर बैठूंगा।)

  17. सुम्मा ल-आतियन्नहुम मिम बैनि ऐदीहिम व मिन खल्फिहिम व अन ऐमानिहिम व अन शमा-इलिहिम, वला तजिदु अकसरहुम शाकिरीन।
    (फिर मैं ज़रूर उनके पास आऊंगा उनके आगे से और उनके पीछे से और उनकी दाईं तरफ से और उनकी बाईं तरफ से, और तू उनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार नहीं पाएगा।)

  18. क़ालखरुज मिन्हा मज़-ऊमम मदहूरा, ल-मन तबि-अका मिन्हुम ल-अम्ल-अन्ना जहन्नमा मिन्कुम अजमईन।
    (फरमाया: यहाँ से निकल जा, ज़लील और धुतकारा हुआ, बेशक उनमें से जो तेरी पैरवी करेगा, मैं ज़रूर तुम सबसे जहन्नम को भर दूंगा।)

  19. व या आदमुस्कुन अन्ता व ज़ौजुकल जन्नता फ-कुला मिन हैसु शिअ्तुमा वला तक़रबा हाज़िहिश्-श-जरता फ-तकूना मिनज़ ज़ालिमीन।
    (और ऐ आदम! तुम और तुम्हारी बीवी जन्नत में रहो, फिर जहाँ से चाहो खाओ और इस दरख्त के करीब न जाना वरना तुम ज़ालिमों में से हो जाओगे।)

  20. फ-वस्वसा लहुमश शैतानु लि-युब्दिया लहुमा मा वूरिया अन्हुमा मिन सौ-आतिहिमा व क़ाला मा नहाकुमा रब्बु कुमा अन हाज़िहिश्-श-जरति इल्ला अन तकूना म-ल-कैनि औ तकूना मिनल खालिदीन।
    (फिर शैतान ने उन्हें बहकाया ताकि उनकी शर्मगाहें जो उनसे छुपाई गई थीं, उनके लिए ज़ाहिर कर दे, और कहा: तुम्हारे रब ने तुम्हें इस दरख्त से सिर्फ इसलिए रोका है कि कहीं तुम फरिश्ते न बन जाओ या हमेशा रहने वालों में से न हो जाओ।)

  21. व क़ा-समहुमा इन्नी लकुमा ल-मिनन नासिहीन।
    (और उसने उन दोनों से कसम खाई कि बेशक मैं तुम दोनों का खैर-ख्वाह (भला चाहने वाला) हूँ।)

  22. फ-दल्लाहुमा बि-गुरूर, फ-लम्मा ज़ाक़श्-श-जरता बदत लहुमा सौ-आतुहुमा व तफिक़ा यखसिफानि अलैहिमा मिंव-व-रक़िल जन्नह, व नादाहुमा रब्बुहुमा अलम अन्हकुमा अन तिलकुमश्-श-जरति व अकुल लकुमा इन्नश शैताना लकुमा अदुव्वुम मुबीन।
    (तो उसने धोखे से उन दोनों को नीचे उतार लिया, फिर जब उन्होंने दरख्त (का फल) चखा तो उनकी शर्मगाहें उन पर ज़ाहिर हो गईं और वो अपने ऊपर जन्नत के पत्ते लपेटने लगे, और उनके रब ने उन्हें पुकारा: क्या मैंने तुम्हें उस दरख्त से नहीं रोका था और तुमसे नहीं कहा था कि बेशक शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?)

  23. क़ाला रब्बना ज़लम्ना अनफुसना व इल्लम तगफिर लना व तरहम्ना ल-नकूनन्न मिनल खासिरिन।
    (दोनों ने कहा: ऐ हमारे रब! हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया, और अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर रहम न किया तो हम ज़रूर घाटा उठाने वालों में से हो जाएंगे।)

  24. क़ालहबितू बअ्ज़ुकुम लि-बअ्ज़िन अदुव्व, व लकुम फिल अर्ज़ि मुस्तक़र्रुंव व मताउन इला हीन।
    (फरमाया: उतर जाओ, तुम एक-दूसरे के दुश्मन हो, और तुम्हारे लिए ज़मीन में एक वक़्त तक ठिकाना और फायदा उठाना है।)

