·
Iffat Zia
·5 min read·

Surah Al-Fajr in Hindi: सूरह फज्र की फजीलत और तर्जुमा

Surah Al-Fajr in Hindi: जानिए सूरह फज्र की फजीलत और हिंदी तर्जुमा। इस सूरह में अल्लाह ने फज्र की कसम खाई है और इत्मीनान वाली रूह (Nafs al-Mutmainnah) की खुशखबरी दी है।

Surah Al-Fajr in Hindi: सूरह फज्र की फजीलत और तर्जुमा

Table of Contents

सूरह अल-फज्र (Surah Al-Fajr) कुरान मजीद की 89वीं सूरह है। “फज्र” का मतलब है “भोर” या “सुबह” (The Dawn)। यह मक्का में नाज़िल हुई (मक्की सूरह) और इसमें 30 आयतें हैं।

यह सूरह बहुत ही प्रभावशाली है। इसकी शुरुआत में अल्लाह तआला ने फज्र और दस रातों की कसम खाई है। इसमें पिछली कौमों (आद, समूद और फिरौन) के बुरे अंजाम का ज़िक्र है जिन्होंने ज़मीन पर फसाद मचाया था। इसके साथ ही अल्लाह ने इंसान की फितरत बताई है कि वह दौलत मिलने पर घमंड करता है और गरीबी में ना-उम्मीद हो जाता है। आखिर में, अल्लाह ने नेक रूहों (Nafs al-Mutmainnah) को जन्नत की खुशखबरी दी है।

इस आर्टिकल में हम Surah Al-Fajr in Hindi, इसका तर्जुमा और फजीलत आसान लफ्ज़ों में जानेंगे।

ये भी पढ़े: Surah Al-Balad in Hindi | सूरह बलद का तर्जुमा

सूरह फज्र की फजीलत (Benefits of Surah Al-Fajr)

  1. ज़ालिमों का अंजाम: यह सूरह हमें याद दिलाती है कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। आद, समूद और फिरौन जैसी ताकतवर कौमें भी अल्लाह के अज़ाब से नहीं बच सकीं।

  2. माल की आज़माइश: अल्लाह बताता है कि अमीरी और गरीबी दोनों अल्लाह की तरफ से इम्तिहान हैं। असली इज़्ज़त दौलत में नहीं, बल्कि अल्लाह की ताबेदारी में है।

  3. यतीमों और गरीबों का ख्याल: इस सूरह में उन लोगों की मज़म्मत (बुराई) की गई है जो यतीमों की इज़्ज़त नहीं करते और गरीबों को खाना नहीं खिलाते।

  4. सुकून वाली रूह: सूरह के आखिर में “नफ़्स-ए-मुत्मुइन्ना” (संतुष्ट आत्मा) का ज़िक्र है, जिसे मौत के वक्त अल्लाह की रज़ा और जन्नत की खुशखबरी मिलती है।


Surah Al-Fajr in Hindi (Transliteration & Translation)

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

  1. वल-फज्र।
    (कसम है फज्र (सुबह) की।)

  2. व लयालिन अश्र।
    (और दस रातों की (ज़ुल-हिज्जा की दस रातें)।)

  3. वश-शफ्इ वल-वत्र।
    (और जुफ्त (जोड़े) और ताक (फुटकर) की।)

  4. वल-लैलि इज़ा यसर।
    (और रात की जब वह चलने लगे (गुज़रने लगे)।)

  5. हल फी ज़ालिका क़स-मुल-लिज़ी हिज्र।
    (क्या इसमें अक्लमंद के लिए कोई (बड़ी) कसम है?)

  6. अलम तरा कैफ़ा फ़-अला रब्बुका बि-आद।
    (क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे रब ने ‘आद’ (कौम) के साथ क्या किया?)

  7. इरमा ज़ातिल-इमाद।
    (इरम (कौम) के साथ जो बड़े सुतूनों (खंभों) वाले थे।)

  8. अल्लती लम युख़्लक़ मिस्लुहा फिल-बिलाद।
    (जिनके जैसा शहरों में कोई पैदा नहीं किया गया।)

  9. व समूदल-लज़ीना जाबुस-सख़्रा बिल-वाद।
    (और समूद के साथ जिन्होंने घाटी में चट्टानें तराशी थीं।)

  10. व फिर-औना ज़िल-औताद।
    (और फिरौन के साथ जो मेखों (किले/लश्कर) वाला था।)

  11. अल्लज़ीना तग़ौ फिल-बिलाद।
    (जिन्होंने शहरों में सरकशी (जुल्म) मचा रखी थी।)

  12. फ़-अक्सरू फीहल-फ़साद।
    (और उनमें बहुत फसाद फैलाया था।)

  13. फ़-सब्बा अलैहिम रब्बुका सौता अज़ाब।
    (तो तुम्हारे रब ने उन पर अज़ाब का कोड़ा बरसा दिया।)

  14. इन्ना रब्बका ल-बिल-मिर्साद।
    (बेशक तुम्हारा रब घात में (निगरानी में) है।)

  15. फ़-अम्मल-इन्सातु इज़ा मब्तलाहु रब्बुहू फ़-अक्रमहू व न-अमहू फ़-यक़ूलु रब्बी अक्रमन।
    (तो इंसान का हाल यह है कि जब उसका रब उसे आज़माता है और उसे इज़्ज़त और नेमत देता है, तो वह कहता है: “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी।”)

