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Iffat Zia
· Dua · 5 min read

Karz Se Nijat Ki Dua: क़र्ज़ की अदायगी और परेशानी से नजात की दुआ

Karz Se Nijat Ki Dua in Hindi: जानिए क़र्ज़ से नजात पाने की बेहतरीन मसनून दुआएं। अगर आप पर पहाड़ बराबर भी क़र्ज़ हो, तो अल्लाह उसे अदा करवा देगा।

Karz Se Nijat Ki Dua: क़र्ज़ की अदायगी और परेशानी से नजात की दुआ

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क़र्ज़ (Debt) एक ऐसा बोझ है जो इंसान का सुकून छीन लेता है। यह न सिर्फ माली परेशानी लाता है, बल्कि ज़हनी और रूहानी तौर पर भी इंसान को कमज़ोर कर देता है। इस्लाम में क़र्ज़ लेने से बचने की ताकीद की गई है, लेकिन अगर किसी मजबूरी की वजह से क़र्ज़ हो जाए, तो उसे जल्द से जल्द अदा करने का हुक्म है।

हमारे प्यारे नबी (स.अ.व.) ने क़र्ज़ के बोझ से नजात पाने के लिए बहुत ही खूबसूरत और ताकतवर दुआएं सिखाई हैं।

इस आर्टिकल में हम Karz Se Nijat Ki Dua in Hindi, क़र्ज़ की अदायगी के लिए वज़ीफ़े और कुछ ज़रूरी बातें जानेंगे।

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क़र्ज़ से नजात की सबसे बेहतरीन दुआ (Dua for Debt Relief)

हदीस में आता है कि एक शख्स हज़रत अली (र.अ.) के पास आया और कहा कि मैं क़र्ज़ अदा करने की ताकत नहीं रखता। हज़रत अली (र.अ.) ने फरमाया: “क्या मैं तुम्हें वो दुआ न सिखा दूँ जो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने मुझे सिखाई थी? अगर तुम पर पहाड़ बराबर भी क़र्ज़ होगा तो अल्लाह उसे अदा करवा देगा।”

फिर उन्होंने यह दुआ सिखाई:

अल्लाहुम्मक-फिनी बि-हलालिका अन हरामिक, व अग्निनी बि-फज़लिका अम्मन सिवाक।
(ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपना हलाल रिज़्क़ काफी कर दे ताकि मैं हराम से बच सकूँ, और मुझे अपने फज़ल से इतना नवाज़ दे कि मैं तेरे सिवा किसी का मोहताज न रहूँ।)

(जामिअत-तिर्मिज़ी: 3563)


हज़रत अबू उमामा (र.अ.) का वाकया और दुआ

एक बार रसूलुल्लाह (स.अ.व.) मस्जिद में दाखिल हुए तो वहां अंसार के एक सहाबी हज़रत अबू उमामा (र.अ.) बैठे थे। आप (स.अ.व.) ने पूछा: “ऐ अबू उमामा! क्या बात है कि मैं तुम्हें नमाज़ के वक्त के अलावा मस्जिद में बैठा देख रहा हूँ?”

उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह! गमों और क़र्ज़ों ने मुझे घेर रखा है।”

आप (स.अ.व.) ने फरमाया: “क्या मैं तुम्हें ऐसा कलाम (दुआ) न सिखाऊँ कि जब तुम उसे पढ़ो तो अल्लाह तुम्हारे गम दूर कर दे और तुम्हारा क़र्ज़ अदा करवा दे?” उन्होंने कहा: “ज़रूर, या रसूलुल्लाह!”

आप (स.अ.व.) ने फरमाया: “सुबह और शाम यह दुआ पढ़ा करो:”

अल्लाहुम्मा इन्नी अ-ऊज़ु बिका मिनल-हम्मि वल-हज़नि, वल-अज्ज़ि वल-कसलि, वल-बुख़्लि वल-जुब्नि, व ज़ल-अिद-दैनि व गल-बतिर-रिजाल।
(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह मांगता हूँ फिक्र और गम से, और लाचारी और सुस्ती से, और कंजूसी और बुज़दिली से, और क़र्ज़ के बोझ से और लोगों के दबदबे (ग़लबा पा लेने) से।)

(सुनन अबू दाऊद: 1555)


क़र्ज़ अदा न करने की सख्ती (Warning)

इस्लाम में क़र्ज़ को बहुत संजीदगी से लिया गया है। हदीस में आता है कि “शहीद के तमाम गुनाह माफ कर दिए जाते हैं, सिवाय क़र्ज़ के।” (सहीह मुस्लिम)