  25. क़ाला फीहा तहयौना व फीहा तमूतूना व मिन्हा तुखरजून।
    (फरमाया: उसी में तुम जियोगे और उसी में मरोगे और उसी से तुम निकाले जाओगे।)

  26. या बनी आदमा क़द अन्ज़ल्ना अलैकुम लिबासंय युवारी सौ-आतिकुम व रीशा, व लिबासुत तक़वा ज़ालिका खैर, ज़ालिका मिन आयातिल्लाहि ल-अल्लहुम यज़्ज़क्करून।
    (ऐ आदम की औलाद! हमने तुम पर लिबास उतारा है जो तुम्हारी शर्मगाहों को छुपाता है और ज़ीनत (सजावट) भी है, और तक़वे का लिबास, वो सबसे बेहतर है। ये अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वो नसीहत हासिल करें।)

  27. या बनी आदमा ला यफ्तिनन्नकुमुश शैतानु कमा अख़रजा अबवौकुम मिनल जन्नति यन्ज़िउ अन्हुमा लिबासहूमा लि-युरियहुमा सौ-आतिहिमा, इन्नहू यराकुम हुवा व क़बीलूहु मिन हैसु ला तरौनहुम, इन्ना ज-अल्नश शयातीना औलिया-अ लिल्लज़ीना ला युअ्मिनून।
    (ऐ आदम की औलाद! शैतान तुम्हें हरगिज़ फितने में न डाले जैसा उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकाल दिया, उनसे उनका लिबास उतरवा दिया ताकि उन्हें उनकी शर्मगाहें दिखाए। बेशक वो और उसका कबीला तुम्हें वहां से देखते हैं जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। बेशक हमने शैतानों को उन लोगों का दोस्त बनाया है जो ईमान नहीं लाते।)

  28. व इज़ा फ-अलू फाहिशतन क़ालू वजदना अलैहा आबा-अना वल्लाहु अमरना बिहा, कुल इन्नल्लाहा ला यअ्मुरु बिल फहशा, अ-तकूलूना अलल्लाहि मा ला तअ्लमून।
    (और जब वो कोई बेहयाई का काम करते हैं तो कहते हैं: हमने अपने बाप-दादा को इसी पर पाया और अल्लाह ने हमें इसका हुक्म दिया है। कह दीजिए: बेशक अल्लाह बेहयाई का हुक्म नहीं देता। क्या तुम अल्लाह पर वो बात कहते हो जो तुम नहीं जानते?)

  29. कुल अमरा रब्बी बिल क़िस्त, व अक़ीमू वुजूहकुम इन्द कुल्लि मस्जिदिंव वदऊहु मुखलिसीना लहुद दीन, कमा ब-द-अकुम तऊदून।
    (कह दीजिए: मेरे रब ने इंसाफ का हुक्म दिया है, और हर सज्दे के वक़्त अपने चेहरे सीधे रखो और दीन को उसके लिए खालिस करके उसे पुकारो, जैसे उसने तुम्हें शुरू में पैदा किया वैसे ही तुम लौटोगे।)

  30. फरीक़न हदा व फरीक़न हक़्क़ा अलैहिमुज़ ज़लालाह, इन्नहुमुत्तखज़ुश शयातीना औलिया-अ मिन दूनिल्लाहि व यहसबूना अन्नहुम मुहतदून।
    (एक गिरोह को उसने हिदायत दी और एक गिरोह पर गुमराही साबित हो गई, बेशक उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना दोस्त बना लिया और समझते हैं कि वो हिदायत पर हैं।)

  31. या बनी आदमा खुज़ू ज़ीनतकुम इन्द कुल्लि मस्जिदिंव व कुलू वशरबू वला तुसरिफू, इन्नहू ला युहिब्बुल मुसरिफीन।
    (ऐ आदम की औलाद! हर नमाज़ के वक़्त अपनी ज़ीनत (लिबास) ले लिया करो, और खाओ और पियो और फुज़ूलखर्ची न करो, बेशक वो फुज़ूलखर्ची करने वालों को पसंद नहीं करता।)

