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Surah Al Hashr in Hindi - सूरह हश्र हिंदी तर्जुमा और फजीलत
Surah Al Hashr in Hindi (सूरह हश्र): पढ़िए सूरह हश्र का हिंदी तर्जुमा, तफसीर और इसकी आखिरी 3 आयतों की फजीलत। जानिए यह सूरह कब और क्यों नाज़िल हुई।

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सूरह हश्र (Surah Al-Hashr) कुरान मजीद की 59वीं सूरह है। यह मदीना में नाज़िल हुई (मदनी सूरह) है और इसमें 24 आयतें हैं।
इस सूरह का नाम ‘अल-हश्र’ है जिसका मतलब है “इकट्ठा करना” या “निकाल बाहर करना” (Exile/Gathering)। यह सूरह बनू नज़ीर (एक यहूदी कबीला) की गद्दारी और उनके मदीना से निकाले जाने के वाकये पर नाज़िल हुई।
इस आर्टिकल में हम Surah Hashr in Hindi, इसका हिंदी तर्जुमा और इसकी आखिरी 3 आयतों की फजीलत जानेंगे।
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Surah Al Hashr Hindi Tarjuma (Translation)
यहाँ सूरह हश्र का हिंदी उच्चारण (Transliteration) और तर्जुमा दिया गया है।
बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम
(शुरू अल्लाह के नाम से जो बहुत बड़ा मेहरबान व निहायत रहम वाला है)
1. सब्बह लिल्लाहि मा फिस्समावाति व मा फिल्अर्जि व हुवल अ़ज़ीजुल हकीम
जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है (सब) अल्लाह की तस्बीह करती हैं और वही ग़ालिब हिकमत वाला है।
2. हुवल्लज़ी अख़रजल्लज़ीन कफ़रू मिन् अह़्लिल किताबि मिन् दियारिहिम् लि अव्वलिल हशरि…
वही तो है जिसने अहले किताब (बनू नज़ीर) के काफिरों को उनके घरों से पहले ही हश्र (देश-निकाले) में निकाल बाहर किया। तुम्हें गुमान भी न था कि वे निकलेंगे और वे समझते थे कि उनके किले उन्हें अल्लाह से बचा लेंगे। मगर अल्लाह (का अज़ाब) उन पर वहां से आया जहाँ से उनका ख्याल भी न था और उनके दिलों में रौब डाल दिया। वे अपने घरों को अपने हाथों और मोमिनों के हाथों से उजाड़ने लगे। तो ऐ आँखों वालों! इबरत हासिल करो।
3. व लौ ला अन् कतबल्लाहु अ़लैहिमुल् जलाअ लअ़ज़्ज़बहुम् फिद्दुन्या, व लहुम् फ़िल आख़िरति अ़ज़ाबुन्नार
और अगर अल्लाह ने उनकी किसमत में जिला-वतनी (देश निकाला) न लिखा होता तो उन पर दुनिया में भी (दूसरी तरह) अज़ाब करता और आख़िरत में तो उन पर जहन्नुम का अज़ाब है ही।
4. ज़ालिक बि अन्नहुम् शाक़्कुल्लाह व रसूलहू…
ये इसलिए कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की और जिसने अल्लाह की मुख़ालेफ़त की तो (याद रहे कि) अल्लाह बड़ा सख्त अज़ाब देने वाला है।
5. मा क़तअ्तुम् मिल्लीनतिन् औ तरक्तुमूहा का़इमतन् अ़ला उसूलिहा…
(मोमिनों) खजूर का दरख्त जो तुमने काट डाला या ज्यों का त्यों उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो अल्लाह ही के हुक्म से था, और मकसद ये था कि वह नाफरमानों को रूसवा करे।
6. व मा अफ़ा अल्लाहु अ़ला रसूलिही मिन्हुम् फ़मा औजफ़्तुम् अ़लैहि मिन् खैलिंव्…
(तो) जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को उन लोगों से (बिना लड़े) दिलवा दिया उसमें तुम्हारा हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर अल्लाह अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फरमाता है और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।
7. मा अफा अल्लाहु अ़ला रसूलिही मिन् अहलिल कुरा फ़ लिल्लाहि व लिर्रसूलि…
तो जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को बस्तियों वालों से दिलवाया है वह ख़ास अल्लाह और उसके रसूल और (रसूल के) रिश्तेदारों और यतीमों और मोहताजों और मुसाफिरों का है ताकि जो लोग तुममें से दौलतमन्द हैं, दौलत उन्हीं के बीच न घूमती रहे। और जो तुमको रसूल दें, वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे रुक जाओ और अल्लाह से डरते रहो, बेशक अल्लाह सख्त अज़ाब देने वाला है।
8. लिल्फु क़राइल मुहाजिरीनल्लज़ीन उख़्रिजू मिन् दियारिहिम् व अम्वालिहिम्…
(इस माल में) उन गरीब मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले गए, जो अल्लाह के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और अल्लाह की और उसके रसूल की मदद करते हैं, यही लोग सच्चे हैं।
