Islam Me Aurat Ka Maqam: औरत का दर्जा जहालत से जन्नत तक
Islam Me Aurat Ka Maqam: जानिए इस्लाम ने कैसे औरत को ज़िंदा दफ़नाने की ज़िल्लत से निकालकर "माँ के क़दमों में जन्नत" का सम्मान दिया। पढ़ें औरत के हुकूक।

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इस्लाम (Islam) वो दीन है जिसने औरत को ज़िल्लत (अपमान) के गड्ढे से निकालकर इज़्ज़त के आसमान पर बिठाया। इस्लाम से पहले अरब में औरतों की हालत बहुत खराब थी, उन्हें पैदा होते ही दफना दिया जाता था और जानवर समझा जाता था।
लेकिन जब इस्लाम आया, तो उसने औरत को माँ, बेटी, बीवी और बहन के रूप में वो मकाम (दर्जा) दिया जो किसी और मज़हब या समाज ने नहीं दिया।
इस आर्टिकल में हम Islam Me Aurat Ka Maqam, उसके हुकूक (Rights) और जिम्मेदारियों के बारे में तफ़सील से जानेंगे।
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इस्लाम से पहले औरत की हालत (Before Islam)
इस्लाम से पहले के दौर को “दौर-ए-जहालत” कहा जाता है। उस वक़्त:
- लड़कियों को पैदा होते ही ज़िंदा दफना दिया जाता था।
- औरत को विरासत (जायदाद) में कोई हिस्सा नहीं मिलता था।
- उसे बाज़ार में सामान की तरह खरीदा और बेचा जाता था।
- मर्द जितनी चाहे शादियाँ करते थे और औरतों पर जुल्म करते थे।
इस्लाम में औरत का मकाम (Status in Islam)
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने आकर औरतों को इज़्ज़त बख्शी।
1. माँ के रूप में (As a Mother)
इस्लाम ने माँ का दर्जा बहुत ऊँचा रखा है। नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: “जन्नत माँ के कदमों के नीचे है।” (नसाई) एक बार एक सहाबी ने पूछा: “या रसूलअल्लाह! मेरे अच्छे सुलूक (सेवा) का सबसे ज़्यादा हक़दार कौन है?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” उन्होंने पूछा: “फिर कौन?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” उन्होंने फिर पूछा: “फिर कौन?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “तुम्हारी माँ।” चौथी बार पूछने पर फरमाया: “तुम्हारा बाप।” (बुखारी)
2. बेटी के रूप में (As a Daughter)
इस्लाम ने बेटी को “रहमत” कहा है। नबी (ﷺ) ने फरमाया: “जिस शख्स ने दो बेटियों की परवरिश की, उन्हें अच्छी तालीम दी और उनका निकाह कराया, वो कयामत के दिन मेरे साथ ऐसे होगा जैसे ये दो उंगलियां।” (और आपने अपनी उंगलियां मिलाकर दिखाईं)।
3. बीवी के रूप में (As a Wife)
इस्लाम ने बीवी को घर की रानी बनाया। कुरान में है: “औरतें तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो।” (सूरह बकरा) नबी (ﷺ) ने फरमाया: “तुम में से सबसे बेहतर वो है जो अपने घर वालों (बीवी) के लिए सबसे बेहतर है।” (तिर्मिज़ी)
इस्लाम में औरत के हुकूक (Rights of Women)
इस्लाम ने औरतों को वो हक़ दिए जो आज की मॉडर्न दुनिया भी पूरी तरह नहीं दे पाई:
- विरासत का हक़: बाप, शौहर और बेटे की जायदाद में औरत का हिस्सा मुकर्रर किया गया।
- मेहर (Mahr) का हक़: निकाह के वक़्त शौहर पर लाज़िम है कि वो बीवी को मेहर (तोहफा) दे, जो सिर्फ बीवी का हक़ है।
- इल्म हासिल करने का हक़: इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।
- पसंद की शादी: इस्लाम ने औरत को अपनी मर्जी से निकाह करने का हक़ दिया है। ज़बरदस्ती निकाह जायज़ नहीं।
- खुला (Khula) का हक़: अगर शौहर जुल्म करे या निबाह न हो, तो औरत को अलग होने (तलाक मांगने) का हक़ है।
क्या इस्लाम में औरत कैद है?
अक्सर लोग परदे (Hijab) को कैद समझते हैं। जबकि इस्लाम में परदा औरत की हिफाज़त और इज़्ज़त के लिए है, उसे कैद करने के लिए नहीं। जैसे हम कीमती हीरे-जवाहरात को तिजोरी में रखते हैं, वैसे ही इस्लाम औरत को कीमती समझकर उसे बुरी नज़रों से बचाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या इस्लाम में औरत नौकरी कर सकती है?
जी हाँ, अगर परदे और शरीयत के दायरे में रहकर ज़रूरत हो तो औरत नौकरी या कारोबार कर सकती है। हज़रत खदीजा (र.अ.) मक्का की सबसे बड़ी ताजिर (Businesswoman) थीं।
Q. विरासत में औरत का हिस्सा मर्द से आधा क्यों है?
क्योंकि इस्लाम ने घर चलाने और औरत की परवरिश की पूरी ज़िम्मेदारी मर्द (बाप/शौहर/भाई) पर डाली है। औरत पर कोई आर्थिक ज़िम्मेदारी नहीं है, उसका पैसा सिर्फ उसका है। इसलिए इन्साफ के तकाज़े से मर्द का हिस्सा ज़्यादा रखा गया ताकि वो ज़िम्मेदारियां उठा सके।
Q. क्या जन्नत में औरतों को भी इनाम मिलेंगे?
बिल्कुल! अल्लाह ने कुरान में फरमाया है कि जो भी नेक अमल करेगा, चाहे मर्द हो या औरत, और वो मोमिन हो, तो हम उसे पाकीज़ा ज़िन्दगी देंगे और जन्नत में बेहतरीन बदला देंगे।
नतीजा (Conclusion)
इस्लाम ने औरत को जो मकाम दिया है, वो बे-मिसाल है। हमें चाहिए कि हम अपने घर की औरतों (माँ, बहन, बीवी, बेटी) की इज़्ज़त करें और उन्हें वो हुकूक दें जो अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) ने मुकर्रर किए हैं।
अल्लाह हमें औरतों की कद्र करने की तौफीक दे। आमीन।