  32. क़ुल मन हर्रमा ज़ीनतल्ला हिल लती अख़रजा लि-इबादिही वत तय्यिबाति मिनर रिज़्क़, कुल हिया लिल्लज़ीना आमनू फिल हयातिद दुनिया खालिसतय यौमल क़ियामह, कज़ालिका नुफस्सिलुल आयाति लि-क़ौमिय यअ्लमून।
    (कह दीजिए: किसने हराम की अल्लाह की वो ज़ीनत जो उसने अपने बंदों के लिए निकाली और पाकीज़ा रिज़्क़? कह दीजिए: ये दुनिया की ज़िन्दगी में ईमान वालों के लिए है, और कयामत के दिन तो खालिस उन्हीं के लिए होगी। इसी तरह हम आयतें खोल-खोल कर बयान करते हैं उन लोगों के लिए जो जानते हैं।)

  33. क़ुल इन्नमा हर्रमा रब्बियल फवाहिशा मा ज़हरा मिन्हा वमा बतन वल इस्मा वल बगया बिगैरिल हक़्क़ि व अन तुशरिकू बिल्लाहि मा लम युनज़्ज़िल बिही सुल्तानंव व अन तकूलू अलल्लाहि मा ला तअ्लमून।
    (कह दीजिए: मेरे रब ने तो सिर्फ बेहयाई की बातों को हराम किया है, जो उनमें से ज़ाहिर हैं और जो छुपी हैं, और गुनाह को और नाहक ज़्यादती को, और ये कि तुम अल्लाह के साथ उसे शरीक ठहराओ जिसकी उसने कोई दलील नहीं उतारी, और ये कि तुम अल्लाह पर वो बात कहो जो तुम नहीं जानते।)

  34. व लि-कुल्लि उम्मतिन अजल, फ-इज़ा जा-अ जलुहुम ला यस्तअ्खिरूना सा-अतंव वला यस्तक़दिमून।
    (और हर उम्मत के लिए एक मुद्दत है, तो जब उनकी मुद्दत आ जाएगी तो वो एक घड़ी न पीछे हो सकेंगे और न आगे।)

  35. या बनी आदमा इम्मा यअ्तियन्नकुम रुसुलुम मिन्कुम यकुस्सूना अलैकुम आयाती फ-मनित्तका व अस्लहा फला खौफुन अलैहिम वला हुम यहज़नून।
    (ऐ आदम की औलाद! अगर तुम्हारे पास तुम ही में से रसूल आएं जो तुम्हें मेरी आयतें सुनाएं, तो जो डरेगा और अपनी इस्लाह कर लेगा तो उन पर न कोई खौफ है और न वो गमगीन होंगे।)

  36. वल्लज़ीना कज़्ज़बू बि-आयातिना वस्तक्बरू अन्हा उलाइका अस्हाबुन नार, हुम फीहा खालिदून।
    (और जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे तकब्बुर किया, वही आग वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे।)

  37. फ-मन अज़लमु मिम्मानिफ्तरा अलल्लाहिल कज़िबन औ कज़्ज़बा बि-आयातिह, उलाइका यनालुहुम नसीबुहुम मिनल किताब, हत्ता इज़ा जा-अतहुम रुसुलुना यतवफ्फौनहुम क़ालू अइन मा कुन्तुम तदऊना मिन दूनिल्लाह, क़ालू ज़ल्लू अन्ना व शहिदू अला अनफुसिहिम अन्नहुम कानू काफिरीन।
    (तो उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ बांधे या उसकी आयतों को झुठलाए? यही वो लोग हैं जिन्हें किताब में से उनका हिस्सा पहुंचेगा, यहाँ तक कि जब हमारे भेजे हुए (फरिश्ते) उनकी जान निकालने आएंगे तो कहेंगे: कहाँ हैं वो जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते थे? वो कहेंगे: वो हमसे खो गए, और अपनी जानों के खिलाफ गवाही देंगे कि वो काफिर थे।)

  38. क़ालदखुलू फी उममिन क़द गलत मिन क़ब्लिकुम मिनल जिन्नि वल इन्सि फिन नार, कुल्लमा दखलत उम्मतुल ल-अनत उख्तहा, हत्ता इज़द-दारकू फीहा जमीअन क़ालत उखराहुम लि-ऊलाहुम रब्बना हा-उलाइ अज़ल्लूना फ-आतिहिम अज़ाबन ज़ीअ्फम मिनन नार, क़ाला लि-कुल्लिन ज़ीअ्फंव व लाकिल ला तअ्लमून।
    (फरमाएगा: दाखिल हो जाओ आग में उन उम्मतों के साथ जो तुमसे पहले गुज़र चुकी हैं जिन्नों और इंसानों में से। जब भी कोई उम्मत दाखिल होगी तो अपनी (जैसी दूसरी) उम्मत पर लानत करेगी, यहाँ तक कि जब सब उसमें जमा हो जाएंगे तो उनकी पिछली (उम्मत) अपनी पहली (उम्मत) के बारे में कहेगी: ऐ हमारे रब! इन्हीं लोगों ने हमें गुमराह किया था तो इन्हें आग का दुगना अज़ाब दे। फरमाएगा: सबके लिए दुगना है लेकिन तुम नहीं जानते।)

