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Shab-e-Barat Ki Haqeeqat: शब-ए-बारात की सच्चाई, बिदअत और गलतफहमियां
Shab-e-Barat Ki Haqeeqat: क्या शब-ए-बारात मनाना साबित है? जानिए 15 शाबान की फजीलत, हलवा-पुरी, आतिशबाज़ी और कब्रिस्तान जाने की असल हकीकत कुरान और हदीस की रौशनी में।

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इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने शाबान (Shaban) की 15वीं रात को “शब-ए-बारात” (Shab-e-Barat) कहा जाता है। हमारे समाज में इस रात को लेकर बहुत सी गलतफहमियां और रस्में (Rituals) जुड़ गई हैं जिनका दीन-ए-इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है।
इस आर्टिकल में हम कुरान और सही हदीस की रौशनी में Shab-e-Barat Ki Haqeeqat, हलवा-पुरी की रस्म, आतिशबाज़ी और कब्रिस्तान जाने के मसले को समझेंगे।
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शब-ए-बारात की हकीकत (Reality of 15th Shaban)
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि कुरान में “शब-ए-बारात” का कोई ज़िक्र नहीं है। कुछ लोग सूरह दुखन की आयत “लैलतुल मुबारका” (बरकत वाली रात) को शब-ए-बारात कहते हैं, जबकि सही तफसीर के मुताबिक वह शब-ए-कद्र (Laylatul Qadr) है जो रमज़ान में होती है।
हदीस के मामले में, 15वीं शाबान की फजीलत के बारे में जो रिवायतें आती हैं, उनमें से ज़्यादातर ज़ईफ़ (कमज़ोर) हैं।
एक रिवायत (जो कुछ हद तक काबिल-ए-कबूल है) में है कि: “अल्लाह तआला 15वीं शाबान की रात को अपनी मखलूक की तरफ मुतवज्जो होता है और मुशरिक (शिर्क करने वाले) और कीना (दिल में बैर) रखने वाले के सिवा सबको माफ़ कर देता है।” (इब्ने माजा)
शब-ए-बारात में की जाने वाली 5 बड़ी गलतियां (Bid’ah)
आजकल इस रात को त्यौहार की तरह मनाया जाता है, जो कि सरासर बिदअत (Innovation) है।
1. हलवा-पुरी बनाना
लोग कहते हैं कि उहुद की जंग में नबी (ﷺ) के दांत शहीद हुए थे, इसलिए उन्होंने हलवा खाया था। यह बिल्कुल मनगढ़ंत बात है। जंग-ए-उहुद शव्वाल के महीने में हुई थी, शाबान में नहीं। हलवा खाने का सवाब या इस रात से कोई लेना-देना नहीं है।
2. आतिशबाज़ी (Fireworks)
पटाखे फोड़ना गैर- मुस्लिमों का तरीका (जैसे दिवाली) है। इस्लाम में इसकी कोई जगह नहीं। यह पैसे की बर्बादी है और शैतानी काम है।
3. कब्रिस्तान में मेला लगाना
हज़रत आयशा (र.अ.) की एक रिवायत है कि नबी (ﷺ) एक बार रात को चुपके से जन्नत-उल-बकी (कब्रिस्तान) गए थे।
- सुन्नत तरीका: अगर कोई जाना चाहे तो अकेले, चुपके से जाकर दुआ कर ले।
- गलत तरीका: पूरी भीड़ जमा करना, अगरबत्ती जलाना, मेला लगाना और इसे त्यौहार बना लेना सुन्नत के खिलाफ है।
4. तकदीर का फैसला (Budget Night)
यह मानना कि इस रात को अगले साल का रिज़्क़ और मौत का फैसला होता है, गलत है। कुरान के मुताबिक तमाम फैसले शब-ए-कद्र (Ramadan) में होते हैं, न कि शाबान में।
5. खास नमाज़ (Salat-ul-Alfia)
100 रकात नमाज़ या कोई खास तरीका इस रात के लिए साबित नहीं है। अगर इबादत करनी है तो नफ़िल नमाज़, कुरान की तिलावत या दुआ अकेले में करें, जमात बनाकर नहीं।
क्या 15 शाबान का रोज़ा रखना चाहिए?