9. वल्लज़ीन तबब्वउद्दार वलईमान मिन् क़ब्लिहिम् युहिब्बून मन् हाजर इलैहिम्…
और (उनका भी हिस्सा है) जो लोग मुहाजिरों से पहले (हिजरत के) घर (मदीना) में आबाद हैं और ईमान लाए, और जो लोग हिजरत करके उनके पास आए उनसे मोहब्बत करते हैं और जो कुछ उनको मिला उसके लिए अपने दिलों में कोई जलन नहीं पाते और चाहे अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो दूसरों को अपने नफ्स पर तरजीह देते हैं। और जो शख़्श अपने नफ्स की कंजूसी से बचा लिया गया तो ऐसे ही लोग कामयाब हैं।
10. वल्लज़ीन जाऊ मिम्बअ्दिहिम् यकूलून रब्बनग़्फिर लना व लि इख़्वानिनल्लज़ीन सबकूना बिल ईमानी…
और (उनका भी हिस्सा है) जो लोग उनके बाद आए (और) दुआ करते हैं कि “ऐ हमारे परवरदिगार! हमारी और उन लोगों की मग़फिरत कर जो हमसे पहले ईमान ला चुके और मोमिनों की तरफ से हमारे दिलों में किसी तरह का कीना (बैर) न आने दे। ऐ हमारे रब! बेशक तू बड़ा शफीक़ निहायत रहम वाला है।”
11. अलम् तर इलल्लज़ीन नाफ़कू यकूलून लि इख़्वानिहिमुल्लज़ीन कफ़रू मिन् अह़्लिल किताबि…
क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफ़िर भाइयों अहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम (घरों से) निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ (ज़रूर) निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की बात न मानेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर अल्लाह गवाही देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं।
12. ल इन उख़्रिजू ला यख़्रुजून मअ़हुम् व ल इन कूतिलू ला यन्सुरूनहुम्…
अगर वे निकाले भी जाएँ तो ये (मुनाफिक) उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुई तो उनकी मदद भी न करेंगे और अगर मदद करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे, फिर उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी।
13. ल अन्तुम् अशद्दु रहबतन् फी सुदूरिहिम् मिनल्लाहि…
(मोमिनों) तुम्हारे डर उनके दिलों में अल्लाह से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते।
14. ला युक़ातिलूनकुम् जमीअ़न् इल्ला फ़ी कुरम् मुहस्सनतिन् औ मिंव्वराइ जुदुरिन…
ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या दीवारों की आड़ में। इनकी आपस में तो बड़ी लड़ाई है, तुम ख्याल करोगे कि सब के सब (एक जान) हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं। ये इस वजह से कि ये लोग बेअक्ल हैं।
15. कमसलिल्लज़ीन मिन् क़ब्लिहिम् क़रीबन् ज़ाकू व बाल अम्रिहिम् व लहुम् अ़ज़ाबुन् अलीम
उनका हाल उन लोगों जैसा है जो उनसे कुछ ही पहले अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।
16. कमसलिश्शैतानि इज् काल लिल इन्सानिक्फुर…
(मुनाफ़िकों) की मिसाल शैतान जैसी है कि इन्सान से कहता रहा कि काफ़िर हो जाओ, फिर जब वह काफ़िर हो गया तो कहने लगा मैं तुमसे बरी (अलग) हूँ, मैं सारे जहाँ के परवरदिगार अल्लाह से डरता हूँ।
17. फ़कान आ़किबतहुमा अन्नहुमा फ़िन्नारि ख़ालिदैनि फ़ीहा…
तो दोनों का अंजाम ये हुआ कि दोनों दोज़ख़ में (डाले) जाएँगे और उसमें हमेशा रहेंगे और यही तमाम ज़ालिमों की सज़ा है।
18. या अय्युहल्लज़ीन आमनुत्तकुल्लाह वल्तन्जुर् नफ़्सुम मा क़द्दमत लि ग़दिन्…
ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो, और हर शख़्श को ग़ौर करना चाहिए कि कल (क़यामत) के वास्ते उसने पहले से क्या भेजा है और अल्लाह ही से डरते रहो बेशक जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे बाख़बर है।
19. व ला तकूनू कल्लज़ीन नसुल्लाह फ़ अन्साहुम् अन्फुसहुम्…
और उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो अल्लाह को भुला बैठे तो अल्लाह ने उन्हें ऐसा कर दिया कि वह अपने आपको भूल गए, यही लोग तो नाफरमान हैं।
20. ला यस्तवी अस्हाबुन्नारि व अस्हाबुल जन्नति…
जहन्नुमी और जन्नती बराबर नहीं हो सकते, जन्नती लोग ही तो कामयाबी हासिल करने वाले हैं।
21. लौ अन्ज़ल्ना हाज़ल कुरआन अ़ला जबलिल लरऐतहू ख़ाशिअ़म् मुतसद्दिअ़म् मिन् ख़श्यतिल्लाह…
