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Surah Al-Mutaffifin in Hindi: सूरह मुतफ्फिफिन की फजीलत और तर्जुमा

Surah Al-Mutaffifin in Hindi: जानिए सूरह मुतफ्फिफिन की फजीलत और हिंदी तर्जुमा। इस सूरह में नाप-तोल में कमी करने वालों के लिए सख्त चेतावनी है।

Surah Al-Mutaffifin in Hindi: सूरह मुतफ्फिफिन की फजीलत और तर्जुमा

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सूरह अल-मुतफ्फिफिन (Surah Al-Mutaffifin) कुरान मजीद की 83वीं सूरह है। “मुतफ्फिफिन” का मतलब है “नाप-तोल में कमी करने वाले” (The Defrauders)। यह मक्का में नाज़िल हुई (मक्की सूरह) और इसमें 36 आयतें हैं।

यह सूरह कारोबारी ईमानदारी (Business Ethics) पर बहुत जोर देती है। इसमें उन लोगों को सख्त चेतावनी दी गई है जो लेते वक्त तो पूरा माल लेते हैं, लेकिन देते वक्त डंडी मारते हैं या कम तोलते हैं। अल्लाह फरमाता है कि क्या उन्हें याद नहीं कि उन्हें एक बड़े दिन (कयामत) अपने रब के सामने खड़ा होना है? इसके अलावा, इसमें नेक लोगों के इनाम और बुरे लोगों के अंजाम का भी ज़िक्र है।

इस आर्टिकल में हम Surah Al-Mutaffifin in Hindi, इसका तर्जुमा और फजीलत आसान लफ्ज़ों में जानेंगे।

ये भी पढ़े: Surah Al-Inshiqaq in Hindi | सूरह इन्शिकाक का तर्जुमा

सूरह मुतफ्फिफिन की फजीलत (Benefits of Surah Al-Mutaffifin)

  1. ईमानदारी का सबक: यह सूरह हमें सिखाती है कि कारोबार और लेन-देन में ईमानदारी रखना मुसलमान होने की पहचान है। धोखा देना बहुत बड़ा गुनाह है।

  2. सिज्जीन और इल्लियीन: इसमें दो रजिस्टरों का ज़िक्र है - सिज्जीन (जिसमें गुनहगारों के आमाल लिखे हैं) और इल्लियीन (जिसमें नेक लोगों के आमाल लिखे हैं)।

  3. कयामत का खौफ: यह सूरह याद दिलाती है कि दुनिया का हर छोटा-बड़ा धोखा अल्लाह के इल्म में है और उसका हिसाब देना होगा।

  4. जन्नत की नेमतें: नेक लोगों को “तस्नीम” (जन्नत की एक खास शराब) पिलाई जाएगी और वो ऊंचे तख्तों पर बैठकर नज़ारे करेंगे।


Surah Al-Mutaffifin in Hindi (Transliteration & Translation)

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

  1. वैलुल-लिल-मुतफ्फिफिन।
    (बड़ी खराबी (तबाही) है नाप-तोल में कमी करने वालों के लिए।)

  2. अल्लज़ीना इज़क्तालू अलन्-नासि यस्तौफून।
    (जो लोगों से नाप कर लेते हैं तो पूरा लेते हैं।)

  3. व इज़ा कालूहुम अव-वज़नूहुम युख़-सिरून।
    (और जब उन्हें नाप कर या तोल कर देते हैं तो कम देते हैं।)

  4. अला यज़ुन्नु उलाइका अन्नहुम-मब्-ऊसून।
    (क्या उन्हें गुमान (यकीन) नहीं कि वो उठाए जाएंगे?)

  5. लि-यौमिन अज़ीम।
    (एक बड़े दिन के लिए।)

  6. यौमा यक़ूमुन-नासु लि-रब्बिल-आलमीन।
    (जिस दिन सब लोग रब-बुल-आलमीन (जहानों के रब) के सामने खड़े होंगे।)

  7. कल्ला इन्ना किताबल-फुज्जारी ल-फी सिज्जीन।
    (हरगिज़ नहीं! बेशक बदकारों का नाम-ए-आमाल ‘सिज्जीन’ में है।)

  8. व मा अद्राका मा सिज्जीन।
    (और तुम्हें क्या मालूम कि ‘सिज्जीन’ क्या है?)

  9. किताबुम-मरक़ूम।
    (एक लिखी हुई किताब (दफ्तर) है।)

  10. वैलुंय-यौमइज़िल-लिल-मुकज़्ज़िबीन।
    (उस दिन झुठलाने वालों के लिए तबाही है।)

  11. अल्लज़ीना युकज़्ज़िबून बि-यौमिद-दीन।
    (जो बदला (कयामत) के दिन को झुठलाते हैं।)

  12. व मा युकज़्ज़िबु बिही इल्ला कुल्लु मुअ्तदिन असीम।
    (और उसे वही झुठलाता है जो हद से बढ़ने वाला, गुनहगार है।)

  13. इज़ा तुत्ला अलैहि आयातुना क़ाला असातीरुल-अव्वलीन।
    (जब उस पर हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो कहता है: “ये तो पहले लोगों की कहानियां हैं।”)

  14. कल्ला बल राना अला कुलूबिहिम मा कानू यक्सिबून।
    (हरगिज़ नहीं! बल्कि उनके दिलों पर उनके बुरे कामों की वजह से जंग (Rust) लग गया है।)

  15. कल्ला इन्नहुम अर-रब्बिहिम यौमइज़िल-ल-महजूबून।
    (हरगिज़ नहीं! बेशक वो उस दिन अपने रब (के दीदार) से रोक दिए जाएंगे।)

  16. सुम्मा इन्नहुम ल-सालुल-जहीम।
    (फिर बेशक वो भड़कती हुई आग में दाखिल होंगे।)

  17. सुम्मा युक़ालु हाज़ल्लज़ी कुन्तुम बिही तुकज़्ज़िबून।
    (फिर उनसे कहा जाएगा: “यही है वो जिसे तुम झुठलाते थे।”)

  18. कल्ला इन्ना किताबल-अबरारि ल-फी इल्लिय्यीन।
    (हरगिज़ नहीं! बेशक नेक लोगों का नाम-ए-आमाल ‘इल्लियीन’ में है।)

  19. व मा अद्राका मा इल्लिय्यून।
    (और तुम्हें क्या मालूम कि ‘इल्लियीन’ क्या है?)