इसलिए अगर किसी पर क़र्ज़ हो, तो उसे चाहिए कि अपनी ज़िंदगी में ही उसे अदा करने की पूरी कोशिश करे।

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सोने से पहले क़र्ज़ से पनाह की दुआ

नबी करीम (स.अ.व.) रात को सोने से पहले यह दुआ भी पढ़ा करते थे:

अल्लाहुम्मा रब्बस-समावातिस-सब-अि व रब्बल-अर्ज़ि व रब्बल-अर्शिल-अज़ीम… अक़्ज़ि अन्नद-दैना व अगिनना मिनल-फक़्र।
(ऐ अल्लाह! सातों आसमानों के रब, ज़मीन के रब और अर्श-ए-अज़ीम के रब… हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें फक़ीरी (मोहताजी) से बचा।)

(सहीह मुस्लिम: 2713)


क़र्ज़ उतारने का कुरानी वज़ीफ़ा (Surah Al-Imran)

कुरान मजीद की यह आयत रिज़्क़ की तंगी और क़र्ज़ से नजात के लिए बहुत मुजर्रब (आजमाई हुई) है। हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इसे पढ़ने का मामूल बना लें:

क़ुलिल्लाहुम्मा मालिकल-मुल्कि तुअ्तिल-मुल्का मन तशा-उ व तन्ज़ि-उल-मुल्का मिम्मन तशा-उ व तु-अिज्जु मन तशा-उ व तुज़िल्लु मन तशा-उ, बि-यदिकाल-खैर, इन्नका अला कुल्लि शय-इन क़दीर।

(सूरह आल-ए-इमरान: 26)


क़र्ज़ की अदायगी के लिए क्या करें? (Practical Steps)

दुआ के साथ-साथ अमल भी ज़रूरी है। इन बातों पर गौर करें:

  1. सच्ची नियत: सबसे पहले क़र्ज़ अदा करने की सच्ची और पक्की नियत करें। अल्लाह नियतों को जानता है और मदद फरमाता है।
  2. बजट बनाएं: अपने खर्चों को कम करें और एक बजट बनाएं। देखें कि कहाँ-कहाँ से पैसे बचाकर क़र्ज़ अदा किया जा सकता है।
  3. इस्तग़फ़ार की कसरत: कसरत से “अस्तग़फिरुल्लाह” पढ़ें। इस्तग़फ़ार से अल्लाह रिज़्क़ के बंद दरवाज़े खोल देता है।
  4. सदक़ा करें: थोड़ा ही सही, लेकिन सदक़ा करते रहें। सदक़ा करने से माल कम नहीं होता, बल्कि अल्लाह उसमें बरकत देता है।
  5. मेहनत करें: हलाल रिज़्क़ कमाने के लिए मेहनत और कोशिश करते रहें और अल्लाह पर भरोसा रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q. क़र्ज़ की दुआ कब पढ़नी चाहिए?
A.

आप इन दुआओं को किसी भी वक्त पढ़ सकते हैं, लेकिन खास तौर पर हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद, तहज्जुद के वक्त और जुम्मा के दिन इन दुआओं का एहतमाम करें।

Q. अगर किसी का इंतकाल हो जाए और उस पर क़र्ज़ हो तो?
A.

इस्लाम में क़र्ज़ बहुत संगीन मामला है। शहीद के भी सारे गुनाह माफ हो जाते हैं लेकिन क़र्ज़ माफ नहीं होता। इसलिए मरने वाले के घर वालों की ज़िम्मेदारी है कि उसकी जायदाद में से सबसे पहले उसका क़र्ज़ अदा करें।

Q. क्या बिना ज़रूरत के क़र्ज़ लेना जायज़ है?
A.

इस्लाम में बिना किसी सख्त ज़रूरत के क़र्ज़ लेने को नापसंद किया गया है। नबी (स.अ.व.) खुद क़र्ज़ के बोझ से अल्लाह की पनाह मांगते थे।


नतीजा (Conclusion)

क़र्ज़ एक बहुत बड़ी आज़माइश है, लेकिन अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए। अगर आप सच्ची नियत के साथ कोशिश करते हैं और अल्लाह से दुआ मांगते हैं, तो इंशाअल्लाह बड़े से बड़ा क़र्ज़ भी अदा हो जाएगा।

ऊपर बताई गई दुआओं को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें और अल्लाह पर पूरा यकीन रखें।

अल्लाह हम सबको क़र्ज़ के बोझ से महफूज़ रखे और जिनके ऊपर क़र्ज़ है, उनकी गैब से मदद फरमाए। आमीन।

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