अगर हम इस क़ुरान को किसी पहाड़ पर (भी) नाज़िल करते तो तुम उसको देखते कि अल्लाह के डर से झुका और फटा जाता है। ये मिसालें हम लोगों (के समझाने) के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें।
सूरह हश्र की आखिरी 3 आयतें (Surah Hashr Last 3 Ayat)
सूरह हश्र की आखिरी 3 आयतों की बहुत फजीलत है। हदीस में आता है कि जो सुबह के वक़्त इन्हें पढ़ेगा, 70 हज़ार फरिश्ते उसके लिए दुआ करेंगे।
22. हुवल्लाहुल्लज़ी ला इलाह इल्ला हुव आ़लिमुल गै़बि वश्शहादति हुवर रहमानुर रहीम
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, छिपे और खुले का जानने वाला, वही बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है।
23. हुवल्लाहुल्लज़ी ला इलाह इल्ला हुवल मलिकुल कुद्दूसुस सलामुल मुअ्मिनुल मुहैमिनुल अज़ीजुल जब्बारुल मुतकब्बिर, सुब्हानल्लाहि अ़म्मा युश्रिकून
वही वह अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं। (हक़ीक़ी) बादशाह, पाक ज़ात, सलामती देने वाला, अमन देने वाला, निगेहबान, ग़ालिब, ज़बरदस्त, बड़ाई वाला। अल्लाह पाक है उससे जो लोग (उसका) शरीक ठहराते हैं।
24. हुवल्लाहुल् ख़ालिकुल् बारिउल् मुसव्विरु लहुल अस्माउल हुस्ना, युसब्बिहु लहू मा फ़िस्समावाति वल्अर्जि व हुवल अ़ज़ीजुल हकीम
वही अल्लाह (तमाम चीज़ों का) पैदा करने वाला, वजूद में लाने वाला, सूरतें बनाने वाला है। उसी के लिए अच्छे-अच्छे नाम हैं। जो चीज़ें आसमानों और ज़मीन में हैं सब उसी की तसबीह करती हैं, और वही ग़ालिब हिकमत वाला है।
Surah Al Hashr in Arabic
यहाँ पर सूरह हश्र अरबी टेक्स्ट (Arabic Text) में दी गई है।
سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ 1
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مِن دِيَـٰرِهِمْ لِأَوَّلِ ٱلْحَشْرِ ۚ مَا ظَنَنتُمْ أَن يَخْرُجُوا۟ ۖ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُم مَّانِعَتُهُمْ حُصُونُهُم مِّنَ ٱللَّهِ فَأَتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِنْ حَيْثُ لَمْ يَحْتَسِبُوا۟ ۖ وَقَذَفَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلرُّعْبَ ۚ يُخْرِبُونَ بُيُوتَهُم بِأَيْدِيهِمْ وَأَيْدِى ٱلْمُؤْمِنِينَ فَٱعْتَبِرُوا۟ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَبْصَـٰرِ 2
وَلَوْلَآ أَن كَتَبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمُ ٱلْجَلَآءَ لَعَذَّبَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابُ ٱلنَّارِ 3
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَآقُّوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ ۖ وَمَن يُشَآقِّ ٱللَّهَ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ 4
مَا قَطَعْتُم مِّن لِّينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَآئِمَةً عَلَىٰٓ أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ ٱللَّهِ وَلِيُخْزِىَ ٱلْفَـٰسِقِينَ 5
6 وَمَآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ مِنْهُمْ فَمَآ أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍۢ وَلَا رِكَابٍۢ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُۥ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
7 مَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ مِنْ أَهْلِ ٱلْقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ كَىْ لَا يَكُونَ دُولَةًۢ بَيْنَ ٱلْأَغْنِيَآءِ مِنكُمْ ۚ وَمَآ ءَاتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمْ عَنْهُ فَٱنتَهُوا۟ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
8 لِلْفُقَرَآءِ ٱلْمُهَـٰجِرِينَ ٱلَّذِينَ أُخْرِجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَأَمْوَٰلِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنًۭا وَيَنصُرُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلصَّـٰدِقُونَ
9 وَٱلَّذِينَ تَبَوَّءُو ٱلدَّارَ وَٱلْإِيمَـٰنَ مِن قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ إِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ فِى صُدُورِهِمْ حَاجَةًۭ مِّمَّآ أُوتُوا۟ وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌۭ ۚ وَمَن يُوقَ شُحَّ نَفْسِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
10 وَٱلَّذِينَ جَآءُو مِنۢ بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَٰنِنَا ٱلَّذِينَ سَبَقُونَا بِٱلْإِيمَـٰنِ وَلَا تَجْعَلْ فِى قُلُوبِنَا غِلًّۭا لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ رَبَّنَآ إِنَّكَ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌ
11 أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ نَافَقُوا۟ يَقُولُونَ لِإِخْوَٰنِهِمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًۭا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَٱللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
12 لَئِنْ أُخْرِجُوا۟ لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا۟ لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ ٱلْأَدْبَـٰرَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
13 لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةًۭ فِى صُدُورِهِم مِّنَ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَفْقَهُونَ
14 لَا يُقَـٰتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِى قُرًۭى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَآءِ جُدُرٍۭ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌۭ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًۭا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَعْقِلُونَ
15 كَمَثَلِ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًۭا ۖ ذَاقُوا۟ وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
16 كَمَثَلِ ٱلشَّيْطَـٰنِ إِذْ قَالَ لِلْإِنسَـٰنِ ٱكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّنكَ إِنِّىٓ أَخَافُ ٱللَّهَ رَبَّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
17 فَكَانَ عَـٰقِبَتَهُمَآ أَنَّهُمَا فِى ٱلنَّارِ خَـٰلِدَيْنِ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَٰٓؤُا۟ ٱلظَّـٰلِمِينَ
18 يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌۭ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍۢ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
19 وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ نَسُوا۟ ٱللَّهَ فَأَنسَىٰهُمْ أَنفُسَهُمْ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
20 لَا يَسْتَوِىٓ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ وَأَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۚ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
21 لَوْ أَنزَلْنَا هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ عَلَىٰ جَبَلٍۢ لَّرَأَيْتَهُۥ خَـٰشِعًۭا مُّتَصَدِّعًۭا مِّنْ خَشْيَةِ ٱللَّهِ ۚ وَتِلْكَ ٱلْأَمْثَـٰلُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
22 هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۖ هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلرَّحِيمُ
23 هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْمَلِكُ ٱلْقُدُّوسُ ٱلسَّلَـٰمُ ٱلْمُؤْمِنُ ٱلْمُهَيْمِنُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْجَبَّارُ ٱلْمُتَكَبِّرُ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
24 هُوَ ٱللَّهُ ٱلْخَـٰلِقُ ٱلْبَارِئُ ٱلْمُصَوِّرُ ۖ لَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ ۚ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. सूरह हश्र कुरान के कौन से पारे में है?
Q. सूरह हश्र मक्की है या मदनी?
Q. सूरह हश्र पढ़ने के क्या फायदे हैं?
इसकी आखिरी 3 आयतें पढ़ने से 70,000 फरिश्ते दुआ करते हैं और शहादत का दर्जा मिलता है।
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