· Iffat Zia · Masail  · 4 min read

मोमिन का कत्ल: इस्लाम में सजा और गुनाह (Quran & Hadith)

किसी मोमिन को जानबूझकर कत्ल करने की सजा क्या है? जानिए कुरान और हदीस की रोशनी में इस कबीरा गुनाह की गंभीरता और तौबा की शर्तें।

मोमिन का कत्ल: इस्लाम में सजा और गुनाह (Quran & Hadith)

Table of Contents

इस्लाम एक अमन और शांति का मजहब है। इसमें एक इंसान की जान की कीमत बहुत ज्यादा बताई गई है। अल्लाह तआला ने कुरान में साफ़ फरमाया है कि जिसने किसी एक इंसान को नाहक कत्ल किया, उसने मानो पूरी इंसानियत का कत्ल कर दिया।

आजकल मामूली बातों पर लड़ाई-झगड़े और कत्ल जैसी वारदातें आम हो गई हैं। एक मुसलमान के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मोमिन का कत्ल (Momin ka Qatl) कितना बड़ा गुनाह है और इसकी आखिरत में क्या सजा है।

कुरान में मोमिन के कत्ल की सजा

अल्लाह तआला ने कुरान मजीद में जानबूझकर किसी मोमिन को कत्ल करने वालों के लिए सख्त अज़ाब की वईद सुनाई है।

सूरह अन-निसा में अल्लाह फरमाता है:

“और जो शख्स किसी मुसलमान को जानबूझ कर कत्ल करे, तो उसकी सजा जहन्नम है, जिसमें वो हमेशा रहेगा और उस पर अल्लाह का गज़ब है और अल्लाह ने उस पर लानत की है और उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है।” (सूरह अन-निसा: 93)

इस आयत से पता चलता है कि कत्ल-ए-अम्द (जानबूझकर कत्ल) की सजा कितनी भयानक है:

  1. हमेशा के लिए जहन्नम।
  2. अल्लाह का गज़ब।
  3. अल्लाह की लानत।
  4. बड़ा अज़ाब।

हदीस की रोशनी में कत्ल की गंभीरता

हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (ﷺ) ने भी मुसलमान के खून की हुरमत (सम्मान) को काबा की हुरमत से भी ज़्यादा बताया है।

  1. दुनिया के खात्मे से भी बड़ा गुनाह: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फरमाया:

    “अल्लाह के नज़दीक पूरी दुनिया का खत्म हो जाना किसी मुसलमान के कत्ल किए जाने से ज़्यादा हल्का है।” (सुनन इब्न माजा)

  2. कत्ल करने वाला और कत्ल होने वाला दोनों जहन्नमी: नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जब दो मुसलमान अपनी तलवारें लेकर एक-दूसरे के मुकाबले में आ जाएं, तो कातिल और मकतूल (जिसका कत्ल हुआ) दोनों जहन्नमी हैं।” सहाबा ने पूछा: “या रसूलुल्लाह! कातिल तो जहन्नमी है, लेकिन मकतूल क्यों?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “क्योंकि वो भी अपने साथी को कत्ल करने की पूरी कोशिश कर रहा था।” (सहीह बुखारी)

ये भी पढ़ें: इस्लाम में कबीरा गुनाह और सग़ीरा गुनाह क्या हैं?

क्या कातिल की तौबा कुबूल होती है?

यह एक बहुत ही नाजुक मसला है। उलमा के मुताबिक, कत्ल का मामला हकूक-उल-इबाद (बंदों के हक) से जुड़ा है।

अल्लाह तआला अपने हक (जैसे नमाज़, रोज़ा में कोताही) तो माफ़ कर सकता है, लेकिन बंदों का हक तब तक माफ़ नहीं होता जब तक कि वो बंदा खुद माफ़ न कर दे।

कयामत के दिन मकतूल (जिसका कत्ल हुआ) अपने कातिल को अल्लाह के दरबार में पेश करेगा और कहेगा: “ऐ अल्लाह! इससे पूछ कि इसने मुझे क्यों मारा?”

हालांकि, अगर कोई सच्चे दिल से तौबा करे, अपनी बाकी ज़िन्दगी नेकी में गुज़ारे और अल्लाह से रो-रो कर माफ़ी मांगे, तो अल्लाह गफूर-उर-रहीम है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि अगर मुमकिन हो तो मकतूल के घरवालों से माफ़ी मांगी जाए या उन्हें दियत (Blood Money) अदा की जाए।

खुदकुशी और दूसरों की जान लेना

इस्लाम में जैसे किसी दूसरे की जान लेना हराम है, वैसे ही अपनी जान लेना (खुदकुशी) भी हराम है। ज़िन्दगी अल्लाह की अमानत है और इसमें खयानत करने वाला जहन्नम का हकदार है।

ये भी पढ़ें: मोमिन पर तोहमत लगाने का गुनाह

आजमाइश और सब्र

अक्सर कत्ल गुस्से की हालत में होते हैं। शैतान इंसान को उकसाता है और पल भर के गुस्से में इंसान अपनी दुनिया और आखिरत दोनों बर्बाद कर लेता है।

नबी (ﷺ) ने फरमाया: “पहलवान वो नहीं जो कुश्ती में पछाड़ दे, बल्कि पहलवान वो है जो गुस्से के वक़्त खुद पर काबू रखे।”

अगर कोई आप पर ज़ुल्म करे, तो सब्र करें और मामला अल्लाह पर छोड़ दें। अल्लाह बेहतरीन बदला लेने वाला है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क्या कत्ल करने वाले की नमाज़ कुबूल होती है?
A.

कत्ल एक कबीरा गुनाह है, लेकिन इससे इंसान काफिर नहीं होता (जब तक कि वो कत्ल को हलाल न समझे)। इसलिए उसकी नमाज़ और दूसरी इबादतें कुबूल हो सकती हैं, बशर्ते कि वो सच्चे दिल से तौबा करे। लेकिन कत्ल का गुनाह अपनी जगह बाकी रहता है।

Q. अगर गलती से किसी का कत्ल हो जाए तो क्या हुक्म है?
A.

अगर गलती से कत्ल हो जाए (Qatl-e-Khata), जैसे गाड़ी चलाते वक़्त एक्सीडेंट, तो उस पर कत्ल-ए-अम्द (जानबूझकर कत्ल) वाली सजा नहीं है। लेकिन उसे कफ्फारा अदा करना होगा (जैसे लगातार 2 महीने के रोज़े रखना) और मकतूल के घरवालों को दियत (Blood Money) देनी होगी।

Q. क्या गैर-मुस्लिम का कत्ल करना जायज़ है?
A.

बिल्कुल नहीं। इस्लाम में किसी भी बेगुनाह इंसान का कत्ल हराम है, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम। नबी (ﷺ) ने फरमाया: “जिसने किसी मुआहिद (जिस गैर-मुस्लिम से अमन का समझौता हो) को कत्ल किया, वो जन्नत की खुशबू भी नहीं सूंघ पाएगा।“


नतीजा (Conclusion)

एक मोमिन की जान की कीमत अल्लाह के नज़दीक बहुत ज़्यादा है। हमें चाहिए कि हम अपने गुस्से पर काबू रखें, लड़ाई-झगड़ों से बचें और हर हाल में भाईचारे को कायम रखें। अल्लाह हमें इस बड़े गुनाह से महफूज़ रखे। आमीन।

    Share:
    Back to Blog