15 शाबान के रोज़े के बारे में कोई सही (Sahih) हदीस मौजूद नहीं है। एक कमज़ोर हदीस है। हाँ, नबी (ﷺ) शाबान के महीने में कसरत से रोज़े रखते थे। और हर महीने के बीच के तीन दिन (13, 14, 15 - अय्याम-ए-बीज़) के रोज़े रखना सुन्नत है। अगर आप इस नीयत से रोज़ा रखें तो सवाब है, लेकिन सिर्फ “शब-ए-बारात का रोज़ा” समझकर रखना साबित नहीं है।
इस रात क्या करना चाहिए? (Recommended Acts)
चूँकि हदीस से साबित है कि इस रात अल्लाह की रहमत मुतवज्जो होती है, तो हमें क्या करना चाहिए?
- तौबा और इस्तिगफार: अपने गुनाहों की सच्चे दिल से माफ़ी मांगें।
- दिल की सफाई: अपने दिल से दूसरों के लिए नफरत, कीना और हसद निकाल दें। हदीस में है कि कीना रखने वाले की मगफिरत नहीं होती।
- दुआ: अपने लिए, अपने घर वालों और पूरी उम्मत के लिए दुआ करें।
- तिलावत: कुरान शरीफ पढ़ें। नोट: ये सारी इबादत अकेले (Individually) अपने घर में करें। मस्जिदों में भीड़ लगाना या चिरागा करना साबित नहीं है।
शब-ए-बारात और शब-ए-कद्र में फर्क
बहुत से लोग शब-ए-बारात (15 शाबान) को शब-ए-कद्र (27 रमज़ान) समझ लेते हैं।
- शब-ए-बारात: शाबान की 15वीं रात है। इसमें मगफिरत का वादा है (कुछ शर्तों के साथ)।
- शब-ए-कद्र: रमज़ान की ताक रातों में होती है। इसमें कुरान नाज़िल हुआ और यह हज़ार महीनों से बेहतर है। तकदीर के फैसले इसी रात (शब-ए-कद्र) में होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या शब-ए-बारात में जागना ज़रूरी है?
नहीं, जागना ज़रूरी नहीं है। अगर आप आसानी से जाग सकें तो इबादत करें, वरना ईशा पढ़कर सो जाएं और फज्र की पाबंदी करें। बिदअत करने से बेहतर है सो जाना।
Q. क्या इस रात रूहें (Souls) घर आती हैं?
यह बिल्कुल गलत अकीदा है। मरने के बाद रूहें ‘बरज़ख’ में चली जाती हैं और कयामत से पहले वापस दुनिया में नहीं आतीं।
Q. क्या शब-ए-बारात में नहाना ज़रूरी है?
नहीं, इस रात के लिए कोई खास गुस्ल (Bath) साबित नहीं है। यह आम रातों की तरह ही एक रात है।
Q. सलातुल तस्बीह पढ़ना कैसा है?
सलातुल तस्बीह एक बहुत फजीलत वाली नमाज़ है, आप इसे कभी भी पढ़ सकते हैं। इसे सिर्फ शब-ए-बारात के लिए खास कर लेना सही नहीं है।
नतीजा (Conclusion)
दोस्तों! दीन में नई चीज़ें पैदा करना (बिदअत) गुमराही है।
- क्या करें: अपने गुनाहों से तौबा करें, दिल से कीना-कपट निकालें, और अल्लाह की इबादत करें (अकेले में)।
- क्या न करें: हलवा, पटाखे, चिरागा, और मेलों से बचें।
अल्लाह हमें दीन की सही समझ अता फरमाए और बिदअत से बचाए। आमीन।
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