हज करने का तरीका, शर्तें और फजीलत (Hajj Guide)
हज कैसे करें? जानिए हज की शर्तें, हज करने का मुकम्मल तरीका, फजीलत और वो दुआएं जो आपके सफर को आसान बना देंगी। A complete Hajj guide in Hindi.

Table of Contents
हर मुसलमान की दिली ख्वाहिश होती है कि वह अपनी जिंदगी में कम से कम एक बार अल्लाह के घर (काबा) की ज़ियारत करे और हज का फरीज़ा अदा करे। हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है और यह एक ऐसी इबादत है जो इंसान के पिछले तमाम गुनाहों को धो देती है।
लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि हज किस पर फर्ज़ है, इसे करने का सही तरीका क्या है, और इसकी शर्तें क्या हैं। इस आर्टिकल में हम आपको हज के बारे में पूरी जानकारी आसान लफ़्ज़ों में देंगे।
हज किस पर फर्ज है? (Hajj ki Shartein)
हज हर किसी पर फर्ज नहीं है। इसके लिए कुछ शर्तें हैं, और जो मुसलमान इन शर्तों को पूरा करता है, उस पर जिंदगी में एक बार हज करना फर्ज हो जाता है।
- मुसलमान होना: हज सिर्फ मुसलमानों पर फर्ज है।
- बालिग होना: व्यक्ति का बालिग (Puberty) होना ज़रूरी है।
- आकिल होना: उसका दिमागी तौर पर सेहतमंद होना ज़रूरी है (पागल न हो)।
- आज़ाद होना: वह किसी का गुलाम न हो।
- साहिब-ए-इस्तिताअत होना: इसका मतलब है कि व्यक्ति के पास हज पर जाने और वापस आने तक का खर्च हो, और इस दौरान उसके परिवार के लिए भी गुज़ारे का पूरा इंतज़ाम हो। उस पर कोई ऐसा कर्ज नहीं होना चाहिए जिसे चुकाना ज़रूरी हो।
अल्लाह तआला कुरान में फरमाते हैं:
“और लोगों पर अल्लाह का ये हक़ है कि जो उसके घर (काबा) तक जाने की इस्तिताअत (ताकत) रखता हो, वो उसका हज करे।” (सूरह आल-इमरान: 97)
हज के 3 फ़र्ज़ (Hajj ke Faraiz)
हज में 3 काम ऐसे हैं जो फ़र्ज़ हैं। अगर इनमें से एक भी छूट जाए, तो हज अदा नहीं होगा और इसकी भरपाई दम (कुर्बानी) से भी नहीं हो सकती।
- एहराम बांधना: हज की नियत करना और एहराम की पाबंदियों का ख्याल रखना।
- वुकूफ़-ए-अरफ़ा: 9 ज़ुल-हिज्जा के दिन ज़वाल (दोपहर) के बाद से सूरज डूबने तक अरफात के मैदान में ठहरना।
- तवाफ़-ए-ज़ियारत: 10 ज़ुल-हिज्जा की सुबह से 12 ज़ुल-हिज्जा के सूरज डूबने तक काबा का तवाफ़ करना।
हज की 3 किस्में (Types of Hajj)
हज करने के तीन तरीके हैं, आप अपनी सहूलियत के हिसाब से कोई भी चुन सकते हैं:
- हज-ए-तमत्तो (Hajj-e-Tamattu): इसमें हाजी पहले उमरा का एहराम बांधता है और उमरा करके एहराम खोल देता है। फिर 8 ज़ुल-हिज्जा को हज का नया एहराम बांधता है। (इंडिया और पाकिस्तान के ज़्यादातर लोग यही हज करते हैं)।
- हज-ए-किरान (Hajj-e-Qiran): इसमें उमरा और हज दोनों के लिए एक साथ एहराम बांधा जाता है और जब तक हज पूरा न हो जाए, एहराम नहीं खोला जाता। यह सबसे अफ़ज़ल माना जाता है लेकिन मुश्किल भी है।