  16. व अम्मा इज़ा मब्तलाहु फ़-क़दरा अलैहि रिज़्क़हू फ़-यक़ूलु रब्बी अहानन।
    (और जब वह उसे आज़माता है और उस पर उसकी रोज़ी तंग कर देता है, तो वह कहता है: “मेरे रब ने मुझे ज़लील कर दिया।”)

  17. कल्ला बल-ला तुक्रिमूनल-यतीम।
    (हरगिज़ नहीं! बल्कि तुम यतीम की इज़्ज़त नहीं करते।)

  18. व ला तहाज़्ज़ूना अला त-आमिल-मिस्कीन।
    (और मिस्कीन (गरीब) को खाना खिलाने पर एक-दूसरे को नहीं उभारते।)

  19. व ताकुलूनत-तुरासा अक्लन-लम्मा।
    (और विरासत का सारा माल समेट कर खा जाते हो।)

  20. व तुहिब्बूनल-माला हुब्बन-जम्मा।
    (और माल से बहुत ज़्यादा मोहब्बत करते हो।)

  21. कल्ला इज़ा दुक्कतिल-अर्ज़ु दक्कन-दक्का।
    (हरगिज़ नहीं! जब ज़मीन कूट-कूट कर बराबर कर दी जाएगी।)

  22. व जा-अ रब्बुका वल-मलकु सफ्फन-सफ्फा।
    (और तुम्हारा रब आएगा और फरिश्ते सफ-दर-सफ (कतारों में) होंगे।)

  23. व जी-अ यौमइज़िम-बि-जहन्नम; यौमइज़िन यतज़क्करुल-इन्सानु व अन्ना लहुज़-ज़िक्रा।
    (और उस दिन जहन्नम सामने लाई जाएगी; उस दिन इंसान नसीहत पकड़ेगा, मगर अब नसीहत (समझने) का क्या फायदा?)

  24. यक़ूलु या लयतनी क़द्दम-तु लि-हयाती।
    (वह कहेगा: “काश! मैंने अपनी (असली) ज़िंदगी के लिए कुछ आगे भेजा होता।”)

  25. फ़-यौमइज़िल-ला यु-अज़्ज़िबु अज़ाबहू अहद।
    (तो उस दिन अल्लाह जैसा अज़ाब कोई नहीं दे सकेगा।)

  26. व ला यूसिकु वसाक़हू अहद।
    (और न उसके जैसा कोई जकड़ सकेगा।)

  27. या अय्यतुहन-नफ़्सुल-मुत्मुइन्ना।
    (ऐ इत्मीनान वाली रूह!)

  28. इर्जिई इला रब्बिकी रा-ज़ियतम-मर-ज़िय्या।
    (लौट चल अपने रब की तरफ, तू उससे राज़ी और वह तुझसे राज़ी।)

  29. फ़द-खुली फी इबादी।
    (तो मेरे (नेक) बंदों में शामिल हो जा।)

  30. वद-खुली जन्नती।
    (और मेरी जन्नत में दाखिल हो जा।)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. सूरह फज्र का मतलब क्या है?
A.

“फज्र” का मतलब “सुबह” या “भोर” होता है। यह अंधेरे के बाद उजाले के आने की निशानी है। अल्लाह ने इसकी कसम खाकर यह बताया है कि हर अंधेरे (जुल्म) के बाद उजाला (इंसाफ) ज़रूर आता है।

Q. 'दस रातों' (Layalin Ashr) से क्या मुराद है?
A.

ज्यादातर मुफस्सिरीन (विद्वानों) के मुताबिक, “दस रातों” से मुराद ज़ुल-हिज्जा के पहले दस दिन हैं, जो हज के दिन हैं और बहुत फजीलत वाले हैं। कुछ का मानना है कि यह रमज़ान की आखिरी दस रातें हैं।

Q. नफ़्स-ए-मुत्मुइन्ना (Nafs al-Mutmainnah) क्या है?
A.

यह वह रूह (आत्मा) है जिसे अल्लाह पर पूरा भरोसा और यकीन होता है। वह अल्लाह के फैसलों पर राज़ी रहती है और गुनाहों से बचती है। मौत के वक्त फरिश्ते उसे जन्नत की खुशखबरी देते हैं।

Q. इस सूरह में माल (Wealth) के बारे में क्या कहा गया है?
A.

इस सूरह में बताया गया है कि माल का होना अल्लाह की रज़ा की निशानी नहीं है, और न ही गरीबी अल्लाह की नाराज़गी है। यह सिर्फ एक इम्तिहान है। असली बुराई यह है कि इंसान माल की मोहब्बत में यतीमों और गरीबों का हक मार ले।


नतीजा (Conclusion)

सूरह फज्र हमें दुनिया और आखिरत की हकीकत समझाती है। दुनिया में बड़े-बड़े जालिम आए और मिट गए, लेकिन अल्लाह का कानून हमेशा बाकी है।

हमें चाहिए कि हम माल की मोहब्बत में अंधे न हों, बल्कि यतीमों और गरीबों का ख्याल रखें। हमें अपनी रूह को “नफ़्स-ए-मुत्मुइन्ना” बनाने की कोशिश करनी चाहिए - यानी ऐसा दिल जो अल्लाह की याद में सुकून पाए और उसकी रज़ा पर खुश रहे।

अल्लाह हमें नेक अमल करने और सुकून वाली रूह के साथ दुनिया से जाने की तौफीक दे। आमीन।

    Share:

    Comments

    Back to Blog