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Salam Ki Ahmiyat: इस्लाम में सलाम करने की फजीलत और तरीका
Salam Ki Ahmiyat: जानिए इस्लाम में सलाम करने की क्या फजीलत है? सलाम का सही तरीका, जवाब देने का हुक्म और इसके फायदे कुरान और हदीस की रौशनी में।

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सलाम (Salam) इस्लाम का एक बहुत ही खूबसूरत और अहम हिस्सा है। जब दो मुसलमान आपस में मिलते हैं, तो सबसे पहले सलाम करते हैं। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक दूसरे के लिए सलामती की दुआ है।
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया: “तुम जन्नत में दाखिल नहीं होगे जब तक ईमान न लाओ, और तुम मोमिन नहीं हो सकते जब तक आपस में मोहब्बत न करो। क्या मैं तुम्हें ऐसी चीज़ न बताऊँ जिसे करने से तुम आपस में मोहब्बत करने लगो? अपने दरमियान सलाम को आम करो (फैलाओ)।” (सहीह मुस्लिम)
इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि Islam Me Salam Ki Ahmiyat क्या है, इसका सही तरीका क्या है और इसके क्या फायदे हैं।
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इस्लाम में सलाम का मकाम
इस्लाम में सलाम करना सुन्नत है और इसका जवाब देना वाजिब (ज़रूरी) है। अल्लाह तआला ने कुरान में हमें सलाम करने का हुक्म दिया है।
सूरह अन-नूर में अल्लाह फरमाता है: “जब तुम घरों में दाखिल हो तो अपने लोगों को सलाम किया करो, यह अल्लाह की तरफ से एक मुबारक और पाकीज़ा दुआ है।” (सूरह अन-नूर: 61)
अस्सलामु अलैकुम का मतलब (Meaning)
जब हम कहते हैं “अस्सलामु अलैकुम” (Assalamu Alaikum), तो इसका मतलब है: “तुम पर सलामती हो”। यह एक बेहतरीन दुआ है। इसका मतलब है कि अल्लाह तुम्हें हर किस्म की मुसीबत, बीमारी और परेशानी से महफूज़ रखे।
जवाब में हम कहते हैं “व अलैकुम अस्सलाम” (Wa Alaikum Assalam), जिसका मतलब है: “और तुम पर भी सलामती हो”।
सलाम का सवाब (Rewards of Salam)
सलाम करने में पहल करना बहुत सवाब का काम है। हदीस में आता है कि सलाम के अल्फाज़ बढ़ाने से सवाब भी बढ़ता है:
- अस्सलामु अलैकुम: 10 नेकियाँ।
- अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह: 20 नेकियाँ।
- अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू: 30 नेकियाँ।
(सुनन अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
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मुसाफा (Handshake) करने की फजीलत
जब दो मुसलमान मिलते हैं और सलाम के साथ हाथ मिलाते हैं (मुसाफा करते हैं), तो यह और भी बा-बरकत हो जाता है। नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जब दो मुसलमान मिलते हैं और मुसाफा करते हैं, तो उनके जुदा होने से पहले ही उनके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।” (सुनन अबू दाऊद)
सलाम के आदाब (Etiquette of Salam)
इस्लाम ने सलाम करने के कुछ आदाब भी सिखाए हैं:
- सवार (गाड़ी पर चलने वाला) पैदल चलने वाले को सलाम करे।
- पैदल चलने वाला बैठे हुए को सलाम करे।
- छोटी जमात (कम लोग) बड़ी जमात (ज़्यादा लोगों) को सलाम करे।
- छोटा बड़े को सलाम करे।
- घर में दाखिल होते वक़्त घर वालों को सलाम करें।
सलाम से जुड़ी गलतफहमियां
आजकल लोग सलाम में कोताही करते हैं या सिर्फ इशारे से काम चलाते हैं।
- सिर्फ जान-पहचान वालों को सलाम करना: यह कयामत की निशानियों में से है। हमें हर मुसलमान को सलाम करना चाहिए, चाहे हम उसे जानते हों या नहीं।
- हाथ का इशारा: अगर दूर हैं तो हाथ के इशारे के साथ जुबान से भी सलाम के अल्फाज़ कहना ज़रूरी है। सिर्फ हाथ हिलाना काफी नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या गैर-मुस्लिम को सलाम कर सकते हैं?
इस्लामी सलाम (अस्सलामु अलैकुम) खास मुसलमानों के लिए है। गैर-मुस्लिमों से मिलते वक़्त हम आदाब, नमस्ते या हेलो कह सकते हैं। अगर वो सलाम करें तो जवाब में सिर्फ “व अलैकुम” कहना चाहिए।
Q. क्या नमाज़ पढ़ते हुए शख्स को सलाम कर सकते हैं?
नहीं, जो शख्स नमाज़, तिलावत या अज़ान में मशगूल हो, उसे सलाम नहीं करना चाहिए क्योंकि वो जवाब नहीं दे सकता।
Q. सलाम का जवाब देना कितना ज़रूरी है?
सलाम करना सुन्नत है लेकिन उसका जवाब देना वाजिब है। अगर जमात (Group) को सलाम किया गया है, तो उनमें से कोई एक भी जवाब दे दे तो सबका फ़र्ज़ अदा हो जाएगा।
नतीजा (Conclusion)
सलाम आपस में मोहब्बत बढ़ाने और कीना-कपट (नफरत) मिटाने का बेहतरीन नुस्खा है। यह अल्लाह का नाम भी है और जन्नतियों का तोहफा भी। हमें चाहिए कि हम सलाम को खूब फैलाएं और इसमें कंजूसी न करें।
अल्लाह हम सबको सलाम को आम करने की तौफीक दे। आमीन।