- हज-ए-इफराद (Hajj-e-Ifrad): इसमें सिर्फ़ हज की नियत से एहराम बांधा जाता है, उमरा शामिल नहीं होता। यह मक्का के रहने वालों के लिए होता है।
हज करने का तरीका (Step-by-Step)
हज इस्लामी महीने ज़ुल-हिज्जा की 8 से 12 तारीख तक किया जाता है। यह पांच दिनों का सफर होता है। यहाँ इसका एक मुख्तसर (संक्षिप्त) तरीका बताया गया है:
एहराम बांधना और नियत करना: हज का पहला कदम एहराम बांधना है। मीकात पर पहुँचकर हज की नियत करें और तल्बिया (Talbiyah) पढ़ें:
“लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीक लका लब्बैक, इन-नल हम्दा वन-निअमता लका वल-मुल्क, ला शरीक लक।”
(मैं हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह! मैं हाज़िर हूँ। तेरा कोई शरीक नहीं, मैं हाज़िर हूँ। बेशक तमाम तारीफें और नेमतें तेरी ही हैं और बादशाहत भी तेरी है।)
8 ज़ुल-हिज्जा (हज का पहला दिन): हाजी मक्का से मीना शहर के लिए रवाना होते हैं और रात वहीं गुज़ारते हैं।
9 ज़ुल-हिज्जा (हज का दूसरा और सबसे अहम दिन):
- अरफात का दिन: सुबह हाजी मीना से अरफात के मैदान में पहुँचते हैं। यहाँ “वुकूफ़-ए-अरफ़ा” किया जाता है, जो हज का सबसे बड़ा रुक्न है। यहाँ ज़ोहर और अस्र की नमाज़ एक साथ पढ़ी जाती है और दिन भर दुआएं की जाती हैं।
- मुज़दलिफा जाना: सूरज डूबने के बाद हाजी मुज़दलिफा के लिए रवाना होते हैं और मगरिब और इशा की नमाज़ एक साथ वहीं अदा करते हैं। यहीं से शैतान को मारने के लिए कंकरियाँ जमा की जाती हैं।
10 ज़ुल-हिज्जा (हज का तीसरा दिन - ईद का दिन):
- रमी (शैतान को कंकरी मारना): हाजी मीना वापस आकर बड़े शैतान को कंकरियाँ मारते हैं।
- कुर्बानी: इसके बाद जानवर की कुर्बानी की जाती है।
- बाल कटवाना (हल्क़ या तक़सीर): मर्द अपना सर मुंडवाते हैं (हल्क़) या बाल छोटे करवाते हैं (तक़सीर), और औरतें अपने बालों का एक छोटा सा हिस्सा काटती हैं।
- तवाफ़-ए-इफादा: इसके बाद मक्का जाकर काबा के 7 चक्कर लगाए जाते हैं, जिसे तवाफ़-ए-इफादा कहते हैं। इसके बाद हाजी एहराम की पाबंदियों से आज़ाद हो जाते हैं।
11 और 12 ज़ुल-हिज्जा (हज के आखिरी दिन): हाजी मीना में ही रहते हैं और तीनों शैतानों को कंकरियाँ मारते हैं। 12 तारीख को रमी करने के बाद हाजी मक्का वापस आ सकते हैं।
ये भी पढ़ें: ईद कैसे मनाएं और नमाज़ का तरीका
हज के मुक़द्दस मकामात (Holy Places)
हज के दौरान हाजी इन खास जगहों पर जाते हैं:
- मीना (Mina): मक्का से करीब एक वादी जहाँ हाजी तंबू (Tents) में रहते हैं और शैतान को कंकरियाँ मारते हैं।
- अरफात (Arafat): हज का सबसे अहम रुकन यहाँ अदा होता है। यह दुआ और माफी मांगने की जगह है।
- मुज़दलिफ़ा (Muzdalifah): मीना और अरफात के बीच की जगह जहाँ हाजी खुले आसमान के नीचे रात गुज़ारते हैं।
- सफ़ा और मरवा (Safa & Marwa): काबा के पास दो पहाड़ियाँ जिनके बीच 7 चक्कर (सई) लगाए जाते हैं।