  20. किताबुम-मरक़ूम।
    (एक लिखी हुई किताब है।)

  21. यश्हदुहुल-मुक़र्रबून।
    (जिसे मुकर्रब (करीबी) फरिश्ते देखते हैं।)

  22. इन्नल-अबरारा ल-फी नईम।
    (बेशक नेक लोग नेमतों (आराम) में होंगे।)

  23. अलल-अरा-इकि यन्ज़ुरून।
    (तख्तों पर बैठे देख रहे होंगे।)

  24. तअ्रिफु फी वुजूहिहिम नज़रतन-नईम।
    (तुम उनके चेहरों पर नेमतों की ताज़गी पहचान लोगे।)

  25. युस्क़ौना मिर-रहीक़िम-मख़्तूम।
    (उन्हें मुहर लगी हुई खालिस शराब पिलाई जाएगी।)

  26. ख़ितामुहू मिस्क; व फी ज़ालिका फ़ल-यतनफ़सिल-मुतनफ़िसून।
    (जिसकी मुहर कस्तूरी (Musk) की होगी; और इसी (नेमत) के लिए ललचाने वालों को ललचाना चाहिए (मुकाबला करना चाहिए)।)

  27. व मिज़ाजुहू मिन तस्नीम।
    (और उसमें ‘तस्नीम’ की मिलावट होगी।)

  28. अइनंय-यश्रबु बिहल-मुक़र्रबून।
    (वह एक चश्मा है जिससे मुकर्रब (अल्लाह के करीबी) लोग पिएंगे।)

  29. इन्नल-लज़ीना अजरमू कानू मिनल्लज़ीना आमनू यज़हकून।
    (बेशक मुजरिम लोग (दुनिया में) ईमान वालों पर हंसा करते थे।)

  30. व इज़ा मर्रू बिहिम यतगामज़ून।
    (और जब उनके पास से गुज़रते तो आपस में इशारे करते थे।)

  31. व इज़न्क़लबू इला अह्-लिहिमुन्क़लबू फ़किहीन।
    (और जब अपने घर वालों की तरफ लौटते तो मजे लेते हुए लौटते थे।)

  32. व इज़ा र-अौहुम क़ालू इन्ना हा-उला-इ ल-ज़ाल-लून।
    (और जब उन्हें (मुसलमानों को) देखते तो कहते: “बेशक ये लोग भटक गए हैं।”)

  33. व मा उर्सिलू अलैहिम हाफ़िज़ीन।
    (हालांकि वो उन पर निगराान बनाकर नहीं भेजे गए थे।)

  34. फ़ल-यौमल-लज़ीना आमनू मिनल-कुफ्फारि यज़हकून।
    (तो आज (कयामत के दिन) ईमान वाले काफिरों पर हंसेंगे।)

  35. अलल-अरा-इकि यन्ज़ुरून।
    (तख्तों पर बैठे देख रहे होंगे।)

  36. हल सुव्विबल-कुफ्फारु मा कानू यफ़-अलून।
    (क्या काफिरों को उनके किए का बदला मिल गया?)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. सूरह मुतफ्फिफिन का मतलब क्या है?
A.

“मुतफ्फिफिन” का मतलब है “नाप-तोल में कमी करने वाले”। यह उन लोगों के बारे में है जो अपना हक तो पूरा लेते हैं लेकिन दूसरों को देते वक्त बेईमानी करते हैं।

Q. 'सिज्जीन' और 'इल्लियीन' क्या हैं?
A.

सिज्जीन एक जगह या रजिस्टर है जहाँ बदकार और गुनहगार लोगों के आमाल लिखे जाते हैं (यह कैदखाने जैसा है)। इल्लियीन एक बहुत ऊंची जगह या रजिस्टर है जहाँ नेक और अच्छे लोगों के आमाल लिखे जाते हैं।

Q. इस सूरह का असल पैगाम क्या है?
A.

इस सूरह का असल पैगाम यह है कि हमें हर हाल में ईमानदारी रखनी चाहिए, चाहे वह कारोबार हो या आम ज़िंदगी। जो लोग दुनिया में दूसरों का हक मारते हैं और ईमान वालों का मज़ाक उड़ाते हैं, आखिरत में उनका अंजाम बहुत बुरा होगा।


नतीजा (Conclusion)

सूरह मुतफ्फिफिन हमें एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई (Social Evil) से रोकती है - और वह है बेईमानी। अल्लाह ने साफ कर दिया है कि जो लोग नाप-तोल में डंडी मारते हैं, उनके लिए तबाही है।

आज हम देखते हैं कि लोग थोड़ा सा नफा कमाने के लिए झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं। यह सूरह हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया का नफा बहुत मामूली है, लेकिन आखिरत का नुकसान बहुत बड़ा है। हमें चाहिए कि हम सच्चा और ईमानदार बनें।

अल्लाह हमें हलाल रोज़ी कमाने और हर किस्म की बेईमानी से बचने की तौफीक दे। आमीन।

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