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Iffat Zia
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Quran Ki Hifazat: कुरान की हिफाज़त और अल्लाह का वादा

Quran Ki Hifazat: कुरान एक ऐसी किताब है जिसमें 1400 साल से एक नुक्ते का भी बदलाव नहीं हुआ। जानिए कुरान के नाज़िल होने से लेकर जमा होने तक का पूरा इतिहास।

Quran Ki Hifazat: कुरान की हिफाज़त और अल्लाह का वादा

Table of Contents

क़ुरआन-ए-करीम (Quran Kareem) अल्लाह का वो अज़ीम (महान) कलाम है जो कयामत तक के लिए हिदायत (रास्ता दिखाने) का जरिया है। दुनिया की बाकी आसमानी किताबें (तौरेत, इंजील) वक्त के साथ बदल दी गईं, लेकिन कुरान एक मोजिज़ा (Miracle) है कि 1400 साल गुज़रने के बाद भी इसमें एक ज़बर-ज़ेर का भी फर्क नहीं आया।

इसकी वजह यह है कि इसकी हिफाज़त का ज़िम्मा खुद अल्लाह ने लिया है।

इस आर्टिकल में हम Quran Ki Hifazat, इसके नाज़िल होने का तरीका और इसके जमा (Compile) होने का इतिहास जानेंगे।

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अल्लाह का वादा: कुरान की हिफाज़त

अल्लाह तआला ने कुरान में साफ लफ्ज़ों में फरमाया है:

“إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ”

“इन्ना नहनु नज़्ज़ल-नज़्-ज़िक्रा व इन्ना लहू ल-हाफ़िज़ून”

(बेशक यह ज़िक्र (कुरान) हमने ही नाज़िल किया है और हम ही इसकी हिफाज़त करने वाले हैं।) (सूरह हिज्र: 9)

यही वजह है कि दुश्मन लाख कोशिशों के बावजूद कुरान को मिटा नहीं सके और न ही इसमें कोई बदलाव कर सके।

कुरान कैसे नाज़िल हुआ? (Revelation of Quran)

कुरान एक साथ नाज़िल नहीं हुआ, बल्कि 23 साल के दौरान थोड़ा-थोड़ा करके नाज़िल हुआ।

  1. लौह-ए-महफूज़ से: सबसे पहले कुरान लौह-ए-महफूज़ से दुनिया वाले आसमान पर शब-ए-कद्र (Laylatul Qadr) में उतारा गया।
  2. नबी (ﷺ) पर: फिर वहां से हज़रत जिब्रईल (अ.स.) के ज़रिए ज़रूरत के मुताबिक थोड़ा-थोड़ा करके नबी करीम (ﷺ) पर नाज़िल होता रहा।
  3. पहली वही: सबसे पहली आयतें गारे हिरा (Cave Hira) में नाज़िल हुईं (सूरह अलक की शुरू की 5 आयतें)।

कुरान की हिफाज़त के 2 तरीके

नबी करीम (ﷺ) के ज़माने में कुरान की हिफाज़त दो तरीकों से हुई:

1. सीनों में हिफाज़त (Memorization)

अरब के लोगों का हाफिज़ा (Memory) बहुत तेज़ था। जैसे ही कोई आयत नाज़िल होती, सहाबा उसे फौरन याद कर लेते थे। नबी (ﷺ) खुद भी उसे याद करते और सहाबा को याद कराते। इस तरह कुरान दिलों में महफूज़ हो गया।

2. लिखकर हिफाज़त (Writing)

नबी (ﷺ) ने कुछ सहाबा को लिखने के काम पर लगाया हुआ था, जिन्हें “कातिब-ए-वही” (Revelation Scribes) कहा जाता है। उस ज़माने में कागज़ आम नहीं था, इसलिए कुरान इन चीज़ों पर लिखा जाता था:

  • खजूर की टहनियों पर
  • चमड़े के टुकड़ों पर
  • पत्थरों पर
  • ऊंट की हड्डियों पर

मशहूर कातिबों में हज़रत ज़ैद बिन साबित, हज़रत अली, हज़रत उस्मान और हज़रत मुआविया (र.अ.) शामिल हैं।

कुरान का जमा होना (Compilation History)

नबी (ﷺ) के दुनिया से जाने के बाद तक कुरान लिखा हुआ तो था, लेकिन एक किताब की शक्ल में जमा नहीं था। यह काम बाद में खलीफाओं के दौर में हुआ।

हज़रत अबू बकर (र.अ.) का दौर

जंग-ए-यमामा में जब 700 से ज़्यादा हाफिज़-ए-कुरान सहाबा शहीद हो गए, तो हज़रत उमर (र.अ.) को फिक्र हुई कि कहीं कुरान का कोई हिस्सा जाया न हो जाए। उन्होंने खलीफा हज़रत अबू बकर (र.अ.) को मशवरा दिया कि कुरान को एक जगह जमा किया जाए। हज़रत ज़ैद बिन साबित (र.अ.) की देखरेख में कुरान को एक किताब (Mushaf) की शक्ल में जमा किया गया।

हज़रत उस्मान (र.अ.) का दौर

जब इस्लाम दूर-दूर तक फैल गया, तो लोग कुरान को अलग-अलग लहजों (Dialects) में पढ़ने लगे, जिससे झगड़े होने लगे। हज़रत उस्मान (र.अ.) ने उम्मत को एक ही लहजे (कुरैश के लहजे) पर जमा किया और कुरान की कॉपियां (Copies) बनवाकर अलग-अलग शहरों में भिजवा दीं। इसीलिए हज़रत उस्मान (र.अ.) को “जामि-उल-कुरान” (कुरान जमा करने वाला) कहा जाता है।

सजदा-ए-तिलावत (Sajda Tilawat)

कुरान मजीद में कुल 15 सजदे हैं। जब आप तिलावत करते हुए सजदे वाली आयत पर पहुँचें, तो सजदा करना वाजिब है।

अक्सर हम तिलावत में मगन होते हैं और याद नहीं रहता कि कितने सजदे किए या कौन सा छूट गया।

आपकी आसानी के लिए हमने एक Sajda Counter Tool बनाया है, जिससे आप अपने सजदों का हिसाब रख सकते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. कुरान कितने साल में नाज़िल हुआ?
A. कुरान तकरीबन 23 साल के अरसे में नाज़िल हुआ।
Q. सबसे पहले कुरान किसने जमा किया?
A.

एक किताब की शक्ल में सबसे पहले हज़रत अबू बकर सिद्दीक (र.अ.) के दौर में कुरान जमा किया गया।

Q. कुरान की हिफाज़त का ज़िम्मा किसने लिया है?
A.

अल्लाह तआला ने खुद कुरान की हिफाज़त का ज़िम्मा लिया है (सूरह हिज्र, आयत 9)।


नतीजा (Conclusion)

कुरान अल्लाह का एक ज़िंदा मोजिज़ा (चमत्कार) है। इसकी हिफाज़त का बेहतरीन इंतज़ाम अल्लाह ने “हिफ्ज़” (याद करने) के ज़रिए बनाया है। आज भी दुनिया में लाखों हाफिज़-ए-कुरान मौजूद हैं जिनके सीनों में यह किताब महफूज़ है।

अल्लाह हमें कुरान पढ़ने, समझने और उस पर अमल करने की तौफीक दे। आमीन।

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