हज के सफर की तैयारी (Packing Checklist)
हज के सफर पर जाने से पहले अपनी तैयारी मुकम्मल कर लें। यहाँ ज़रूरी सामान की एक लिस्ट है:
- कागजात (Documents): पासपोर्ट, वीज़ा, आईडी कार्ड, टिकट और ज़रूरी मेडिकल रिपोर्ट्स।
- एहराम (Ihram): मर्दों के लिए 2 सेट एहराम (सफेद चादरें) और बेल्ट। औरतों के लिए सादे और आरामदायक कपड़े।
- जूते-चप्पल: चलने के लिए आरामदायक सैंडल या चप्पल (जो एहराम में जायज़ हों)।
- दवाइयां (Medicines): अपनी रेगुलर दवाइयां, पेन किलर, और डॉक्टर की सलाह से ज़रूरी मेडिसिन किट।
- पर्सनल केयर: बिना खुशबू वाला साबुन, शैम्पू, टूथब्रश, टूथपेस्ट, और वैसलीन (रैश से बचने के लिए)।
- इबादत का सामान: छोटा कुरान, दुआ की किताब (हिस्नुल मुस्लिम), तस्बीह और जानमाज़।
- इलेक्ट्रॉनिक्स: मोबाइल, चार्जर, पावर बैंक और यूनिवर्सल एडाप्टर।
- अन्य: छाता (धूप से बचने के लिए), पानी की बोतल, और कुछ सूखे मेवे या बिस्कुट।
हज के दौरान होने वाली आम गलतियां (Common Mistakes)
हज के दौरान अनजाने में लोग कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनसे बचना ज़रूरी है:
- एहराम में दायां कंधा हर वक़्त खुला रखना: बहुत से लोग एहराम बांधते ही अपना दायां कंधा खोल लेते हैं (इज़्तिबा)। यह सिर्फ तवाफ़-ए-कुदूम (शुरुआती तवाफ़) के दौरान सुन्नत है, बाकी वक़्त और नमाज़ में दोनों कंधे ढके होने चाहिए।
- जमारात (शैतान) को पत्थर मारते वक़्त गुस्सा करना: कुछ लोग समझते हैं कि वो असली शैतान को मार रहे हैं और गुस्से में बड़े पत्थर या चप्पल मारते हैं। यह गलत है। हमें सिर्फ सुन्नत के मुताबिक चने के बराबर छोटी कंकरियां मारनी चाहिए।
- माउंट रहमा (Jabal-ur-Rahmah) पर चढ़ना ज़रूरी समझना: अरफात के मैदान में कहीं भी ठहरने से हज का रुकन अदा हो जाता है। पहाड़ पर चढ़ना ज़रूरी नहीं है और वहां भीड़ बढ़ाने से बचना चाहिए।
- मदीना न जाने से हज नहीं होगा: मदीना मुनव्वरा जाना और नबी (ﷺ) की मस्जिद की ज़ियारत करना बहुत बड़ी सआदत है, लेकिन यह हज के अरकान (Rites) में शामिल नहीं है। अगर कोई किसी वजह से मदीना नहीं जा पाया, तो भी उसका हज हो जाएगा।
- तवाफ़ में धक्का-मुक्की करना: हज्र-ए-अस्वद को चूमने के लिए दूसरों को धक्का देना या तकलीफ पहुँचाना जायज़ नहीं है। अगर भीड़ हो तो दूर से इशारा कर दें (इस्तिलाम), यह काफी है।
- बालों को थोड़ा सा काटना: एहराम खोलने के लिए कुछ लोग सिर्फ थोड़े से बाल काट लेते हैं। मर्दों को या तो पूरा सर मुंडवाना चाहिए (हल्क) या पूरे सर के बाल एक बराबर छोटे करवाने चाहिए (तकसीर)।
तवाफ़ की किस्में (Types of Tawaf)
हज और उमरा के दौरान अलग-अलग मौकों पर तवाफ़ किया जाता है। मुख्य रूप से तवाफ़ की 3 किस्में हैं:
तवाफ़-ए-कुदूम (Tawaf-e-Qudum): इसे “आगमन तवाफ़” (Arrival Tawaf) भी कहते हैं। यह उन लोगों के लिए सुन्नत है जो मीकात के बाहर से (आफाकी) हज-ए-इफराद या हज-ए-किरान की नियत से मक्का आते हैं। यह मक्का पहुँचते ही किया जाता है।
तवाफ़-ए-ज़ियारत (Tawaf-e-Ziyarat): इसे “तवाफ़-ए-इफादा” भी कहते हैं। यह हज का दूसरा सबसे अहम फ़र्ज़ है। यह 10 ज़ुल-हिज्जा से 12 ज़ुल-हिज्जा के सूरज डूबने तक किया जाता है। इसके बिना हज पूरा नहीं होता।
तवाफ़-ए-विदा (Tawaf-e-Wida): इसे “अलविदा तवाफ़” (Farewell Tawaf) कहते हैं। जब हाजी हज पूरा करके मक्का से अपने वतन वापस जाने लगते हैं, तो यह तवाफ़ करना वाजिब है। अगर यह छूट जाए तो दम (कुर्बानी) देना ज़रूरी हो जाता है। (नोट: हैज़ वाली औरतों पर यह माफ़ है)।
तवाफ़ और सई के दौरान पढ़ी जाने वाली दुआएं
तवाफ़ और सई के हर चक्कर के लिए कोई खास दुआ तय नहीं है। आप कुरान की तिलावत, अल्लाह का ज़िक्र (सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाहु अकबर) या अपनी ज़बान में कोई भी दुआ मांग सकते हैं।
लेकिन कुछ दुआएं हैं जो सुन्नत से साबित हैं और जिन्हें पढ़ना बहुत अफ़ज़ल है:
तवाफ़ की दुआ
तवाफ़ के दौरान जब आप रुकन-ए-यमानी (Yemeni Corner) और हज्र-ए-अस्वद (Black Stone) के बीच चल रहे हों, तो यह मशहूर दुआ पढ़ें:
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ “रब्बना आतिना फिद-दुन्या हसनतन, व फिल-आख़िरति हसनतन, वक़िना अज़ाबन-नार।” (ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई अता फरमा और आखिरत में भी भलाई अता फरमा और हमें आग के अज़ाब से बचा।)
सई की दुआ (सफ़ा और मरवा पर)
जब आप सई के लिए पहली बार सफा पहाड़ी पर चढ़ें तो यह आयत पढ़ें: “इन्नस-सफ़ा वल-मरवता मिन शआ’इरिल्लाह…”। इसके बाद क़िब्ला की तरफ मुंह करके हाथ उठाएं और अल्लाह की बड़ाई बयान करें (अल्लाहु अकबर), अल्लाह की तौहीद बयान करें (ला इला-ह इल्लल्लाह) और फिर अपने लिए खूब दुआएं मांगें। यही अमल मरवा पहाड़ी पर भी दोहराएं।
हज की अहमियत और फजीलत
हज की फजीलत बहुत ज़्यादा है। यह सिर्फ एक सफर नहीं, बल्कि गुनाहों से माफी और रूहानी तरबियत का ज़रिया है।
नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया:
“जिसने अल्लाह के लिए हज किया और उसमें कोई बेहूदा बात या गुनाह नहीं किया, तो वह (गुनाहों से पाक होकर) ऐसे लौटेगा जैसे आज ही उसकी माँ ने उसे जना हो।” (सहीह बुखारी)
एक और हदीस में है कि “हज-ए-मबरूर (मकबूल हज) का बदला जन्नत के सिवा कुछ नहीं।”
हज दुनिया भर के मुसलमानों को एक जगह इकट्ठा करता है, जिससे भाईचारे और बराबरी का पैगाम मिलता है। यहाँ कोई अमीर-गरीब, गोरा-काला नहीं होता, सब एक जैसे लिबास में एक ही अल्लाह की इबादत करते हैं।
मक्का और मदीना में ज़ियारत की जगहें (Ziyarat Places)
हज या उमरा के सफर के दौरान हाजी इन मुक़द्दस जगहों की ज़ियारत भी करते हैं। हालांकि यह हज के अरकान में शामिल नहीं है, लेकिन इन जगहों को देखना एक रूहानी तजुर्बा होता है।