  39. व क़ालत ऊलाहुम लि-उखराहुम फमा काना लकुम अलैना मिन फज़लिन फ-ज़ूक़ुल अज़ाबा बिमा कुन्तुम तकसिबून।
    (और उनकी पहली (उम्मत) अपनी पिछली (उम्मत) से कहेगी: तो तुम्हें हम पर कोई फजीलत नहीं, तो अज़ाब चखो उस वजह से जो तुम कमाते थे।)

  40. इन्नल लज़ीना कज़्ज़बू बि-आयातिना वस्तक्बरू अन्हा ला तुफत्तहु लहुम अबवाबुस समा-इ वला यदखुलूनल जन्नता हत्ता यलिजल जमलु फी सम्मिल खियात, व कज़ालिका नज्ज़िल मुजरिमीन।
    (बेशक जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे तकब्बुर किया, उनके लिए आसमान के दरवाज़े नहीं खोले जाएंगे और वो जन्नत में दाखिल नहीं होंगे जब तक कि ऊंट सुई के नाके से न गुज़र जाए, और हम मुजरिमों को ऐसा ही बदला देते हैं।)

  41. लहुम मिन जहन्नमा मिहादुंव व मिन फौक़िहिम गवाश, व कज़ालिका नज्ज़िज़ ज़ालिमीन।
    (उनके लिए जहन्नम का बिछौना है और उनके ऊपर से ओढ़ना (भी आग का) है, और हम ज़ालिमों को ऐसा ही बदला देते हैं।)

  42. वल्लज़ीना आमनू व अमिलुस सालिहाति ला नुकल्लिफु नफ्सन इल्ला वुसअहा उलाइका अस्हाबुल जन्नह, हुम फीहा खालिदून।
    (और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल किए - हम किसी जान पर उसकी ताकत से ज़्यादा बोझ नहीं डालते - वही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे।)

  43. व न-ज़अ्ना मा फी सुदूरिहिम मिन गिल्लिन तजरी मिन तहतिहिमुल अनहार, व क़ालुल हम्दु लिल्लाहिल लज़ी हदाना लि-हाज़ा वमा कुन्ना लि-नहतदिया लौला अन हदानल्लाह, लक़द जा-अत रुसुलु रब्बिना बिल हक़्क़, व नूदू अन तिलकुमुल जन्नतु ऊरिस्तुमूहा बिमा कुन्तुम तअ्मलून।
    (और हम उनके सीनों से कीना निकाल देंगे, उनके नीचे नहरें बह रही होंगी, और वो कहेंगे: सब तारीफें अल्लाह के लिए हैं जिसने हमें इसकी हिदायत दी और हम हिदायत नहीं पा सकते थे अगर अल्लाह हमें हिदायत न देता। बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लेकर आए थे। और उन्हें पुकारा जाएगा कि ये वो जन्नत है जिसके तुम वारिस बनाए गए हो उस वजह से जो तुम अमल करते थे।)

  44. व नादा अस्हाबुल जन्नति अस्हाबन नारि अन क़द वजदना मा व-अ-दना रब्बुना हक़्क़न फ-हल वजत्तुम मा व-अ-दा रब्बुकुम हक़्क़ा, क़ालू नअम, फ-अज़्ज़ना मुअज़्ज़िनुम बैनहुम अन लअ्नतुल्लाहि अलज़ ज़ालिमीन।
    (और जन्नत वाले जहन्नम वालों को पुकारेंगे कि बेशक हमने उसे सच पाया जो हमारे रब ने हमसे वादा किया था, तो क्या तुमने भी उसे सच पाया जो तुम्हारे रब ने वादा किया था? वो कहेंगे: हाँ। फिर एक पुकारने वाला उनके दरमियान पुकारेगा कि ज़ालिमों पर अल्लाह की लानत हो।)

