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Salat ul Tasbeeh Namaz Ka Tarika: तरीका, दुआ और फ़ज़ीलत
Salat ul Tasbeeh Namaz Ka Tarika: सलातुल तस्बीह (तस्बीह वाली नमाज़) गुनाहों की माफ़ी का बेहतरीन जरिया है। जानिए इसे पढ़ने का सही तरीका, रकात और दुआ।

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सलातुल तस्बीह (Salat-ul-Tasbeeh), जिसे “तस्बीह वाली नमाज़” भी कहा जाता है, एक बहुत ही फज़ीलत वाली नफ़िल नमाज़ है। हमारे प्यारे नबी (ﷺ) ने अपने चाचा हज़रत अब्बास (र.अ) को यह नमाज़ सिखाई थी और फरमाया था कि इसके पढ़ने से अल्लाह अगले-पिछले, नए-पुराने, छोटे-बड़े, जानबूझकर या गलती से किए गए तमाम गुनाह माफ़ फरमा देता है।
इस आर्टिकल में हम Salat ul Tasbeeh Namaz Ka Tarika, इसमें पढ़ी जाने वाली तस्बीह और इसके फ़ायदे आसान हिंदी में जानेंगे।
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सलातुल तस्बीह की तस्बीह (The Tasbeeh)
इस नमाज़ में कुल 300 बार यह तस्बीह पढ़ी जाती है:
“सुभानल्लाहि वल-हम्दु लिल्लाहि व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर” (Subhanallahi Walhamdulillahi Wala Ilaha Illallahu Wallahu Akbar)
(अगर चाहें तो आखिर में ‘व ला हौल व ला कुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम’ भी मिला सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं)।
Salat ul Tasbeeh Namaz Ka Tarika (Step-by-Step)
यह 4 रकात नमाज़ है जिसे एक सलाम के साथ पढ़ा जाता है। हर रकात में 75 बार तस्बीह पढ़ी जाती है (4 x 75 = 300)।
तरीका:
- नियत: “मैं नियत करता हूँ 4 रकात नमाज़ सलातुल तस्बीह की, नफ़िल, वास्ते अल्लाह के…”।
- सना: तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहकर हाथ बांधें और सना पढ़ें।
- तस्बीह (15 बार): सना के बाद और सूरह फातिहा से पहले 15 बार तस्बीह पढ़ें।
- क़िरात: फिर सूरह फातिहा और कोई सूरह पढ़ें।
- तस्बीह (10 बार): सूरह पढ़ने के बाद (रुकू में जाने से पहले) खड़े-खड़े 10 बार तस्बीह पढ़ें।
- रुकू: रुकू में जाएं और ‘सुभान रब्बी-अल अज़ीम’ के बाद 10 बार तस्बीह पढ़ें।
- क़ौमा (खड़े होना): रुकू से उठकर ‘रब्बना लकल हम्द’ के बाद खड़े-खड़े 10 बार तस्बीह पढ़ें।
- पहला सज्दा: सज्दे में जाएं और ‘सुभान रब्बी-अल आला’ के बाद 10 बार तस्बीह पढ़ें।
- जलसा (बैठना): पहले सज्दे से उठकर बैठें और 10 बार तस्बीह पढ़ें।
- दूसरा सज्दा: दूसरे सज्दे में जाएं और ‘सुभान रब्बी-अल आला’ के बाद 10 बार तस्बीह पढ़ें।
(एक रकात में कुल 75 बार हो गई। इसी तरह बाकी 3 रकातें भी पूरी करें।)
नोट: दूसरी रकात के बाद जब अत्तहियात के लिए बैठें, तो तस्बीह नहीं पढ़नी। अत्तहियात के बाद खड़े होकर तीसरी रकात शुरू करें और सना से पहले 15 बार तस्बीह पढ़ें (जैसे पहली रकात में किया था)।
सलातुल तस्बीह की फ़ज़ीलत (Benefits)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (र.अ) से रिवायत है कि रसूल अल्लाह (ﷺ) ने फरमाया: “ऐ चाचा! अगर हो सके तो यह नमाज़ रोज़ाना पढ़ो, अगर रोज़ाना न हो सके तो हफ्ते में एक बार, अगर यह भी न हो सके तो महीने में एक बार, अगर यह भी न हो सके तो साल में एक बार, और अगर यह भी न हो सके तो ज़िंदगी में कम से कम एक बार ज़रूर पढ़ो।” (सुनन अबी दाऊद)
यह नमाज़ गुनाहों की माफ़ी और अल्लाह की रज़ा हासिल करने का बहुत बड़ा जरिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या सलातुल तस्बीह जमात से पढ़ सकते हैं?
नफ़िल नमाज़ की जमात मकरूह है, इसलिए सलातुल तस्बीह अकेले ही पढ़नी चाहिए।
Q. अगर तस्बीह की गिनती भूल जाएं तो क्या करें?
अगर किसी जगह तस्बीह भूल जाएं या कम पढ़ लें, तो उसे अगली जगह (रुकन) में पूरा कर लें। लेकिन रुकू से उठकर और दोनों सज्दों के बीच की तस्बीह को सज्दे में पूरा करें, क़ौमा या जलसा में देर तक न रुकें।
Q. सलातुल तस्बीह का सही वक़्त क्या है?
इसे किसी भी वक़्त पढ़ सकते हैं, सिवाय मकरूह औकात (सूरज निकलने, डूबने और ठीक दोपहर) के। ज़ुहर से पहले या रात के वक़्त पढ़ना बेहतर है।
नतीजा:
सलातुल तस्बीह अल्लाह का एक अनमोल तोहफा है। कोशिश करें कि अपनी ज़िंदगी में इसे मामूल बनाएं, या कम से कम ख़ास मौकों (जैसे शब-ए-बारात, रमज़ान) पर ज़रूर पढ़ें।
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