मक्का में ज़ियारत
- ग़ार-ए-हिरा (Jabal al-Nour): वह पहाड़ जिसमें मौजूद ग़ार में नबी (ﷺ) पर पहली वही (कुरान की आयत) नाज़िल हुई।
- ग़ार-ए-सौर (Jabal Thawr): वह ग़ार जिसमें हिजरत के वक़्त नबी (ﷺ) और हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) ने तीन दिन तक पनाह ली थी।
- जन्नतुल मुअल्ला: मक्का का पुराना कब्रिस्तान जहाँ नबी (ﷺ) की पहली बीवी हज़रत खदीजा (रज़ि.) और दूसरे सहाबा दफ़न हैं।
- मस्जिद-ए-जिन: वह जगह जहाँ जिन्नात ने नबी (ﷺ) से कुरान सुना और इस्लाम क़बूल किया।
मदीना में ज़ियारत
- मस्जिद-ए-नबवी और रौज़ा-ए-रसूल: नबी (ﷺ) की मस्जिद और उनका रौज़ा (कब्र)।
- जन्नतुल बक़ी: मदीना का कब्रिस्तान जहाँ हज़ारों सहाबा, नबी (ﷺ) के घरवाले और औलिया दफ़न हैं।
- मस्जिद-ए-कुबा: इस्लाम की पहली मस्जिद। हदीस के मुताबिक, यहाँ 2 रकात नमाज़ पढ़ने का सवाब एक उमरा के बराबर है।
- मस्जिद-ए-क़िबलतैन: वह मस्जिद जहाँ नमाज़ के दौरान क़िब्ला बदलने का हुक्म आया था।
- उहुद पहाड़ और शोहदा-ए-उहुद का कब्रिस्तान: उहुद की जंग इसी पहाड़ के दामन में हुई थी। यहाँ हज़रत हमज़ा (रज़ि.) और दूसरे शहीदों की कब्रें हैं।
- सबा मसाजिद (सात मस्जिदें): खंदक की जंग के मौके पर बनाई गई छोटी-छोटी मस्जिदें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. हज और उमरा में क्या फर्क है?
हज इस्लामी साल के आखिरी महीने (ज़ुल-हिज्जा) की खास तारीखों में किया जाता है और यह फर्ज है। जबकि उमरा एक छोटी ज़ियारत है जो साल में कभी भी किया जा सकता है और यह सुन्नत है।
Q. क्या कर्ज लेकर हज कर सकते हैं?
नहीं, कर्ज लेकर हज करना जायज नहीं है। हज उसी पर फर्ज है जिसके पास अपनी ज़रूरतों और जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद हज का खर्च मौजूद हो।
Q. एक औरत बिना मेहरम के हज कर सकती है?
पहले के नियमों के मुताबिक, एक औरत बिना मेहरम (पति या वो रिश्तेदार जिससे निकाह हराम हो) के हज पर नहीं जा सकती थी। लेकिन हाल के कुछ सालों में सऊदी अरब की सरकार ने कुछ शर्तों के साथ भरोसेमंद औरतों के ग्रुप के साथ हज करने की इजाजत दी है। इस बारे में अपने मकामी आलिम से ज़रूर पूछें।
Q. हज का सफर कितने दिन का होता है?
हज के मुख्य अरकान (rituals) 5 दिन (8 से 12 ज़ुल-हिज्जा) के होते हैं। हालांकि, ट्रैवलिंग और आने-जाने में पूरा सफर 20 से 40 दिन तक का हो सकता है।
नतीजा (Conclusion)
हज सिर्फ एक शारीरिक सफर नहीं, बल्कि एक रूहानी सफर है जो इंसान को अल्लाह के करीब लाता है और उसे एक बेहतर मुसलमान बनने का मौका देता है। यह गुनाहों से तौबा करने, अपनी ज़िंदगी को बदलने और अल्लाह की रज़ा हासिल करने का एक सुनहरा मौका है।
अल्लाह हम सबको हज-ए-मबरूर करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।