  45. अल्लज़ीना यसुद्दूना अन सबीलिल्लाहि व यबगूनहा इवजा, व हुम बिल आखिरति काफिरून।
    (जो अल्लाह के रास्ते से रोकते थे और उसमें टेढ़ापन तलाश करते थे, और वो आखिरत के मुनकिर थे।)

  46. व बैनहुमा हिजाब, व अलल अअराफि रिजालुय यअ्रिफूना कुल्लम बि-सी माहुम, व नादौ अस्हाबल जन्नति अन सलामुन अलैकुम, लम यदखुलूहा व हुम यतमऊन।
    (और उन दोनों (जन्नत और जहन्नम) के दरमियान एक पर्दा (आराफ़) है, और आराफ़ पर कुछ लोग होंगे जो हर एक को उनकी निशानियों से पहचानेंगे, और वो जन्नत वालों को पुकारेंगे कि तुम पर सलाम हो, वो (अभी) उसमें दाखिल नहीं हुए होंगे और वो उम्मीद रखते होंगे।)

  47. व इज़ा सुरिफत अबसारुहुम तिलका-अ अस्हाबिन नारि क़ालू रब्बना ला तज-अल्ना म-अल कौमिज़ ज़ालिमीन।
    (और जब उनकी निगाहें जहन्नम वालों की तरफ फेरी जाएंगी तो कहेंगे: ऐ हमारे रब! हमें ज़ालिम कौम के साथ न कर।)

  48. व नादा अस्हाबुल अअराफि रिजालय यअ्रिफूनहुम बि-सी माहुम क़ालू मा अगना अंकुम जम्उकुम वमा कुन्तुम तस्तक्बिरून।
    (और आराफ़ वाले कुछ लोगों को पुकारेंगे जिन्हें वो उनकी निशानियों से पहचानते होंगे, कहेंगे: तुम्हारी जमात और तुम्हारा तकब्बुर तुम्हारे कुछ काम न आया।)

  49. अ-हा-उलाइल लज़ीना अक्सम्तुम ला यनालुहुमुल्लाहु बि-रहमह, उदखुलुल जन्नता ला खौफुन अलैकुम वला अन्तुम तहज़नून।
    (क्या ये वही लोग हैं जिनके बारे में तुम कसमें खाते थे कि अल्लाह उन पर रहमत नहीं करेगा? (उनसे कहा जाएगा) जन्नत में दाखिल हो जाओ, तुम पर न कोई खौफ है और न तुम गमगीन होगे।)

  50. व नादा अस्हाबुन नारि अस्हाबल जन्नति अन अफीज़ू अलैना मिनल मा-इ औ मिम्मा र-ज़-क़-कुमुल्लाह, क़ालू इन्नल्लाहा हर्रमहुमा अलल काफिरीन।
    (और जहन्नम वाले जन्नत वालों को पुकारेंगे कि हम पर थोड़ा पानी डाल दो या उसमें से जो अल्लाह ने तुम्हें रिज़्क़ दिया है। वो कहेंगे: बेशक अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें काफिरों पर हराम कर दी हैं।)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. सूरह आराफ़ मक्की है या मदनी?
A. सूरह आराफ़ एक मक्की सूरह है। यह हिजरत से पहले मक्का में नाज़िल हुई थी।
Q. आराफ़ (A'raf) का क्या मतलब है?
A.

आराफ़ का मतलब है “ऊंचाइयां”। यह जन्नत और जहन्नम के बीच एक दीवार या ऊंची जगह है जहाँ वो लोग होंगे जिनके नेक और बुरे आमाल बराबर होंगे।

Q. सूरह आराफ़ का खास मौज़ू (Topic) क्या है?
A.

इस सूरह का मुख्य विषय अल्लाह की तौहीद, नबियों के किस्से और आखिरत का बयान है। यह हमें शैतान के धोखे से आगाह करती है।


नतीजा (Conclusion)

सूरह आराफ़ हमें इंसान की पैदाइश के मकसद और उसके असल दुश्मन (शैतान) से आगाह करती है। इसकी आयतें हमें पिछली कौमों की गलतियों से सबक सीखने और अल्लाह के सीधे रास्ते पर चलने की दावत देती हैं।

अल्लाह हमें कुरान को समझकर पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफीक दे। आमीन।

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